30 जुलाई 2010
प्रेमचंद जयंती पर
01 जुलाई 2010
खाप पंचायती मानसिकता के ख़िलाफ़
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| आईये साथ चलें |
03 मई 2010
पुस्तक लोकार्पण और परिचर्चा की रिपोर्ट
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| पुस्तक लोकार्पण का दृश्य |
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| कमल नयन काबरा जी |
29 अप्रैल 2010
आईये साथ चलें…
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| हम साथ हैं |
संपर्क - 9425787930
मई दिवस पर युवा संवाद, भोपाल का आयोजन
With a message of strife and of hope:
Raise the Maypole aloft with its garlands
That gathers your cause in its scope....
Together pull, strong and united:
Link your hands like a chain the world round,
If you will that your hopes be requited.
Shall build, in the new coming years,
A lair house of life—not for others,
For the earth and its fulness is theirs.
15 अप्रैल 2010
हमारा समय और समाजवाद
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| दुनिया के मज़दूरों एक हो! |
22 मार्च 2010
दुनिया को बचाना है तो इसे बदलना ज़रूरी है…
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| विचार सत्र में बोलते हुए राज्य संयोजक प्रदीप |
- जिसे आज आमतौर पर भूमण्डलीकरण कहा जाता है वह दरअसल पूंजी का भूमण्डलीकरण है। श्रम आज भी जंज़ीरों में जकड़ा हुआ है। विकास के इस पूरे विमर्श से समानता का तत्व बाहर हो गया है। इसका सही विकल्प केवल बराबरी पर आधारित एक सामाजार्थिक-राजनैतिक व्यवस्था के ज़रिये पाया जा सकता है।
- आज के दौर में ज़रूरी नहीं कि परिवर्तन बीसवीं सदी की ही तरह हिंसात्मक आंदोलनों के ज़रिये हो। बीसवीं सदी का समाजवाद पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्थाओं में युद्ध के असाधारण काल में आया था…तो उसका आऊटलुक भी उसी के अनुरूप था। आज उनकी नक़ल नहीं हो सकती।
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| जयवीर, मनोज,इमरान,निशांत और अशोक |
- माओवादी दल आज जिन मुद्दों को उठा रहे हैं वे जायज़ हैं लेकिन हिंसा का जो रास्ता वे अपना रहे हैं वह उन्हें आतंकवाद की ओर ले जा रहा है। यह धीरे-धीरे अराजक ख़ून-ख़राबे में बदल रहा है। ऐसी हिंसा, चाहे राज्य की हो या किसी दल की, उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।
- महिला आरक्षण बिल सदियों से उत्पीड़ित इस तबके के उत्थान के लिये आवश्यक सकारात्मक पहल है। इसका समर्थन किया जाना चाहिये। साथ ही दलित, पिछड़े तथा अल्पसंख्यक समुदायों की चिंताओं पर भी गौर किया जाना चाहिये।
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| यहां परिचर्चा में भागीदार महेन्द्र,फिरोज़, प्रदीप |
- आज जाति, धर्म और जेन्डर की पुरोगामी सरंचनाओं के ख़िलाफ़ एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत है और युवा संवाद इसमें अपनी पुरज़ोर भूमिका निभायेगा।
02 जनवरी 2010
एक थीं सावित्री बाई फुले

साथियों
अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष एवं देश की प्रथम अध्यापिका सावित्री बाई फुले के जन्म दिवस पर युवा संवाद भोपाल एक दिवसीय परिचर्चा का आयोजन कर रहा है
परिचर्चा के मुख्य विषय
नारीवादी विचारधारा एवं राजनीति
यौनिकता का अधिकार एवं महिला क़ानूनी सुधार
महिला भारत में महिला आन्दोलन का इतिहास एवं भविष्य की चुनौतिया
आयोजन का दिनांक = ३ जनवरी २०१० समय = सुबह ९ : ३० से शाम ४ :३० तक स्थान = आइकाफ़ आश्रम, शाहपुरा झील के पास भोपाल
सभी साथियों से अपेक्षा है की इस परिचर्चा को सफल बनाने के लिए शामिल होएवं अपने संपर्क के साथियों को भी इस मेल को भेज कर जरुर आमंत्रित करे!
