11 मई 2009

कामगार : कल और आज


पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार कल १० मई को युवा संवाद , ग्वालियर ने होटल एम्बेसडर में कामगार : कल और आज विषय पर एक "खुली बहस " का आयोजन किया।


इस बहस में भागीदारी के लिए एटक, सीटू, गुक्टू, आल इंडिया लायर्स एसोसिएसन, नगर निगम सफाई कर्मचारी मोर्चा , आडिट एंड एकाउंट्स एसोसिएसन, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन, स्त्री अधिकार संगठन , रेलवे मेंस एसोसिएशन सहित अनेक संगठनो के प्रतिनिधि शरीक हुए।


बहस के लिए तीन प्रमुख प्रश्न निर्धारित थे


क्या ट्रेड यूनियन आन्दोलन और व्यवस्था परिवर्तन के व्यापक संघर्ष के बीच की कडी कमज़ोर हुई है?




२ ट्रेड यूनियन आन्दोलन व्हाइट कालर कामगारों और असंगठित कामगारों तक क्यों नही पहुँच पा रहा है?




३ ऐसा तो नही कि बदलते समय के साथ पूंजीवाद के बदलते परिदृश्य के अनुरूप यह स्वयँ को ढालने मे असमर्थ रहा है। फ़िर इसका भविष्य क्या है?




जैसा कि स्वाभाविक ही था, आरम्भ मे मुख्य ट्रेड युनियनो के प्रतिनिधियों के लिये यह काफ़ी असुविधाजनक सवाल बने। नगर निगम ने इसे यह कहकर और भडका दिया कि पार्टियों से जुडे युनियन भ्रष्ट तथा अप्रासन्गिक हो गये हैं । आरोप प्रत्यारोप भी हुए और कहा गया कि अब भी हम लाखों की भीड जुटा लेते हैं … आधा गिलास भरा है तो युवा सम्वाद के अजय गुलाटी का कहना था कि यह लाखों की भीड वोटों में भी तो नही बदल पाती…गिलास पहले दो तिहाई भरा था अब रोज़ खाली हो रहा है। हम क्यों नहीं अपने ट्रेड युनियनो को अर्थवाद के दायरे से बाहर निकाल इस लायक बना पाये कि वे कह सके कि अगर पूंजीपति या सरकार फ़ैक्ट्री चलाने में असमर्थ हैं तो उसे सहकार से हम चला के दिखायेंगे।


गहमागहमी और ग़र्माग़र्मी के बीच सँचालक ने याद दिलाया कि हम दुश्मन नही बल्कि एक मुश्किल वक़्त मे रास्ता तलाशने निकले दोस्त हैं । आलोचना और आत्मालोचना हमारी क्रान्तिकारी सन्स्कृति का हिस्सा हैं । अनुभवी मज़्दूर नेता सतीश गोविला ने विस्तार से बात करते हुए कहा कि यह सच है की भूले हुई हैं और हम पीछे भी गये हैं लेकिन उम्मीद अब भी है …यह आयोजन इस दिशा मे एक महत्वपूर्ण कदम है…यही स्वर एटक के अध्यक्ष कामरेड वृष्भान और आल इण्डिया लायर्स एसोसिएशन के गुरुदत्त शर्मा का भी था।


अन्त मे निर्णाय लिया गया कि इस प्रक्रिया को ज़ारी रखा जाये और भविष्य मे हमारे समय के समाजवाद पर एक बडी परिचर्चा करायी जाये तथा शहर मे मिलजुल कर एक " कामगार जोडो अभियान " चलाया जाय।


8 टिप्‍पणियां:

अक्षर जब शब्द बनते हैं ने कहा…

ट्रेड युनियन आंदोलन की हालत भी अन्य आंदोलनों की तरह हो गयी क्योंकि इसके पैरोकार ही विपथगामी होने लगे।...अब तो कामगरों का सहारा खुद कामगर ही बनेंगे। कोई भी नेता आयेगा तो अपनी जेबें ही गरम करेगा।-
सुशील कुमार

