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10 जून 2010

गुलाम भारत के साहित्य में अंग्रेज़ सरकार का विरोध नहीं दिखता- बोधिसत्व


बोधिसत्व - abodham@gmail.com


बोधिसत्व के लंबे आलेख की पहली क़िस्त पर आयी टिप्पणियों में आमतौर पर अगली के इंतज़ार की बात थी। आज प्रस्तुत है उसकी दूसरी क़िस्त जो गुलाम भारत के मुख्यधारा के लेखन की प्रवृतियों की पड़ताल करती है। ख़ासतौर पर उसके सवर्ण जातीय संरचना से उभरी प्रवृतियों की। अगली किस्तों में बात आज़ादी के बाद की।


हिंदी कविता का पिछला बीस साल


(तीन)

गुलाम भारत में भी मुख्य धारा का लेखन निर्बाध और निर्विरोध चलता रहा। भला किस में शक्ति थी कि मुख्यधारा के प्रवाह को रोकता या मुख्यधारा का लेखन इतना किताबी था कि उसे रोकने की कोई आवश्यकता ती ही नहीं। वह तो खुद कटा-छटा और सजा संवरा था, सेंसर्ड था। वहीं जो उच्छिष्ट साहित्य रचने वाले लोग थे वे रोज जेलों की हवा खा रहे थे। मुकद्दमें झेल रहे थे। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से सत्येन्द्र कुमार तनेजा के सम्पादन में प्रकाशित होने जा रहे उन नाटकों की सूची देख कर आप मेरे कहे को परख सकते हैं। जिन नाटकों पर रोक लगाई गई उनमें उग्र को छोड़ कर कोई कुलीन या मुख्यधारा का लेखक नहीं है। जिन सात नाटकों को छापा जा रहा है उनका और उनके लेखकों के नाम हैं- जख्मी पंजाब- किशन चंद जेबा-1922, शासन की पोल-देव दत्त-1922, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र-लाल क्रांति के पंजे में-1924, बरबादिए हिंद-गोबिंद राम-1929, रक्त ध्वज-अज्ञात-1931, लवण लीला-बुद्धिनाथ झा कैरव-1931। इन लेखकों में आपने उग्र जी के अलावा और शायद ही किसी का नाम सुना हो। निश्चय ही खोज करने पर ऐसे प्रतिबंधित और साहित्य का पता चलेगा। लेकिन इनमे कोई रचना प्रमुख धारा के लेखकों की न हो न होगी। क्योंकि प्रमुख धारा का लेखक बहुत विनम्र और संकोची हो चला था। उसे बहुत सुंदर और सुकोमल कथन कहने थे। उसे बाले के बाल जाल में तो नहीं उलझना था लेकिन जिस जगत को वह सामने रख रहा था उससे उसको कोई खतरा भी नहीं था।

ऐसा नहीं था कि अंग्रेजों की ज्यादतियों को साहित्य के देश से निकाला मिल गया था। देश भर में लगातार ऐसा लेखन होता रहा जिससे अंग्रेज सरकार की दिक्कतें बढ़ती रहीं। लेकिन उनके लेखक महान नहीं थे। वे किशन चंद जेवा थे या देव दत्त थे । वे संस्कारी लेखक नहीं थे कला कौशल की भाषा उनके पास न थी। वे यशपाल और अज्ञेय जितने कुशल चितेरे न थे। जो अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के युद्ध में क्रांतिकारी भूमिका तो निभा सकते हैं लेकिन लेखक के रूप में आते ही उनके मन में भरा सारा बारूद भूसा हो जाता है।

उग्र जेल जाएँगे लेकिन निराला का लेखन इतना निराला था कि कभी उन्हें उनके लिखे के लिए सरकार से एक नोटिस तक न मिली। हालावादी और प्यालावादी लेखकों पर भला कोई सरकार क्यों प्रतिबंध क्यों लगाए।

तो आज किसान मरते है तो मरें। आत्महत्या करते हैं तो करें मुख्य धारा के साहित्य में उनके लिए कोई जगह नहीं है। दिल्ली का कवि हो या बनारस का या मुंबई भोपाल का उसके लिए खास कट की कविता भली है। जो थोड़ी अच्छी हो थोड़ी सलोनी हो, थोड़ी सरस हो थोड़ी लंतरानी हो जिसमें बस काम बन जाता है तो और करने की क्या आवश्यकता है

हमारे लिए साम्प्रदायिकता का मुद्दा अहम है। हमारे लिए दुर्घटनाएँ हैं न लिखने को। सामाजिक सच्चाइयाँ हमें प्रेरित नहीं करतीं। हमारे लिए वह यथार्थ काम का नहीं है जो शाम के खाने का स्वाद बिगाड़ दे। हमारे लिए उसके विश्लेषण की गुंजायश नहीं है। हमारे लेखकों और कवियों आलोचकों को उन मुद्दों से मितली आती है। भला उन लोगों पर क्या लिखना जो आत्म हंता होते हैं। आत्महत्या करने वाले भला किस प्रकार प्रमुख पात्र के रूप में दर्ज किए जा सकते हैं। वे नायक नहीं हो सकते। उन पर लिख कर कोई लेखक अपनी लेखनी को क्यों अपवित्र करेगा। देश में औसतन तीन किसान रोज मरते हैं। किंतु देश में हर साल उन पर तीन कविता तीन कहानी तीन नाटक नहीं लिखा जाता। यह है हमारे साहित्य का यथार्थ ।

जिस प्रकार गुलाम भारत के साहित्य में अंग्रेज सरकार का विरोध नहीं दिखता उसी प्रकार लेखकों का एक बड़ा हिस्सा सवर्ण श्रेष्ठता का हिमायती रहा है। उसके लिए कुल वंश से बड़ा होना बहुत अहम था। परिचय में साफ-साफ लिखा जाता था कि फला कुल के पाण्डे हैं और नाना बड़े ज्ञानी थे और दलितों के प्रति उनमें दया भाव था। उस काल में प्रेमचंद को छोड़ दें तो दबे-कुचले लोगों पर लिखना एक फैशन जैसा था। दया का दिखावा था। न कि कोई वैचारिक आग्रह।