तारकेश्वर
संपर्क नम्बर ०९४२५६६०३७७, 09424401469
27 दिसंबर 2009
साहित्यकार की जगह सडक नहीं होती



पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार युवा संवाद की पहल पर रविवार को शहर के तमाम जनसंगठनों ने पुराने हाईकोर्ट से शहर के हृदयस्थल महाराज बाडे पर पोस्ट आफ़िस की सीढियों के सहारे बने स्थायी मंच से आमसभा का आयोजन किया। रैली में शामिल 75 लोगों की संख्या सभा में दूनी हो गयी। लोग पूरे उत्साह से नारे लगा रहे थे-- कामगार एकता-ज़िन्दाबाद, महंगाई को दूर करो, लेखकों, ट्रेडयूनियनकर्मियों, महिलाओं और वक़ीलों की एकता-- ज़िन्दाबाद, शिक्षा, रोटी और रोज़गार-तीनों बनें मौलिक अधिकार, कैसी तरक्की कौन ख़ुशहाल- कारें सस्ती महंगी दाल! सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने मंहगाई को राष्ट्रीय आपदा घोषित किये जाने, शिक्षा, रोटी और रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाये जाने तथा नयी आर्थिक नीति वापस लेने की मांग की। एटक के राजेश शर्मा, कैलाश कोटिया, युवा संवाद के अजय गुलाटी, स्त्री अधिकार संगठन कि किरण, सीटू के श्याम कुशवाह, इण्डियन लायर्स एसोशियेशन के गुरुदत्त शर्मा तथा यतींद्र पाण्डेय, ग्वालियर यूनाईटेड काउंसिल आफ़ ट्रेड यूनियन्स के एम के जायसवाल, एम पी मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव यूनियन के राजीव श्रीवास्तव, आयुष मेडिकल एसोसियेशन के डा अशोक शर्मा, डा एम पी राजपूत, जन संघर्ष मोर्चे के अभयराज सिंह भदोरिया, नगर निगम कर्मचारी यूनियन के अशोक ख़ान, प्रलेसं के भगवान सिंह निरंजन सहित तमाम वक्ताओं ने इस संयुक्त मोर्चे को वक़्त की ज़रूरत बताते हुए संघर्ष की लौं तेज़ करने का संकल्प किया। संचालन युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने किया।
लेकिन जहां एक तरफ इन तबकों ने अपनी व्यापक एकता का परिचय दिया, शहर के मूर्धन्य काग़ज़ी शेर उर्फ़ साहित्यकार इससे दूर ही रहे। एक साहब को जब हमने फोन लगाया तो उत्तर मिला-- ''अरे भाई यह हमारा काम नहीं है। साहित्यकार की जगह सडक नहीं होती।'' आप को क्या लगता है?