जयराम ने कहा…

कामगार :कल और आज , अच्छा प्रयास ! कालक्रम में निरंतर विषय -वस्तु में बदलाव और गुणात्मक सुधार लाने का काम होते रहना चाहिए . आज के बदलते वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समाजवाद की दशा -दिशा तय होनी आवश्यक है . ऐसे ही छोटे -बड़े दवाब समूहों से लोकतंत्र चलता है . वहां कुछ लोगों का यह कहना - "हम लाखों की भीड जुटा लेते हैं … आधा गिलास भरा है " वास्तव में थोडा गंभीर हैं . मैं भी अक्सर आज के तमाम संगठनों में आत्म विवेचना का चलन कम हो रहा है .............. सदियों पुरानी लीक पर हुबहू घिसटने की आदत सी हो गई है ..................

virendra jain ने कहा…

कामरेड पूंजीवादी साम्राज्यवादी जगत में बदलाव की प्रक्रिया इकतरफा नहीं चलती अपितु वे भी हमारे आन्दोलन को कमजोर करने की निरंतर कोशिशें करते रहते हैं . कई बार वे अपने साधनों और अनैतिक अमानवीय आचरण के दबाव में हमारे ऊपर दिखाई देने लगते हैं. यह ऐसा ही कठिन समय है इसे समझदारी से स्वीकारना चाहिए तभी हम कुछ सुधारात्मक कदम उठा सकेंगे

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

औद्योगिकी करण का दूसरा दौर समाप्त हो चुका है और नया दौर आरंभ हुआ है। इस दौर में उद्योगों के स्वरूप में परिवर्तन आया है। एक और आईटी उद्योग जोरों पर है जहाँ इंजिनियरों को कामगार में बदल दिया गया है, ऊंचे वेतन का लालच दे कर 16-16 घंटों काम लिया जा रहा है। दूसरी ओर माल उत्पादक उद्योगों में लगभग सारा काम ठेकेदारों के जरिए न्यूनतम मजदूरी या उस से भी कम मजदूरी पर करवाया जा रहा है। बेरोजगारी की तलवार लटकी है। कानूनी संरक्षण समाप्तप्रायः है। ऐसे में संगठन के पुराने औजार भोंथरे सिद्ध हो रहे हैं। ट्रेडयूनियनें नये औजार गढ़ने में असमर्थ रही हैं। श्रमजीवियों का संघर्ष राजनैतिक दौर में पहुँच चुका है। जब कि ट्रेडयूनियनें अर्थवाद में उलझ कर पिछड़ चुकी हैं। वे आन्दोलनों को राजनैतिक दिशा देने में कामयाब नहीं हो सकीं। इन सब का खामियाजा तो भुगतना पड़ेगा।

लेकिन आशा की किरन डूबी नहीं है। समाज का विकास नियमों के तहत होता है। उस की दिशा एक ही होती है। वह पीछे नहीं लौटता। समाज कभी रहँट से पम्प के युग की ओर ही बढ़ता है। वह रहँट से चड़स के युग में नहीं लौटता। नयी परिस्थितियों के लिए नए औजार तलाशने होंगे और मुक्ति की चाह सब तलाश लेती है।

Babli ने कहा…

मेरे खाना मसाला ब्लॉग पर सुंदर टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
आपका ये ब्लॉग बड़ाही अच्छा लगा मुझे! बहुत बढ़िया! इसी तरह लिखते रहिये!

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

badhiya achha laga jaan kar . just keep it up.

mahinder pal singh

बेनामी ने कहा…

Congrats Ashok

But my apologies. My hindi is miserable. If it was English I would have understood more

Best of luck for your future blogs

Neela

yuva ने कहा…

In the age of extiction of idealogies in the world your commitment for the left is wonderful. Best wishes from me