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30 जुलाई 2010

प्रेमचंद जयंती पर

युवा संवाद, ग्वालियर

प्रेस नोट

प्रेमचंद जयंती से खाप पंचायतों के ख़िलाफ़ अभियान


युवा संवाद ने आगामी 31 जुलाई को महान कथाकार प्रेमचंद की जयंती से लेकर 27 सितंबर को शहीद भगत सिंह की जयंती तक खाप पंचायती मानसिकता के ख़िलाफ़ अभियान चलाने का नि्चय किया है। इसकी शुरुआत आगामी 31 जुलाई को शाम 5 वजे से  फूलवाग स्थित गांधी पार्क पर एक ख़ुली गोष्ठी से की जायेगी जिसमें शहर के तमाम सामाजिक कार्यकर्ता, बौद्धिक वर्ग के प्रतिनिधि तथा साहित्यकार हिस्सा लेंगे। इसके अगले चरण में कालेजों, कार्यस्थलों आदि में परचा वितरण, आम सभा तथा गोष्ठियों के माध्यम से जजागरण अभियान चलाया जायेगा।

उक्त जानकारी देते हुए युवा संवाद के संयोजक अजय गुलाटी ने बताया कि प्रदेश के तमाम शहरों में यह अभियान चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य समाज में व्याप्त खाप पंचायती मानसिकता के ख़िलाफ़ माहौल तैयार करना है। उनहोंने शहर के तमाम प्रगतिशील लोगों, छात्रों तथा आम जन से इसमें सक्रिय हिस्सेदारी की अपील की है।

01 जुलाई 2010

खाप पंचायती मानसिकता के ख़िलाफ़

आईये साथ चलें
पिछली पोस्ट में हमने युवा संवाद, ग्वालियर द्वारा ज़ारी पर्चे को पोस्ट किया था। अब यह पर्चा युवा संवाद की विभिन्न इकाईयों द्वारा प्रदेश भर में बांटा जायेगा और खाप पंचायती मानसिकता के ख़िलाफ़ अभियान तेज़ किया जायेगा। ग्वालियर में भी हम हस्ताक्षर अभियान शुरु कर रहे हैं।


आप भी इस अभियान में यहां क्लिक करके आनलाईन भागीदारी कर सकते हैं।
आईये एक बेहतर दुनिया बनाने की कोशिश में साथ चलें।

03 मई 2010

पुस्तक लोकार्पण और परिचर्चा की रिपोर्ट

पुस्तक लोकार्पण का दृश्य 

समाजवाद मानव की मुक्ति का महाआख्यान है। पूंजीवाद की आलोचना का आधार सिर्फ़ उसकी आर्थिक प्रणाली नहीं बल्कि उसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम भी हैं। इसने समाज को अमानवीय बना दिया है। औरतों, दलितों और ग़रीबों की ज़िन्दगी इस व्यवस्था में लगातार बद्तर हुई है। सांस्कृतिक क्षेत्र को इसने इतना प्रदूषित कर दिया है कि मनुष्य की प्राकृतिक प्रतिभा का विकास इसके अंतर्गत असंभव है। इसीलिये व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक आमूलचूल लड़ाई लड़े बिना इन मुद्दों पर अलग-अलग लड़ाईयां नहीं लड़ी जा सकतीं। आज ज़रूरत मार्क्सवाद की गतिमान व्याख्या तथा नई सामाजार्थिक हक़ीक़त के बरक्स इसे लागू किये जाने की है। अशोक की किताब मार्क्स जीवन और विचार इस लड़ाई का ही एक हिस्सा है जो नये पाठकों और युवा पीढ़ी का मार्क्स से आलोचनात्मक परिचय कराती है। मई दिवस के अवसर पर ग्वालियर में युवा संवाद द्वारा आयोजित परिचर्चा हमारे समय में समाजवाद में हिस्सेदारी करते हुए जाने-माने संस्कृतिकर्मी प्रो शम्सुल इस्लाम ने कही।  

कमल नयन काबरा जी
परिचर्चा में हिस्सेदारी करते हुए वरिष्ठ अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने कहा कि आज़ादी के बाद से ही विकास का जो माडल अपनाया गया वह व्यापक आबादी नहीं बल्कि एक सीमित वर्ग के हाथों में सत्ता तथा अर्थतंत्र के नियंत्रण को संकेन्द्रित करने वाला था। जिसे समाजवाद कहा गया वह वस्तुतः राज्य पूंजीवाद था। गांवों और शहरों के ग़रीबों की संख्या में लगातार वृद्धि होती रही। समाजवाद का मतलब है एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सत्ता वास्तविक अर्थों में जनता के हाथ में रहे। आज रूस या चीन की कार्बन कापी नहीं हो सकती और नयी समाजवादी व्यवस्था को आज की सच्चाईयों के अनुरूप स्वयं को ढालना होगा। भूमण्डलीकरण के नाम पर जो प्रपंच रचा गया है अशोक उसे शोषण के अभयारण्य में बख़ूबी खोलते हैं।