07 दिसंबर 2009
आओ सिनेमा देखें
युवा संवाद, भोपाल का तीन दिवसीय फिल्म शो
8 दिसम्बर-- ग़र्म हवा
जाने-माने निर्देशक एम एस सथ्यू की १९७३ में प्रदर्शित फिल्म जिसके गीत लिखे हैं कैफ़ी आज़मी ने
9 दिसम्बर -- इंडिया अनटच्ड
जाति प्रथा की विसंगतियों की परतें खोलती के स्टालिन की डाक्यूमेंट्री
10 दिसम्बर -- भूमिका
A 3day film show” …breaking the stillness of silence
8th December: Graam Hawa
Garm Hava (Hot Winds or Scorching Winds) is a 1973 Hindi film directed by M। S। Sathyu, based on an unpublished short story by, Ismat Chughtai and adapted for screen by Kaifi Azmi…
9th December: India Untouched
india is a land of great culture, civilization and of great barriers too…prevailing in our cast custom and our society…watch this vivid award winning documentary by Stalin k। portraying the disparities in our society…
10th December: bhoomikaa
Legendary actress Smita Patil tryst with herself as being second sex ……a Shyam Benegal film showing the maveric actress fighting to overcome over hegemony and search for her identity…
Time: 6pm
Place: gandhi bhavan , polytechnic chauraha
Organized by : Yuva samvad
yuvasambadbhopal@gmail।com Bhopal contact: 9754762958
27 सितंबर 2009
देश को तोड़ता है जातिवाद
04 सितंबर 2009
भगत सिंह ने कहा
11 मई 2009
कामगार : कल और आज

23 मार्च 2009
भगत सिंह को याद करो
27 फ़रवरी 2009
युवा सम्वाद तथा स्त्री अधिकार संगठन का संयुक्त आयोजन
साथियो
आगामी ८ तारीख को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सौ वर्ष पूरे हो रहे है। इन वर्षो में महिलाओ की सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक स्थिति में व्यापक परिवर्तन आया है। काम के घंटो को १६ से १२ करने की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आन्दोलन तमाम पडावो को पार कर आज उस जगह पर पहुँच गया है कि सँवैधानिक स्तर पर अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन दिखायी देते हैं , परन्तु सामाजिक स्तर पर भेदभाव अब भी ज़ारी हैं। साथ ही महिला मुक्ति का प्रश्न आज भी बेहद उलझा हुआ है। विशुद्ध रूप से इसे आर्थिक मुक्ति से लेकर देह को इसका उत्स मानने वाले अनेक लोग अपने अपने तर्कों के साथ परिदृश्य पर मौज़ूद हैं। साथ ही एनजीओ के सतत विस्तार ने भी इसे अपने तरीक़े से प्रभावित किया है।
इन सबके बीच आज कहाँ है दुनिया मे औरत? बाज़ार के सर्वग्रासी विस्तार के बीच उसकी मुक्ति का सवाल अब किस रूप मे उपस्थित है? और इसकी राह किधर है?
इन्ही सब सवालों के इर्दगिर्द युवा सम्वाद ने स्त्री अधिकार संगठन के साथ मिलकर आगामी ७ मार्च को एक खुली बहस का आयोजन किया है। शाम चार बजे से सिटी सेन्टर स्थित स्वास्थय प्रबंधन सन्स्थान मे आयोजित इस कार्यक्रम मे स्त्री अधिकार सन्गठन, दिल्ली से जुडी जानी मानी लेखिका अन्जलि सिन्हा की प्रमुख भागीदारी होगी और अन्नपूर्णा भदोरिया करेंगी ।
आईये मिलकर सोचें -
25 फ़रवरी 2009
दुनिया में औरत

ashokk34@gmail.com
या
naidakhal@gmail.com
05 फ़रवरी 2009
हमारे समय में प्रेम
वसन्त पंचमी अभी बीती है और वेलेन्टाईन डे एक बार फिर करीब है। शहर के थोड़ा बाहर जाये तो सरसों की पीली चादर ओढे धरती प्रेम का संदेश बाँट रही है और हवाएँ इसकी खुशबू से सराबोर है। ऐसे में इस बदलते हुए समय में प्रेम का मतलब क्या है? क्या है प्रेम की भारतीय परम्परा और कैसे उसे बदलती हुई सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने बदला है? प्रेम में क्या ग़लत है और क्या सही तथा इसके समर्थन व विरोध में उठने वाले स्वरो की हक़ीक़त क्या है? इन्ही सब सवालों के साथ ‘युवा सम्वाद’ आप सबके बीच उपस्थित है।
आदम और हव्वा के ज़माने से ही पुरुष और स्त्री के बीच प्रेम का सहज आकर्षण और समाज द्वारा उसके नियन्त्रण की कोशिशें ज़ारी हैं। मनोविज्ञान और जीवविज्ञान दोनों इसे सहज और प्राकृतिक बताते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थायें बनी और उसमें विभिन्न संस्तर (layers) बने वैसे-वैसे ही प्रेम पर नियंत्रण की कोशिशें और तेज़ होती गईं। जाति, धर्म तथा अमीरी-ग़रीबी मे बँटे समाज में प्रेम का अर्थ भी बदला और रूप भी। राजा-महाराजाओ के सामंती युग में विवाह और प्रेम का निर्णय व्यक्तिगत न होकर सामाजिक हो गये। पिता और समाज के नियंता पुरोहित, पादरी और मुल्ले तय करने लगे कि किसकी शादी किसके साथ होनी चाहिये। पुरुषप्रधान समाज में औरतों और दलित कही जाने वाली जातियों को घरों में क़ैद कर दिया गया और उनकी पढाई-लिखाई पर रोक लगा दी गयी कि कहीं वे अपने अधिकारों की माँग न कर बैठे। ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता’ किताबों मे क़ैद रहा और औरतें चूल्हे से लेकर चिताओं तक में सुलगती रहीं।
सामन्ती समाज के विघटन के साथ-साथ जो नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था औद्योगिक क्रान्ति के साथ सामने आई उसने जनतन्त्र को जन्म दिया जो मूलतः समानता, भाईचारे और व्यक्ति की स्वतंत्र अस्मिता ( identity) के सम्मान पर आधारित थी। यह आज़ादी अपनी ज़िन्दगी के तमाम फ़ैसलों की आज़ादी थी और समानता का मतलब था जन्म ( (भारत के सन्दर्भ में धर्म, जाति, ज़ेन्डर और क्षेत्रीयता) के आधार पर होने वाले भेदभावो का अन्त। यही वज़ह थी कि हमारे संविधान मे जहां सबको वोट देने का हक़ दिया गया वहीं दलितों, स्त्रियों और दूसरे वंचित तबक़ों की सुरक्षा तथा प्रगति के लिये प्रावधान भी किये गये। अन्तर्जातीय तथा अन्तर्धार्मिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देकर जीवनसाथी चुनने के हक़ को सामाजिक से व्यक्तिगत निर्णय मे बदल दिया गया।
लेकिन दुर्भाग्य से जहां संविधान में ये क्रान्तिकारी प्रावधान किये गये समाज मे ऐसा कोई बडा आन्दोलन खडा नही हो पाया और जाति तथा धर्म के बन्धन तो मज़बूत हुए ही साथ ही औरतों को भी बराबरी का स्थान नही दिया जा सका। पन्चायतो से महानगरों तक प्रेम पर पहरे और भी कडे होते गये।
इसी के साथ बाज़ार केन्द्रित आर्थिक व्यवस्था ने प्रेम और औरत को एक सेलेबल कमोडिटी में बदल दिया। हालत यह हुई कि प्रेम की सारी भावनाओं की जगह अब गर्लफ़्रैंड-ब्वायफ़्रैन्ड बनाना स्टेटस सिम्बल बनते गये। क्रीम-पावडर के बाज़ार ने सुन्दरता के नये-नये मानक (standard) बना दिये और प्रेम मानो सिक्स पैक और ज़ीरो फ़ीगर मे सिमट गया। वेलेन्टाइन ने प्रेम के लिये बलिदान किया था पर बाज़ार ने उसे ‘लव गुरु’ बना दिया। इस सारी प्रक्रिया ने कट्टरपन्थी मज़हबी लोगो को प्रेम और औरत की आज़ादी पर हमला करने के और मौके उपलब्ध करा दिये। यह हमला दरअसल हमारी संस्कृति तथा लोकतान्त्रिक अधिकारों पर हमला है।
दरअसल प्रेम का अर्थ क्या है? हमारा मानना है कि यह एक दूसरे की आज़ादी का पूरा सम्मान करते हुए बराबरी के आधार पर साथ रहने का व्यक्तिगत निर्णय है और इसमें दख़लन्दाज़ी का किसी को कोई अधिकार नहीं। बिना आपसी बराबरी और सम्मान के कभी भी सच्चा प्रेम हो ही नही सकता। आज विवाह क्या है? लडकी के सौन्दर्य और घरेलू कामो मे निपुणता तथा लडके की कमाई के बीच एक समझौता जिसकी क़ीमत है दहेज़ की रक़म। आखिर जो लडके/लडकी एक डाक्टर, इन्जीनियर, मैनेज़र या सरकारी अफ़सर के रूप में इतने बडे-बडे फ़ैसले लेते हैं वे अपना जीवनसाथी क्यों नहीं चुन सकते?
युवा सम्वाद का मानना है कि एक बराबरी वाले समाज में ही प्रेम अपने सच्चे रूप मे विकसित हो सकता है तथा इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया में तब्दील कर सकता है। प्रेम और शादी का अधिकार हमारा संवैधानिक हक़ है और व्यक्तिगत निर्णय। आप क्या सोचते हैं ?
08 जनवरी 2009
तीसरा राज्य स्तरीय युवा चिन्तन शिविर 2009
विगत वर्षो की तरह इस वर्ष भी युवा सम्वाद की विभिन्न जिला इकाईयों द्वारा भोपाल में दिनांक 30,31 जनवरी व 01 फरवरी २009 को आइकफ आश्रम, शाहपुरा झील के पास तीन दिवसीय आवासीय शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर के लिये प्रस्तावित कार्ययोजना निम्नानुसार है
प्रथम दिवस 30।01।2009 1 इतिहास एवं समाजिक परिवर्तन - समय प्रात: 10:00 बजे से 1 बजे तक - वक्ता : उमा शंकर तिवारी, प्रोफेसर आई. आई.आई टी , इलाहाबाद
2 साम्प्रदायिकता की राजनीति व उसका सामाजिक आयाम और विकल्प - समय दोपहर 2 बजे से 5 बजे तक - वक्ता : सुभाष गताड़े, सामाजिक चिंतक - दिल्ली
3 सांस्कृतिक कार्यक्रम के विभिन्न तरीकों पर चर्चा व प्रस्तूति की तैयारी समय साम 6 बजे से 8 बजें तक - सहजकर्ता - ‘‘संवेदन सास्कृतिक कार्यक्रम ’’ के साथी, अहमदाबाद
दुसरा दिवस 31.01.2009
1 युवा - छात्र व राजनैतिक हस्तक्षेप समय प्रात: 10:00 बजे से 1:00 बजें तक - वक्ता : अशोक कुमार पाण्डेय, ग्वालियर
2 युवा सम्वाद - अभी तक का सफर व भविष्य की रणनीति समय दोपहर 2 बजे से 6 बजे तक सहजकर्ता अजय गुलाटी - ग्वालियर, फैज - देवास, उपासना - भोपाल,
3 सांस्कृतिक कार्यक्रम के विभिन्न तरीकों पर चर्चा व प्रस्तुति की तैयारी शाम 6:30 बजे से 8 :30 बजें तक - सहजकर्ता - ‘‘संवेदन सास्कृतिक कार्यक्रम ’’ के साथी, अहमदाबाद
तीसरा दिवस 01.02.2009
1 संस्कृति व आधुनिकता - समय प्रात: 10 बजे से 1 बजे तक - वक्ता - हिरेन गांधी, , अहमदाबाद व प्रदीप भोपाल ।
2 मध्य प्रदेश में समाजिक जन-आंदोलन का इतिहास-प्रभाव व भविष्य : समय दोपहर 2 बजे से साम 4 बजे तक : वक्ता योगेश दिवान, राजनैतिक कार्यकर्ता, होशंगाबाद
3 कला व उसके प्रदर्शन के विभिन्न आयाम : समय 4 बजे से 5:30 बजे तक : वक्ता स्वरूप बेन व हिरेन गांधी ।
4 सांस्कृतिक संध्या का आयोजन शाम 6 बजे से
सम्पर्क
जावेद :9424401459 @ गौरव :9713420233 @ फैज : ९८२६११००८४ अशोक:9425787930 @ देवेश:09981583770 @ इमरान : ९३००७७५४१६ उपासना :9424401469
09 दिसंबर 2008
फ़िल्म प्रदर्शनी
युवा संवाद एवं पी. आर. एस. द्वारा ‘‘बिआंड द ब्रैकेट्स’’ के तहत दो दिवसीय फिल्म प्रदर्शनी का आयोजन गांधी भवन भोपाल में किया गया। ‘‘इन्सानी बराबरी और जमहूरीयत की ओर’’ के नारे से आयोजित इस फिल्म शो के पहले दिन ( 5/12/2008 ) को ‘‘खामो’श पानी’’ का प्रदर्शन किया गया। 5 दिसंबर को फिल्म की शुरुवात से पहले मुम्बई में आतंकवादी हमलों के शहीदों को दो मिनट का मौन रख कर भावभीनी श्रद्वांजली दी गई।सबीना सूमर द्वारा निर्देशित और किरण खेर अभिनीत ये फिल्म मुख्य रुप से पंजाबी भाषा में होने के बावजूद भी दर्शकों पर गहरा प्रभाव डालने में कामयाब रही। इस फिल्म में सत्तर के द’शक में पाकिस्तान में कट्टरता एव धार्मिक जड़ता की दलदल में फंसी एक महिला और उसके पुत्र की कहानी को बहुत प्रभावशाली तरीके से उकेरा गया है। फिल्म के अंत में खुली चर्चा का आयोजन किया गया। चर्चा के दौरान ये बात निकल कर आयी कि कट्टरता एव धार्मिक जड़ता किसी भी धर्म या दे’ा में हो उसका सबसे बड़ा खामियाजा महिलाऐं ही भुगतती है। फिल्म प्रदअर्शानी के दूसरे दिन( 6/12/2008 ) अहमदाबाद के दृष्टि ग्रुप के स्टलिन के. द्वारा निर्देशित ‘‘इंड़िया अनटच्ड’’ नामक डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया। यह फिल्म वर्तमान समय में भारत में व्याप्त छूआछूत और जातिप्रथा का ठोस विवरण देती है। इस फिल्म में भारत के सभी धर्मो में व्याप्त जाति व्यवस्था का तस्वीर है। ये फिल्म उन लोगों के लिए एक जवाब है जो ये कहते है कि जाति व्यवस्था और छूआछूत खत्म हो गइ है। भारत के लगभग 8 राज्यों में तीन सालों के दौरान बनायी गइ ये फिल्म दर्शको पर अमिट छाप छोड़ने में सफल रही। फिल्म के अतं में चर्चाकी गइ। चर्चा के दौरान ये बात निकल कर आयी कि जाति व्यवस्था खत्म नही हुइ है बल्कि वो अपने नये खोलों के साथ आज भी मजबूती के साथ हमारे समाज में मौजुद है। 6 दिसंबर का दिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए कुख्यात है लेकिन हम भूल जाते है कि इसी दिन बाबा साहेब आम्बेडकर की पुण्यतिथी भी होती है।जो कि भारत के दलित और वंचित तबकों के मुक्ती के प्रतिक है। ये हमें तय करना है कि हमें इस दिन को किस रुप में याद रखना चाहेगें?चर्चा के दौरान सभी सहमत थे कि साम्प्रदायिकता एव आतंकवाद एक दूसरे के पूरक है और हमें इन दोनों के खिलाफ ताकत से आवाज उठानी होगी तथा साम्प्रदायिकता एव आतंकवाद की अतिंम लड़ाइ वैचारिक स्तर पर लड़ी जायेगी और इसमें युवाओं की महती भूमिका होगी।इस फिल्म को लगभग 150 विभिन्न काWलेज के छात्रों,सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्वजीवियों ने देखा।
06 दिसंबर 2008
आतंकवाद तथा साम्प्रदायिकता के खिलाफ
युवा संवाद भोपाल ने भी ६ दिसम्बर को शान्ति मार्च निकालामोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि









