(युवा दख़ल की यह सौवीं पोस्ट सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता डा अम्बेडकर के विचारों पर केन्द्रित करते हुए हमें अत्यंत संतोष का अनुभव हो रहा है। एक नौसिखुए की तरह शुरुआत करके हमारा संगठन और ब्लाग इस समयावधि में काफ़ी परिपक्व हुए हैं। इस अवसर पर हम अपने सभी मित्रों, सहयोगियों, साथियों और पाठकों के अत्यंत आभारी है। युवा कहानीकार जितेंद्र का यह आलेख युवा दख़ल के ताज़ा मुद्रित अंक से बाबा साहब के जन्म दिवस 14 अप्रैल के अवसर पर)
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| डा अम्बेडकर |
डा. अंबेडकर और धार्मिक राष्ट्रवाद
जितेन्द्र विसारिया
यह किसी से छिपा नहीं है कि भारतीय इतिहास में दलितोद्धार के जितने भी आन्दोलन चले उनका सीधा विरोध, इस देश में सदियों से वर्तमान असमानता पर आधारित मनुष्यता विरोधी जाति और वर्णव्यवस्था से रहा है। इन आन्दोलनों के नायकों में चाहे कितना ही दृष्टि संकोच रहा हो, किन्तु उनका मानवता पर अटूट विश्वास संदेह से परे की वस्तु है। क्योंकि वे स्वयं इस समाज की अमानवीय व्यवस्था के भुक्तभोगी रह चुके थे। उन्होंने इसीलिए इन अमानवीय प्रथाओं के विरूद्ध आजन्म, कभी मुखर तो कभी शांत रूप में अपना विरोध दर्ज़ किया।...यह प्रक्रिया आज भी जारी है।
बाबा साहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर भी एक ऐसे ही मानवतावादी दलित चिंतक थे। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में इस देश की सबसे घृणित और अमानवीय जाति और वर्णव्यवस्था की देन, अस्पृश्यता के दंश को बड़ी गहराई से महसूस किया था। उनका मानना था कि ‘‘हिन्दू समाज में अन्तर्निहित जातिवाद के कारण, जो एक तरह का रंगभेद ही है, राष्ट्र बनाना मुश्किल साबित हुआ है और इतिहास में राष्ट्रवाद की भावना मौजूदगी की चर्चा करना बिल्कुल बेकार है। उनके अनुसार यह छुआछूत पर आधारित हिन्दू धर्म ही है-जो जोड़ने की जगह टूटने का उपदेश देता है’’(बी आर अम्बेडकर- पाकिस्तान या भारत का विभाजन, बाबा साहब डाॅ.अम्बेडकर संपूर्ण वांग्मय, खंड 15 बंबई, 2000 पृ,198.199) । जाति और वर्णव्यवस्था को हिन्दू धर्म और इस देश से समूल नष्ट करने के लिए उन्होंने, एक बड़े स्तर पर इससे दो-दो हाथ भी किये थे। लेकिन जाति और वर्ण के अहम् में डूबे देश के तत्कालीन सवर्ण समाज का उन्हें इसके लिए कोई सहयोग प्राप्त नहीं हो पाया था। गाँधी जैसे उदार और अश्यपृश्य हितैषी कहे जाने वाले नेता से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी थी! ‘‘गाँधी जी के चिंतन में भारत की पारंपरिक हिन्दू पहचान को बनाये रखने पर बड़ा जोर हैै। यहाँ तक कि हिन्दू-मुसलिम एकता की अपील करते समय भी अपने सार्वजनिक भाषणों में वह राष्ट्रीय नेता के रूप में दोनों का प्रतिनिधित्व करने वाले के रूप में न बोलकर हिन्दू नेता के रूप में ही अधिक बोलते थे।’’ (श्रीवास्तव रवि-अंबेडकर और उनका राष्ट्रवाद, प्रगतिषील वसुधा दलित स्त्री एवं मुक्ति का प्रश्न रचनात्मक अभिव्यक्ति के संदर्भ मार्च 2009 पृ.35.) बाबा साहब ने अस्पृश्यता के सवाल पर अछूतों को कर्मकांडी धार्मिकता से अलग होकर राजनीतिक अधिकारों पर ध्यान देने और गाँधीवाद से सावधान रहने की चेतावनी दी। उन्होंने कहा, ‘अछूतों को यह बात अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए कि हिन्दू धर्म सामाजिक न्याय की स्थापना करेगा चाहे वह काम इस्लाम,ईसाई या बौद्ध धर्म को ही क्यों न करना पड़े। वह तो स्वयं असमानता एवं अन्याय पर खड़ा है’’ (देखें श्रीवास्तव रवि, वही पृ.36) । देश की तथाकथित उच्च-जातियों के असहयोग से वह इतने आहत हुए थे कि उन्हें अपने जीवन के मध्यकाल में ही यह घोषणा करनी पड़ी कि ‘‘मैं भले ही हिन्दू के तौर पर जन्मा हूँ, लेकिन हिन्दू के तौर पर मरूँगा नहीं।’’ और यह सत्य ही सिद्ध हुआ, हिन्दू धर्म और वर्णव्यवस्था के भीतर स्वयं और इस देश के लाखों करोड़ों दलितों को उचित स्थान प्राप्त होता न देख उन्होंने एकला चलो की राह अपनाई। जिसमें उनके साथ अंत तक कोई उदार हिन्दू सम्मलित नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि उन्होंने अपने अपने हिन्दू होकर न मरने के उदघोष के बाद भी हिन्दू धर्म से किसी तरह की अपेक्षा नहीं की हो। वे लगातार संघ और सावरकर की ओर इस अपेक्षा की दृष्टि से सम्पर्क में रहे कि वे हिन्दू धर्म के बारे में कुछ सोचते हैं। इसके लिए उन्होंने एकाध बार संघ और स्वयं सेवकों के कार्यककलापों को नजदीक से देखने के अवसर भी प्राप्त किये थे। (देखें कोई हिन्दू पतित नहीं होताः श्रीधर पराड़कर, स्वदेश दीपावली विशेषांक-2006 ग्वालियर, पृ.08) पर वह अंततः समझ गये कि संघ की दिशा का न तो दलितोद्धार से कोई संबध है न ही एक मानवता पर आधारित एक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण से। लेकिन वह एक दिशा में बढ़ते हुए भी निरंतर इस देश के सवर्ण समाज के उन्मुख रहे, यह सामना कभी सीधा टकराहट भरा होता था तो कभी उदार भाव लिए, हिन्दू धर्म में बने रहने की उनकी तलाश संभवतः आखिरी वक्त तक बनी रही। वरना क्या कारण रहा, कि वह बौद्ध धर्म में प्रस्थान तब करते हैं जब उनके जीवन के मात्र 52-53 दिन ही शेष बच रहे थे!
मंदिर प्रवेश के प्रश्न पर अंबेडकर ने धर्मशास्त्रों की खुली अवमानना और सीधी कारवाई का रास्ता अपनाया। उसी का परिणाम था, 1924 में त्रावणकोर के वाइकाम मंदिर जाने वाली प्रतिबंधित सड़़क पर शूद्रों-दलितों का उतरना, 20 मार्च 1927 के दिन महाराष्ट के महाड़ में बाबा साहब की अगंवाई में सार्वजनिक तालाब से पानी पीने की घटना जिसे सवर्ण हिन्दुओं ने अपने लिए सुरक्षित रखा था, 20 सितंबर 1927 को बाबा साहब की अध्यक्षता में ढाई हजार दलितों के सम्मेलन में ‘मनुस्मृति’ का दहन। बाबा साहेब ने उसकी तुलना फ्रांसीसी राज्यक्रांति के दौरान बास्तील के पतन से की थी। इस घटना का ऐतिहासिक महत्व था क्योंकि उससे उपजी सवर्णों की हिंसक प्रतिक्रिया पर बाबा साहब ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, ‘हमारा उद्देश्य समाज में समान अधिकार पाना है हिन्दू समाज में रहते हुए जिस सीमा तक संभव है उस सीमा तक! यदि जरूरी हुआ तो व्यर्थ की हिन्दू पहचान को हम उतार फेकेंगे।’ (देखें, उद्धृत, एम. एस.गोरे’, द सोशल कांटेक्स्ट आइडियालाजी’ सेज’ दिल्ली’ पृ.91)
इसके बाद दलित-आंदोलन के इतिहास में जो सबसे बड़ी घटना थी वह थी नासिक के कालाराम मंदिर में अछूतों का प्रवेश। इससे पहले 1923 में बंबई की विधानसभा परिषद ने तालाबों’ कुंओं’ धर्मशालाओं आदि सार्वजनिक स्थलों को अछूतों के उपयोग की वैधानिक छूट दे दी थ्ंाी। मंदिर प्रवेश के लिए बाबा साहब ने 2 मार्च 1930 का दिन चुना। यह वही दिन था जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया था। लगभग पांच हजार अछूतों ने मंदिर की ओर कूच किया। बाबा साहब की यह लड़ाई स्वाधीनता-आंदोलन के गांधीवादी तौर-तरीके के विकल्प में एक समानान्तर आंदोलन की तरह थी। उसके पीछे की भावना था, जो माँग अंग्रेजी राज से तुम्हारी है वही माँग हमारी तुमसे भी है, यानि जाति-प्रथा से मुक्ति।(श्रीवास्तव रवि, वही पृ.34)
इतना होने के पूर्व ही यदि बाबा साहेब को दलितों के साथ हिन्दू धर्म में रुकने का अवसर मिलता तो भी उनका चेहरा आर.एस.एस या अन्य धार्मिक राष्ट्रवादियों से इतर ही होता। कालाराम मन्दिर प्रवेश के आसपास जब वह हिन्दू धर्म में दलितों को सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए संघर्षरत थे उस समय वह अपने केा प्रोटेस्ट हिन्दू कहलाने के पक्षधर थे। उस समय उनके भीतर नवीन हिन्दू मार्टिन लूथर किंग-प्रथम के प्रोटेस्ट ईसाई सा आकार पा रहा था, जिसने यूरोप में ईसाइयों के धर्मगुरू पोप और चर्च की सत्ता को चुनौती दी थी। बाबा साहब ने जब 3 जून 1927 को कालाराम मन्दिर प्रवेश का सत्याग्रह शुरू किया था, उस समय सावरकर ने उन्हें स्वतंत्र मंदिर बनाने की योजना सुझायी थी। बाबा साहेब ने सावरकर की इस स्वतंत्र मंदिर की अवधारणा का विरोध करते हुए कहा था, ‘‘नए मंदिर की कल्पना सुन्दर है, पर अस्पृश्यता दूर करने के उपाय के रूप में यदि वह अस्तित्व मेें आयेगी तो उससे सही मायने में अस्पृश्यता दूर न होकर, अस्पृश्यता बच्चों का खेल हो जाएगा। अस्पृश्यों को मंदिर में जाना है, उन्हें केवल अपना हक जताना है। अलग व्यवस्था करने से यदि अछूत लोग स्पृस्य होंगे तो अछूत, मांतग, चमार बस्तियाँ अनादिकाल से आज तक अलग हैं, उसका परिणाम क्या हुआ? अमेरिका में भी अश्वेतों के लिए सन् 1896 में वहाँ के सर्वोच्च न्यायालय ने ‘अलग किंतु बराबर‘ (सेपरेट बट इक्वल) कानून का फैसला दिया था, जिसे मार्टिन लूथर किंग द्वतीय एवं अन्य नीग्रो आन्दोलन कारियों लम्बे संघर्ष के बाद अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने 1954 में आकर खारिज किया। (देखें दलित साहित्य और अमेरिकन अश्वेत साहित्य-शरण कुमार लिम्बाले, पश्यंती अप्रैल-जून 1998 पृ.73-74) बाबा साहेब हिन्दू धर्म को महान आर्दश और घृणित कार्यों के बीच की पहेली मानते थे। इसीलिए उनका प्रारंभिक चरित्र हिन्दू धर्म से अलगाव का नहीं सुधार का रहा । वह हिन्दू धर्म में असमानता की जड़ उसके धार्मिक ग्रंथ मानते थे। इसलिए उन्होंने एक स्थान पर कहा भी था कि, ‘‘सारे हिन्दू धार्मिक ग्रंथों को तोप से उड़ाकर उनका पुर्नलेखन होना चाहिए।’’ तब उनका आशय निश्चय ही वर्तमान हिन्दूधर्म से नहीं था जो नानापंथ जाल में फँसा असमानता और शोषण का मायका बना हुआ है। मनुस्मृति दहन के पीछे भी उनकी यही मंशा थी। विध्वंस भी उसे ही शोभा देता है जो नवसृजन का उत्तरदायित्व निभाये। बाबा साहेब ने एक अमानवीय व्यवस्था पोषक ग्रंथ को जलाया तो उसके स्थान पर, इस देश में लोकतंत्र का वाहक और समता पर आधारित एक नया ग्रंथ (संविधान) रचा भी था। संसद भवन के सामने पंडित नेहरू को संविधान सौंपते हुए चित्र में उनके चेहरे पर जो गौरवमयी आत्मसंतुष्टि का तेज दिखाई देता है क्या वह चमक एक पुस्तक (भले ही वह असमानता का हिमालय और शोषण की गंगोत्री रही हो) को जलाने के बाद उसकी जगह बतौर कन्फेशन एक नवीन पुस्तक लिखने की आत्मसंतुष्टि तो नहीं? कहीं हमारा संविधान एक महान समाज सुधारक की लेखकीय संवेदनशीलता और वैचारिक जागरूकता का परिणाम तो नहीं? खैर अगर हम मुद्दे पर लौटतें हैं तब भी बात वहीं आकर ठहर जाती है। क्या डाॅ. अम्बेडकर बौद्ध धर्म में प्रयाण नहीं करते और उन्हें हिन्दू धर्म में सम्माजनक रूप से रूकने का अवसर प्राप्त होता, तब क्या उनका रास्ता वही होता जो आज विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का है। जबाब ना में ही होगा क्योंकि वह पुरानी लीक पर ज्यों के त्यों चलने के पक्षधर नहीं थे। हिन्दूधर्म को भी वह उसी रूप स्वीकार करने वाले नहीं थे। वह अवश्य कोई न कोई क्रांतिकारी परिवर्तन किये वगैर न मानते। तब उसमें धामिर्क राष्ट्रवाद और सामाजिक अलगाव बाद के लिए कितना स्थान शेष रहता इसका हम अंदाज लगा ही सकते हैं। क्योंकि जिस बौद्ध धर्म को हम दुनिया का सबसे वैज्ञानिक और तर्काधारित धर्म समझते हैं। उसे भी उन्होंने ठीक वैसा ही स्वीकार नहीं किया था। उसमें भी उन्होंने अपनी बाइस प्रतिज्ञाएँ शामिल की, ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नामक एक नवीन ग्रंथ रचा जो दुनिया के बौद्धों के लिए भले ही न सही पर भारत के बौद्धों की ‘बाईबल’ मानी जाती है, जिसके लिए बाबा साहब को बहुत से देशी और विदेशी पूर्व बौद्ध आचार्यों का कोप भाजन बनना पड़ा और सराहना भी मिली थी।7 (देखें, बुद्ध और उनका धम्म-बाबा साहेब अम्बेडकर, अनु. भदंत आनंद कौशल्यान भूमिका पृ0 6) लेकिन इसके लिए वह न तो झुके न ही समझौतावादी रास्ता अख्तियार किया। बाबा साहेब को हिन्दू धर्म में यदि किसी तरह रूकने का मौका/सहयोग और इस दिशा में कुछ स्वतंत्र करने के अवसर प्राप्त होते तो अवश्य ही आज हमारा रास्ता, भागलपुर बेलछी, अयोध्या, गुजरात और गोहाना से होकर नही जाता।