कार्यक्रम का आरंभ शम्सुल इस्लाम, गैरी तथा अन्य साथियों द्वारा गाये गये गीत लाल झण्डा ले के हम आगे बढ़ते जायेंगे' से हुआ। इस अवसर पर युवा कवि, लेखक अशोक कुमार पाण्डेय की हाल ही में प्रकाशित दो किताबों, मार्क्स जीवन और विचार तथा शोषण के अभयारण्य भूमण्डलीकरण के दुष्प्रभाव और विकल्प का सवाल का लोकार्पण अथिति द्वय और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश दीक्षित द्वारा किया गया। पुस्तक परिचय देते हुए युवा कहानीकार जितेन्द्र विसारिया ने इसे मार्क्सवाद को समझने की ज़रूरी किताब बताया, वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी डा मधुमास खरे ने कहा कि यह छोटी सी किताब प्रगति प्रकाशन से छपने वाली उन किताबों की याद दिलाती है जिन्हें पढ़कर हमारी पीढ़ी ने मार्क्सवाद सीखा। अशोक ने कम्यूनिस्ट आंदोलनत का संक्षिप्त इतिहास लिखकर एक बड़ी ज़रूरत को पूरा किया है। युवा संवाद के संयोजक अजय गुलाटी ने कहा कि ये एक सक्रिय कार्यकर्ता की किताबें हैं जिन्हें आम जनता के लिये पूरी संबद्धता के साथ लिखा गया है। शोषण के अभयारण्य दूरुह माने जाने वाले विषय अर्थशास्त्र पर इतने रोचक तरीके से बात करती है कि इसे कोई भी पढ़कर अपनी अर्थव्यवस्था को समझ सकता है। लेखकीय वक्तव्य में अशोक पाण्डेय ने कहा कि किताब दरअसल बस वैसी ही होती है जैसा उसे पाठक समझता है। लिखना मेरे लिये इस लड़ाई का ही हिस्सा है और अगर ये किताबें उसमें कोई भूमिका निभा पायें तभी इनकी सार्थकता है। समाजवाद मेरे लिये एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें मौज़ूदा व्यवस्था से अधिक शांति हो, अधिक समृद्धि हो, अधिक लोकतंत्र और अधिक समानता। मुझे नहीं लगता कि उसकी लड़ाई आज पुराने तरीकों या फिर हिंसात्मक आंदोलनों से लड़ी जा सकती है।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रकाश दीक्षित ने कहा कि अशोक का जुझारुपन और उसकी बैचैनी इन किताबों में साफ़ महसूस की जा सकती है। इसीलिये ये किताबें रोचक हैं और आपसे लगातार सवाल करती हैं। आज बाज़ार ने मध्य वर्ग को पूरी तरह भ्रष्ट बना दिया है और जो अधिकार संघर्षों के बाद हासिल हुए थे वे अब छीन लिये गये हैं। आज इस लड़ाई के लिये और अधिक प्रतिबद्ध संघर्ष की ज़रूरत है।

कार्यक्रम में साहित्यकार वक़ार सिद्दीकी, पवन करण, प्रदीप चौबे, ज़हीर क़ुरैशी, मुस्तफ़ा ख़ान, सत्यकेतु सांकृत, जी के सक्सेना, संतोष निगम, पारितोष मालवीय, इण्डियन लायर्स एसोसियेशन के गुरुदत्त शर्मा, अशोक शर्मा, मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव यूनियन के राजीव श्रीवास्तव, गुक्टु के ओ पी तिवारी, एस के तिवारी, डी के जैन, जे एस अलोरिया सी पी आई के सतीश गोविला, स्त्री अधिकार संगठन की किरण, बेबी चौहान, पत्रकार राकेश अचल सहित शहर के तमाम बुद्धिजीवी, ट्रेडयूनियन कर्मियों, छात्रों तथा आम जनों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की। संचालन अशोक चौहान ने किया और आभार प्रदर्शन फिरोज़ ख़ान ने।

29 अप्रैल 2010

आईये साथ चलें…

हम साथ हैं

   मई दिवस पर                           युवा संवाद ,ग्वालियर                   का आयोजन- परिचर्चा एवं पुस्तक विमोचन
हमारे समय में समाजवाद
मुख्य वक्ता
·      प्रो कमल नयन काबरा, प्रख्यात अर्थशास्त्री
·      प्रो शम्सुल इस्लाम, राजनीतिशास्त्री

विमोचन
·      मार्क्स : जीवन और विचारशोषण के अभयारण्य
लेखक अशोक कुमार पाण्डेय

दो मई, शाम छःबजे, उत्तम वाटिका, सैनिक पेट्रोल पंप के पास, मेला रोड, ग्वालियर
 संपर्क - 9425787930

मई दिवस पर युवा संवाद, भोपाल का आयोजन

Occasion of 1 May international worker day

Struggle to create a more just and equal society

...Let the winds lift your banners from far lands
     With a message of strife and of hope:
Raise the Maypole aloft with its garlands
     That gathers your cause in its scope....
...Stand fast, then, Oh Workers, your ground,
     Together pull, strong and united:
Link your hands like a chain the world round,
     If you will that your hopes be requited.
When the World's Workers, sisters and brothers,
      Shall build, in the new coming years,
A lair house of life—not for others,
      For the earth and its fulness is theirs.
                            Walter Crane, The Workers' Maypole, 1894
Discussion on


 Topic : A WORLD FOR THE WORKERS
Speaker : Dr. Rizavanul Haq, NCERT Bhopal
Date : 1 May, 2010
Time : 6 PM
Venue : Sewasadan, IInd Stop, Near St Merry School, Bhopal



 Organized by - YUVA SAMVAD & NAGRIK ADHIKAR MANCH, Bhopal
Contact- 9754762958, 9301363498

15 अप्रैल 2010

हमारा समय और समाजवाद

दुनिया के मज़दूरों एक हो!

युवा संवाद तथा स्त्री अधिकार संगठन  ने पिछले साल की ही तरह इस साल भी मई दिवस मनाने का निश्चय किया है। इस साल हमने  ' हमारे समय में समाजवाद' विषय पर एक परिचर्चा आयोजित करने का इरादा किया है जिसमें जाने माने अर्थशास्त्री प्रो कमल नयन काबरा तथा प्रतिबद्ध राजनीति शास्त्री एवं संस्कृतिकर्मी प्रो शमसुल इस्लाम की प्रमुख भागीदारी होगी। आगामी दो मई को रेसकोर्स रोड स्थित सैनिक पेट्रोल पंप के पास उत्तम वाटिका में शाम छह बजे से होने वाली इस परिचर्चा में शहर के तमाम सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता , संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार तथा आम जन हिस्सेदारी करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रो प्रकाश दीक्षित करेंगे।

इस अवसर पर अशोक कुमार पाण्डेय की सद्य प्रकाशित किताबों 'मार्क्स- जीवन एवं विचार' तथा 'शोषण के अभयारण्य' का लोकार्पण भी होगा। 

22 मार्च 2010

दुनिया को बचाना है तो इसे बदलना ज़रूरी है…

विचार सत्र में बोलते हुए राज्य संयोजक प्रदीप


  • जिसे आज आमतौर पर भूमण्डलीकरण कहा जाता है वह दरअसल पूंजी का भूमण्डलीकरण है। श्रम आज भी जंज़ीरों में जकड़ा हुआ है। विकास के इस पूरे विमर्श से समानता का तत्व बाहर हो गया है। इसका सही विकल्प केवल बराबरी पर आधारित एक सामाजार्थिक-राजनैतिक व्यवस्था के ज़रिये पाया जा सकता है।



  • आज के दौर में ज़रूरी नहीं कि परिवर्तन बीसवीं सदी की ही तरह हिंसात्मक आंदोलनों के ज़रिये हो। बीसवीं सदी का समाजवाद पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्थाओं में युद्ध के असाधारण काल में आया था…तो उसका आऊटलुक भी उसी के अनुरूप था। आज उनकी नक़ल नहीं हो सकती। 
जयवीर, मनोज,इमरान,निशांत और अशोक


  • माओवादी दल आज जिन मुद्दों को उठा रहे हैं वे जायज़ हैं लेकिन हिंसा का जो रास्ता वे अपना रहे हैं वह उन्हें आतंकवाद की ओर ले जा रहा है। यह धीरे-धीरे अराजक ख़ून-ख़राबे में बदल रहा है। ऐसी हिंसा, चाहे राज्य की हो या किसी दल की, उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।


  • महिला आरक्षण बिल सदियों से उत्पीड़ित इस तबके के उत्थान के लिये आवश्यक सकारात्मक पहल है। इसका समर्थन किया जाना चाहिये। साथ ही दलित, पिछड़े तथा अल्पसंख्यक समुदायों की चिंताओं पर भी गौर किया जाना चाहिये।

यहां परिचर्चा में भागीदार महेन्द्र,फिरोज़, प्रदीप

  • आज जाति, धर्म और जेन्डर की पुरोगामी सरंचनाओं के ख़िलाफ़ एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत है और युवा संवाद इसमें अपनी पुरज़ोर भूमिका निभायेगा।

ये कुछ निष्कर्ष हैं जो युवा संवाद के दो दिवसीय राज्य सम्मेलन में निकल कर सामने आये…विस्तृत रिपोर्ट जल्दी ही


शहीदी दिवस (23 मार्च) पर आप सबका अभिनन्दन!

02 जनवरी 2010

एक थीं सावित्री बाई फुले



साथियों
अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष एवं देश की प्रथम अध्यापिका सावित्री बाई फुले के जन्म दिवस पर युवा संवाद भोपाल एक दिवसीय परिचर्चा का आयोजन कर रहा है



परिचर्चा के मुख्य विषय


नारीवादी विचारधारा एवं राजनीति


यौनिकता का अधिकार एवं महिला क़ानूनी सुधार


महिला भारत में महिला आन्दोलन का इतिहास एवं भविष्य की चुनौतिया



आयोजन का दिनांक = ३ जनवरी २०१० समय = सुबह ९ : ३० से शाम ४ :३० तक स्थान = आइकाफ़ आश्रम, शाहपुरा झील के पास भोपाल


सभी साथियों से अपेक्षा है की इस परिचर्चा को सफल बनाने के लिए शामिल होएवं अपने संपर्क के साथियों को भी इस मेल को भेज कर जरुर आमंत्रित करे!

तारकेश्वर
संपर्क नम्बर ०९४२५६६०३७७, 09424401469

27 दिसंबर 2009

साहित्यकार की जगह सडक नहीं होती







पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार युवा संवाद की पहल पर रविवार को शहर के तमाम जनसंगठनों ने पुराने हाईकोर्ट से शहर के हृदयस्थल महाराज बाडे पर पोस्ट आफ़िस की सीढियों के सहारे बने स्थायी मंच से आमसभा का आयोजन किया। रैली में शामिल 75 लोगों की संख्या सभा में दूनी हो गयी। लोग पूरे उत्साह से नारे लगा रहे थे-- कामगार एकता-ज़िन्दाबाद, महंगाई को दूर करो, लेखकों, ट्रेडयूनियनकर्मियों, महिलाओं और वक़ीलों की एकता-- ज़िन्दाबाद, शिक्षा, रोटी और रोज़गार-तीनों बनें मौलिक अधिकार, कैसी तरक्की कौन ख़ुशहाल- कारें सस्ती महंगी दाल!

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने मंहगाई को राष्ट्रीय आपदा घोषित किये जाने, शिक्षा, रोटी और रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाये जाने तथा नयी आर्थिक नीति वापस लेने की मांग की। एटक के राजेश शर्मा, कैलाश कोटिया, युवा संवाद के अजय गुलाटी, स्त्री अधिकार संगठन कि किरण, सीटू के श्याम कुशवाह, इण्डियन लायर्स एसोशियेशन के गुरुदत्त शर्मा तथा यतींद्र पाण्डेय, ग्वालियर यूनाईटेड काउंसिल आफ़ ट्रेड यूनियन्स के एम के जायसवाल, एम पी मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव यूनियन के राजीव श्रीवास्तव, आयुष मेडिकल एसोसियेशन के डा अशोक शर्मा, डा एम पी राजपूत, जन संघर्ष मोर्चे के अभयराज सिंह भदोरिया, नगर निगम कर्मचारी यूनियन के अशोक ख़ान, प्रलेसं के भगवान सिंह निरंजन सहित तमाम वक्ताओं ने इस संयुक्त मोर्चे को वक़्त की ज़रूरत बताते हुए संघर्ष की लौं तेज़ करने का संकल्प किया। संचालन युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने किया।

लेकिन जहां एक तरफ इन तबकों ने अपनी व्यापक एकता का परिचय दिया, शहर के मूर्धन्य काग़ज़ी शेर उर्फ़ साहित्यकार इससे दूर ही रहे। एक साहब को जब हमने फोन लगाया तो उत्तर मिला-- ''अरे भाई यह हमारा काम नहीं है। साहित्यकार की जगह सडक नहीं होती।'' आप को क्या लगता है?

07 दिसंबर 2009

आओ सिनेमा देखें






युवा संवाद, भोपाल का तीन दिवसीय फिल्म शो



8 दिसम्बर-- ग़र्म हवा

जाने-माने निर्देशक एम एस सथ्यू की १९७३ में प्रदर्शित फिल्म जिसके गीत लिखे हैं कैफ़ी आज़मी ने



9 दिसम्बर -- इंडिया अनटच्ड

जाति प्रथा की विसंगतियों की परतें खोलती के स्टालिन की डाक्यूमेंट्री



10 दिसम्बर -- भूमिका

अद्वितीय अभिनेत्री स्मिता पाटिल की गोविन्द निहलानी निर्देशित अप्रतिम फ़िल्म
स्थान-- गांधी भवन, पालिटेक्निक चौराहा, भोपाल
आयोजक-- युवा संवाद, भोपाल
समय-- शाम छह बजे से
संपर्क--yuvasambadbhopal@gmail।com
फोन-- 9754762958
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A 3day film show” …breaking the stillness of silence

8th December: Graam Hawa



Garm Hava (Hot Winds or Scorching Winds) is a 1973 Hindi film directed by M। S। Sathyu, based on an unpublished short story by, Ismat Chughtai and adapted for screen by Kaifi Azmi…

9th December: India Untouched

india is a land of great culture, civilization and of great barriers too…prevailing in our cast custom and our society…watch this vivid award winning documentary by Stalin k। portraying the disparities in our society…

10th December: bhoomikaa

Legendary actress Smita Patil tryst with herself as being second sex ……a Shyam Benegal film showing the maveric actress fighting to overcome over hegemony and search for her identity…



Time: 6pm



Place: gandhi bhavan , polytechnic chauraha

Organized by : Yuva samvad

yuvasambadbhopal@gmail।com Bhopal contact: 9754762958


27 सितंबर 2009

देश को तोड़ता है जातिवाद

देश में एक सामूहिक चेतना के विकास में सबसे बड़ा बाधक है जातिवाद। ब्राह्मणवाद संचालित हमारी जातिव्यवस्था हमेशा से ही अवसरवाद की चरम अनुयायी और पतनशील राज्यव्यस्थाओ की सहभागी तथा सहयोगी रही है। आजादी के दौर में पनपे तीनो विचारधारात्मक सरणियों में क्रांतिकारी विचारधारा के वैचारिक प्रतिनिधि भगत सिंह ने अछूत समस्या पर पहली बार वैज्ञानिक तरीके से व्याख्यायित किया। वह पूरी सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन चाहते थे। इसीलिये यथास्थितिवादी कांग्रेस और पुनरुत्थानवादी मुस्लिम लीग और संघ दोनों ही भगत सिंह की वैचारिक विरासत के वाहक नहीं हो सकते। देशभक्ति उनके लिये देश की जनता को साम्राज्यवाद से मुक्ति दिलाकर एक शोषणमुक्त समाज की स्थापना थी । यह कहा भगत सिंह के जन्म दिवस पर युवा संवाद द्वारा आयोजित खुली बहस में भागीदारी करते हुए सेंट स्टीफ़ेंस कालेज के डा संजय ने। विषय था- देश देशभक्ति और भगत सिंह
अध्यक्ष डा जी के सक्सेना ने कहा कि हम हमेशा से दोहरे संस्कारों से घिरे रहे हैं। यहां अपनी गलतियों के लिये माफ़ी का रिवाज़ नही बल्कि उसे झुठलाने की कोशिश की जाती है। शहीदों की मूर्तियां हमने लगवायीं पर विचार तिरोहित कर दिये।
अजय गुलाटी ने कहा कि युवा संवाद जातीय, धार्मिक तथा लैंगिक भेदभाव के ख़िलाफ़ चेतना विकसित करने का काम करता रहेगा। आम जन आगे आकर हमारा सहयोग करें ताकि इस काम में गति आ सके।।
इस अवसर पर ग्वालियर इकाई द्वारा प्रकाशित पुस्तिका '' भगत सिंह ने कहा'' और भोपाल इकाई द्वारा प्रकाशित '' अंबेडकर से नई मुलाकात का वक़्त'' का विमोचन भी हुआ।
कार्यक्रम में युवा संवाद और स्त्री अधिकार संगठन के साथ शहर के बुद्धिजीवियों, युवाओं तथा नaगरिकों ने प्रभावी भागीदारी की।
भगत सिंह के जन्म दिवस पर

04 सितंबर 2009

भगत सिंह ने कहा

युवा संवाद ने प्रतिवर्ष की तरह इस साल भी भारतीय युवा की क्रांतिकारी चेतना के प्रतीक शहीद भगत सिंह की जन्मतिथि २७ सितम्बर को युवा दिवस के रूप में मना रहा है। इस के साथ ही हम उनके जन्म दिवस को युवा दिवस घोषित कराने तथा उनके लेखों को पाठ्यक्रम में शामिल कराने की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान भी चला रहे हैं।
इस अवसर पर हमने '' भगत सिंह ने कहा'' शीर्षक से भगत सिंह के चार लेखों तथा एक पत्र का संकलन भी प्रकाशित किया है। इसमे शामिल लेख हैं - अछूत समस्या, धर्म और हमारा स्वाधीनता संग्राम, इंक़लाब जिंदाबाद का अर्थ तथा विद्यार्थी और राजनीति। साथ ही जेल से लाहौर के छात्र सम्मलेन को भेजा गया उनका पत्र भी इसमे शामिल किया गया है। इसका मूल्य रखा है ५ रूपये। आप इस अभियान में शामिल होना चाहें तो इसे मंगा सकते हैं।
साथ ही २७ तारीख को हम 'देश, देशभक्ति और भगत सिंह ' विषय पर एक खुली बहस का आयोजन कर रहे हैं जिसमे दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रोफेसर संजय मुख्य वक्ता होंगे.

11 मई 2009

कामगार : कल और आज


पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार कल १० मई को युवा संवाद , ग्वालियर ने होटल एम्बेसडर में कामगार : कल और आज विषय पर एक "खुली बहस " का आयोजन किया।


इस बहस में भागीदारी के लिए एटक, सीटू, गुक्टू, आल इंडिया लायर्स एसोसिएसन, नगर निगम सफाई कर्मचारी मोर्चा , आडिट एंड एकाउंट्स एसोसिएसन, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन, स्त्री अधिकार संगठन , रेलवे मेंस एसोसिएशन सहित अनेक संगठनो के प्रतिनिधि शरीक हुए।


बहस के लिए तीन प्रमुख प्रश्न निर्धारित थे


क्या ट्रेड यूनियन आन्दोलन और व्यवस्था परिवर्तन के व्यापक संघर्ष के बीच की कडी कमज़ोर हुई है?




२ ट्रेड यूनियन आन्दोलन व्हाइट कालर कामगारों और असंगठित कामगारों तक क्यों नही पहुँच पा रहा है?




३ ऐसा तो नही कि बदलते समय के साथ पूंजीवाद के बदलते परिदृश्य के अनुरूप यह स्वयँ को ढालने मे असमर्थ रहा है। फ़िर इसका भविष्य क्या है?




जैसा कि स्वाभाविक ही था, आरम्भ मे मुख्य ट्रेड युनियनो के प्रतिनिधियों के लिये यह काफ़ी असुविधाजनक सवाल बने। नगर निगम ने इसे यह कहकर और भडका दिया कि पार्टियों से जुडे युनियन भ्रष्ट तथा अप्रासन्गिक हो गये हैं । आरोप प्रत्यारोप भी हुए और कहा गया कि अब भी हम लाखों की भीड जुटा लेते हैं … आधा गिलास भरा है तो युवा सम्वाद के अजय गुलाटी का कहना था कि यह लाखों की भीड वोटों में भी तो नही बदल पाती…गिलास पहले दो तिहाई भरा था अब रोज़ खाली हो रहा है। हम क्यों नहीं अपने ट्रेड युनियनो को अर्थवाद के दायरे से बाहर निकाल इस लायक बना पाये कि वे कह सके कि अगर पूंजीपति या सरकार फ़ैक्ट्री चलाने में असमर्थ हैं तो उसे सहकार से हम चला के दिखायेंगे।


गहमागहमी और ग़र्माग़र्मी के बीच सँचालक ने याद दिलाया कि हम दुश्मन नही बल्कि एक मुश्किल वक़्त मे रास्ता तलाशने निकले दोस्त हैं । आलोचना और आत्मालोचना हमारी क्रान्तिकारी सन्स्कृति का हिस्सा हैं । अनुभवी मज़्दूर नेता सतीश गोविला ने विस्तार से बात करते हुए कहा कि यह सच है की भूले हुई हैं और हम पीछे भी गये हैं लेकिन उम्मीद अब भी है …यह आयोजन इस दिशा मे एक महत्वपूर्ण कदम है…यही स्वर एटक के अध्यक्ष कामरेड वृष्भान और आल इण्डिया लायर्स एसोसिएशन के गुरुदत्त शर्मा का भी था।


अन्त मे निर्णाय लिया गया कि इस प्रक्रिया को ज़ारी रखा जाये और भविष्य मे हमारे समय के समाजवाद पर एक बडी परिचर्चा करायी जाये तथा शहर मे मिलजुल कर एक " कामगार जोडो अभियान " चलाया जाय।


23 मार्च 2009

भगत सिंह को याद करो

आज ग्वालिअर में भी युवा संवाद ने ७ नंबर चौराहे पर भगत सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की.

27 फ़रवरी 2009

युवा सम्वाद तथा स्त्री अधिकार संगठन का संयुक्त आयोजन

साथियो

आगामी ८ तारीख को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सौ वर्ष पूरे हो रहे है। इन वर्षो में महिलाओ की सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक स्थिति में व्यापक परिवर्तन आया है। काम के घंटो को १६ से १२ करने की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आन्दोलन तमाम पडावो को पार कर आज उस जगह पर पहुँच गया है कि सँवैधानिक स्तर पर अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन दिखायी देते हैं , परन्तु सामाजिक स्तर पर भेदभाव अब भी ज़ारी हैं। साथ ही महिला मुक्ति का प्रश्न आज भी बेहद उलझा हुआ है। विशुद्ध रूप से इसे आर्थिक मुक्ति से लेकर देह को इसका उत्स मानने वाले अनेक लोग अपने अपने तर्कों के साथ परिदृश्य पर मौज़ूद हैं। साथ ही एनजीओ के सतत विस्तार ने भी इसे अपने तरीक़े से प्रभावित किया है।

इन सबके बीच आज कहाँ है दुनिया मे औरत? बाज़ार के सर्वग्रासी विस्तार के बीच उसकी मुक्ति का सवाल अब किस रूप मे उपस्थित है? और इसकी राह किधर है?

इन्ही सब सवालों के इर्दगिर्द युवा सम्वाद ने स्त्री अधिकार संगठन के साथ मिलकर आगामी ७ मार्च को एक खुली बहस का आयोजन किया है। शाम चार बजे से सिटी सेन्टर स्थित स्वास्थय प्रबंधन सन्स्थान मे आयोजित इस कार्यक्रम मे स्त्री अधिकार सन्गठन, दिल्ली से जुडी जानी मानी लेखिका अन्जलि सिन्हा की प्रमुख भागीदारी होगी और अन्नपूर्णा भदोरिया करेंगी ।

आईये मिलकर सोचें -

25 फ़रवरी 2009

दुनिया में औरत



साथियो,


'युवा दखल' का अगला अंक अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के १०० वर्ष पूरे होने के अवसर पर 'दुनिया मे औरत' पर केन्द्रित विशेषांक होगा। गम्भीर वैचारिक लेखो की जगह हमारा ज़ोर विभिन्न जगहों पर औरतों के साथ होने वाले भेदभावो पर ख़ुद उनके अनुभव और विचारो पर केन्द्रित करना है। हम 'घर मे औरत', 'दफ़्तर मे औरत', 'अख़बार में औरत', 'खेल में औरत', 'आन्दोलन में औरत' जैसे विषयों पर इस बार आलेख देना चाहते हैं ।


आप सब इस प्रयास में हमारे साझेदार हो सकते हैं । अपने अनुभव और विचार लिख भेजिये।


आप जानते ही है कि युवा दख़ल एक द्वैमासिक विचार बुलेटिन है जिसे युवा सम्वाद, ग्वालियर अपने ही सन्साधनो से निकालता है और युवाओं के बीच व्यापक स्तर पर वितरित करता है। दो रुपये की क़ीमत वाली इस बुलेटिन को देश भर मे भेजने का प्रयास किया जाता है।


हमारा ई मेल है…

ashokk34@gmail.com
या
naidakhal@gmail.com

05 फ़रवरी 2009

हमारे समय में प्रेम



वसन्त पंचमी अभी बीती है और वेलेन्टाईन डे एक बार फिर करीब है। शहर के थोड़ा बाहर जाये तो सरसों की पीली चादर ओढे धरती प्रेम का संदेश बाँट रही है और हवाएँ इसकी खुशबू से सराबोर है। ऐसे में इस बदलते हुए समय में प्रेम का मतलब क्या है? क्या है प्रेम की भारतीय परम्परा और कैसे उसे बदलती हुई सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने बदला है? प्रेम में क्या ग़लत है और क्या सही तथा इसके समर्थन व विरोध में उठने वाले स्वरो की हक़ीक़त क्या है? इन्ही सब सवालों के साथ ‘युवा सम्वाद’ आप सबके बीच उपस्थित है।

आदम और हव्वा के ज़माने से ही पुरुष और स्त्री के बीच प्रेम का सहज आकर्षण और समाज द्वारा उसके नियन्त्रण की कोशिशें ज़ारी हैं। मनोविज्ञान और जीवविज्ञान दोनों इसे सहज और प्राकृतिक बताते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थायें बनी और उसमें विभिन्न संस्तर (layers) बने वैसे-वैसे ही प्रेम पर नियंत्रण की कोशिशें और तेज़ होती गईं। जाति, धर्म तथा अमीरी-ग़रीबी मे बँटे समाज में प्रेम का अर्थ भी बदला और रूप भी। राजा-महाराजाओ के सामंती युग में विवाह और प्रेम का निर्णय व्यक्तिगत न होकर सामाजिक हो गये। पिता और समाज के नियंता पुरोहित, पादरी और मुल्ले तय करने लगे कि किसकी शादी किसके साथ होनी चाहिये। पुरुषप्रधान समाज में औरतों और दलित कही जाने वाली जातियों को घरों में क़ैद कर दिया गया और उनकी पढाई-लिखाई पर रोक लगा दी गयी कि कहीं वे अपने अधिकारों की माँग न कर बैठे। ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता’ किताबों मे क़ैद रहा और औरतें चूल्हे से लेकर चिताओं तक में सुलगती रहीं।

सामन्ती समाज के विघटन के साथ-साथ जो नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था औद्योगिक क्रान्ति के साथ सामने आई उसने जनतन्त्र को जन्म दिया जो मूलतः समानता, भाईचारे और व्यक्ति की स्वतंत्र अस्मिता ( identity) के सम्मान पर आधारित थी। यह आज़ादी अपनी ज़िन्दगी के तमाम फ़ैसलों की आज़ादी थी और समानता का मतलब था जन्म ( (भारत के सन्दर्भ में धर्म, जाति, ज़ेन्डर और क्षेत्रीयता) के आधार पर होने वाले भेदभावो का अन्त। यही वज़ह थी कि हमारे संविधान मे जहां सबको वोट देने का हक़ दिया गया वहीं दलितों, स्त्रियों और दूसरे वंचित तबक़ों की सुरक्षा तथा प्रगति के लिये प्रावधान भी किये गये। अन्तर्जातीय तथा अन्तर्धार्मिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देकर जीवनसाथी चुनने के हक़ को सामाजिक से व्यक्तिगत निर्णय मे बदल दिया गया।

लेकिन दुर्भाग्य से जहां संविधान में ये क्रान्तिकारी प्रावधान किये गये समाज मे ऐसा कोई बडा आन्दोलन खडा नही हो पाया और जाति तथा धर्म के बन्धन तो मज़बूत हुए ही साथ ही औरतों को भी बराबरी का स्थान नही दिया जा सका। पन्चायतो से महानगरों तक प्रेम पर पहरे और भी कडे होते गये।

इसी के साथ बाज़ार केन्द्रित आर्थिक व्यवस्था ने प्रेम और औरत को एक सेलेबल कमोडिटी में बदल दिया। हालत यह हुई कि प्रेम की सारी भावनाओं की जगह अब गर्लफ़्रैंड-ब्वायफ़्रैन्ड बनाना स्टेटस सिम्बल बनते गये। क्रीम-पावडर के बाज़ार ने सुन्दरता के नये-नये मानक (standard) बना दिये और प्रेम मानो सिक्स पैक और ज़ीरो फ़ीगर मे सिमट गया। वेलेन्टाइन ने प्रेम के लिये बलिदान किया था पर बाज़ार ने उसे ‘लव गुरु’ बना दिया। इस सारी प्रक्रिया ने कट्टरपन्थी मज़हबी लोगो को प्रेम और औरत की आज़ादी पर हमला करने के और मौके उपलब्ध करा दिये। यह हमला दरअसल हमारी संस्कृति तथा लोकतान्त्रिक अधिकारों पर हमला है।

दरअसल प्रेम का अर्थ क्या है? हमारा मानना है कि यह एक दूसरे की आज़ादी का पूरा सम्मान करते हुए बराबरी के आधार पर साथ रहने का व्यक्तिगत निर्णय है और इसमें दख़लन्दाज़ी का किसी को कोई अधिकार नहीं। बिना आपसी बराबरी और सम्मान के कभी भी सच्चा प्रेम हो ही नही सकता। आज विवाह क्या है? लडकी के सौन्दर्य और घरेलू कामो मे निपुणता तथा लडके की कमाई के बीच एक समझौता जिसकी क़ीमत है दहेज़ की रक़म। आखिर जो लडके/लडकी एक डाक्टर, इन्जीनियर, मैनेज़र या सरकारी अफ़सर के रूप में इतने बडे-बडे फ़ैसले लेते हैं वे अपना जीवनसाथी क्यों नहीं चुन सकते?

युवा सम्वाद का मानना है कि एक बराबरी वाले समाज में ही प्रेम अपने सच्चे रूप मे विकसित हो सकता है तथा इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया में तब्दील कर सकता है। प्रेम और शादी का अधिकार हमारा संवैधानिक हक़ है और व्यक्तिगत निर्णय। आप क्या सोचते हैं ?



08 जनवरी 2009

तीसरा राज्य स्तरीय युवा चिन्तन शिविर 2009


विगत वर्षो की तरह इस वर्ष भी युवा सम्वाद की विभिन्न जिला इकाईयों द्वारा भोपाल में दिनांक 30,31 जनवरी व 01 फरवरी २009 को आइकफ आश्रम, शाहपुरा झील के पास तीन दिवसीय आवासीय शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर के लिये प्रस्तावित कार्ययोजना निम्नानुसार है



प्रथम दिवस 30।01।2009 1 इतिहास एवं समाजिक परिवर्तन - समय प्रात: 10:00 बजे से 1 बजे तक - वक्ता : उमा शंकर तिवारी, प्रोफेसर आई. आई.आई टी , इलाहाबाद


2 साम्प्रदायिकता की राजनीति व उसका सामाजिक आयाम और विकल्प - समय दोपहर 2 बजे से 5 बजे तक - वक्ता : सुभाष गताड़े, सामाजिक चिंतक - दिल्ली


3 सांस्कृतिक कार्यक्रम के विभिन्न तरीकों पर चर्चा व प्रस्तूति की तैयारी समय साम 6 बजे से 8 बजें तक - सहजकर्ता - ‘‘संवेदन सास्कृतिक कार्यक्रम ’’ के साथी, अहमदाबाद


दुसरा दिवस 31.01.2009


1 युवा - छात्र व राजनैतिक हस्तक्षेप समय प्रात: 10:00 बजे से 1:00 बजें तक - वक्ता : अशोक कुमार पाण्डेय, ग्वालियर


2 युवा सम्वाद - अभी तक का सफर व भविष्य की रणनीति समय दोपहर 2 बजे से 6 बजे तक सहजकर्ता अजय गुलाटी - ग्वालियर, फैज - देवास, उपासना - भोपाल,


3 सांस्कृतिक कार्यक्रम के विभिन्न तरीकों पर चर्चा व प्रस्तुति की तैयारी शाम 6:30 बजे से 8 :30 बजें तक - सहजकर्ता - ‘‘संवेदन सास्कृतिक कार्यक्रम ’’ के साथी, अहमदाबाद


तीसरा दिवस 01.02.2009


1 संस्कृति व आधुनिकता - समय प्रात: 10 बजे से 1 बजे तक - वक्ता - हिरेन गांधी, , अहमदाबाद व प्रदीप भोपाल ।


2 मध्य प्रदेश में समाजिक जन-आंदोलन का इतिहास-प्रभाव व भविष्य : समय दोपहर 2 बजे से साम 4 बजे तक : वक्ता योगेश दिवान, राजनैतिक कार्यकर्ता, होशंगाबाद


3 कला व उसके प्रदर्शन के विभिन्न आयाम : समय 4 बजे से 5:30 बजे तक : वक्ता स्वरूप बेन व हिरेन गांधी ।


4 सांस्कृतिक संध्या का आयोजन शाम 6 बजे से


सम्पर्क


जावेद :9424401459 @ गौरव :9713420233 @ फैज : ९८२६११००८४ अशोक:9425787930 @ देवेश:09981583770 @ इमरान : ९३००७७५४१६ उपासना :9424401469

09 दिसंबर 2008

फ़िल्म प्रदर्शनी

युवा संवाद एवं पी. आर. एस. द्वारा ‘‘बिआंड द ब्रैकेट्स’’ के तहत दो दिवसीय फिल्म प्रदर्शनी का आयोजन गांधी भवन भोपाल में किया गया। ‘‘इन्सानी बराबरी और जमहूरीयत की ओर’’ के नारे से आयोजित इस फिल्म शो के पहले दिन ( 5/12/2008 ) को ‘‘खामो’श पानी’’ का प्रदर्शन किया गया। 5 दिसंबर को फिल्म की शुरुवात से पहले मुम्बई में आतंकवादी हमलों के शहीदों को दो मिनट का मौन रख कर भावभीनी श्रद्वांजली दी गई।सबीना सूमर द्वारा निर्देशित और किरण खेर अभिनीत ये फिल्म मुख्य रुप से पंजाबी भाषा में होने के बावजूद भी दर्शकों पर गहरा प्रभाव डालने में कामयाब रही। इस फिल्म में सत्तर के द’शक में पाकिस्तान में कट्टरता एव धार्मिक जड़ता की दलदल में फंसी एक महिला और उसके पुत्र की कहानी को बहुत प्रभावशाली तरीके से उकेरा गया है। फिल्म के अंत में खुली चर्चा का आयोजन किया गया। चर्चा के दौरान ये बात निकल कर आयी कि कट्टरता एव धार्मिक जड़ता किसी भी धर्म या दे’ा में हो उसका सबसे बड़ा खामियाजा महिलाऐं ही भुगतती है। फिल्म प्रदअर्शानी के दूसरे दिन( 6/12/2008 ) अहमदाबाद के दृष्टि ग्रुप के स्टलिन के. द्वारा निर्देशित ‘‘इंड़िया अनटच्ड’’ नामक डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया। यह फिल्म वर्तमान समय में भारत में व्याप्त छूआछूत और जातिप्रथा का ठोस विवरण देती है। इस फिल्म में भारत के सभी धर्मो में व्याप्त जाति व्यवस्था का तस्वीर है। ये फिल्म उन लोगों के लिए एक जवाब है जो ये कहते है कि जाति व्यवस्था और छूआछूत खत्म हो गइ है। भारत के लगभग 8 राज्यों में तीन सालों के दौरान बनायी गइ ये फिल्म दर्शको पर अमिट छाप छोड़ने में सफल रही। फिल्म के अतं में चर्चाकी गइ। चर्चा के दौरान ये बात निकल कर आयी कि जाति व्यवस्था खत्म नही हुइ है बल्कि वो अपने नये खोलों के साथ आज भी मजबूती के साथ हमारे समाज में मौजुद है। 6 दिसंबर का दिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए कुख्यात है लेकिन हम भूल जाते है कि इसी दिन बाबा साहेब आम्बेडकर की पुण्यतिथी भी होती है।जो कि भारत के दलित और वंचित तबकों के मुक्ती के प्रतिक है। ये हमें तय करना है कि हमें इस दिन को किस रुप में याद रखना चाहेगें?चर्चा के दौरान सभी सहमत थे कि साम्प्रदायिकता एव आतंकवाद एक दूसरे के पूरक है और हमें इन दोनों के खिलाफ ताकत से आवाज उठानी होगी तथा साम्प्रदायिकता एव आतंकवाद की अतिंम लड़ाइ वैचारिक स्तर पर लड़ी जायेगी और इसमें युवाओं की महती भूमिका होगी।इस फिल्म को लगभग 150 विभिन्न काWलेज के छात्रों,सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्वजीवियों ने देखा।

06 दिसंबर 2008

आतंकवाद तथा साम्प्रदायिकता के खिलाफ

युवा संवाद भोपाल ने भी ६ दिसम्बर को शान्ति मार्च निकाला
ग्वालियर में शान्ति मार्च में लेखक , कलाकार , संस्कृतिकर्मी और आम जन


मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि

युवा संवाद, ग्वालियर की पहलकदमी पर नगर के अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा कर्मचारी संगठनों ने आज बंबई में हुई आतंकी घटना के शिकार लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए ‘आतंकवाद तथा सांप्रदायिकता के खिलाफ‘ संयुक्त शांति मार्च निकाला । इसके पहले दो दिनो तक युवा संवाद ने ’शहर के विभिन्न चौराहों ,कालेजों तथा विश्वविद्यालय में पर्चा वितरण कर अभियान चलाया था । शास्त्री प्रतिमा , पड़ाव से आरम्भ हुए इस ’शांति मार्च में युवा संवाद, प्रगति’शील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, इप्टा, परवरिश संवाद, इण्डियन लायस एसोसिये’शन, कर्मचारी मोर्चा नगर निगम, ग्वालियर यूनाइZटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस, जनरल इंश्योरेंस डिविजनल एसोसिये’शन, परिवर्तन समूह, विवेकानंद नीडम, भारतेंदु रंगमंच तथा स्त्री अधिकार संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ बड़ी संख्या में लेखकों, कवियों ,बुद्धजिवियों , सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा आम लोगों ने भागीदारी की काली पट्टियाँ बांधे लोगों के हाथों में मोमबत्तियां तथा तख्तियां थीं जिन पर ‘आतंक नहीं शांति, ‘क्षेत्रवाद, जातिवाद,सांप्रदायिकता मुर्दाबाद‘,‘ समाजवाद, समृद्धि तथा शान्ति जैसे नारे लिखे थे । गांधी प्रतिमा, फूलबाग पर जाकर यह मार्च आमसभा में बदल गया जिसमें लोगों ने सांप्रदायिकता तथा आतंकवाद के खिलाफ संकल्पबद्ध होने की प्रतिज्ञा की तथा विभिन्न संगठनो से जुड़े लोगों ने आज के हालात में एक शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में बौद्धकि वर्ग की भूमिका पर विचार रखे । सभा के अंत में गांधी प्रतिमा पर मोमबत्तियां जलाकर तथा मौन रखकर इस हादसे तथा दे’श भर में सांप्रदायिक, जातीय तथा क्षेत्रवादी हिंसा के शिकार लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी ।