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12 फ़रवरी 2012

सोनी सोरी की रिहाई के लिए धरना होगा.







दखल विचार मंच की पूर्वनिर्धारित बैठक आज फूलबाग स्थित गाँधी प्रतिमा के पास हुई. इसमें निम्नलिखित निर्णय लिए गए.

१- आगामी शनिवार, १८ फरवरी को फूलबाग गेट पर शाम ३ बजे से ५ बजे तक सोनी सोरी की रिहाई तथा उनका उत्पीडन करने वाले पुलिसकर्मी के पुरस्कार पर पुनर्विचार की मांग के साथ धरना दिया जाएगा. इसमें ग्वालियर के विभिन्न संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार, ट्रेड युनियन कर्मी और बुद्धिजीवियों सहित आम जन की भागीदारी होगी.

२- आगामी २३ मार्च को शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की शहादत दिवस पर शहीद मेला का आयोजन किया जाएगा. इसमें उन पर आधारित नाटक, जनगीत, भाषण, पुस्तक प्रदर्शनी, पोस्टर प्रदर्शनी आदि का आयोजन होगा.

३- इस अवसर पर युवा दखल का शहीद अंक निकाला जाएगा. यह अंक आजादी की लड़ाई में शहीद हुए उन शहीदों पर केंद्रित होगा जिन्हें मुख्य धारा के इतिहास से बाहर रखा गया है. साथ ही इसमें आज के समय में हाशिए की तमाम लड़ाइयों पर सामग्री होगी. सभी मित्रों से इसमें रचनात्मक तथा अन्य सहयोगों की अपेक्षा तथा अपील है.



बैठक में सर्वश्री राकेश अचल, राजेश शर्मा, जितेन्द्र बिसारिया, अशोक चौहान, अजय गुलाटी, अमित शर्मा, राहुल तिवारी, आशीष देवराड़ी, किरण पाण्डेय तथा अशोक कुमार पाण्डेय शामिल थे.

29 मई 2010

सवाल ज़मीन का

सोचो, करो कुछ भी..जमीन हमारी ही है!!
  • अशोक मालवीय

सरकार हो या पूंजीवादी ताकतें, इन्होंने कभी भी आदिवासियों को उनका हक नहीं देना चाह है? लेकिन जब जनाक्रोश एक सैलाब का रूप धारण कर लेता तो इसकी दहशत की वजह से इनके हक को दर्शाने वाले कानून तो बना दिये जाते है। परन्तु इसके सही क्रियान्वयन न करने की निरन्तर प्रक्रिया के चलते ऐसे कानून का थोड़ा-बहुत लाभ देकर इन्हें खत्म कर दिया जाता है। ठीक इस तरह की दोगली सोच के साथ लागू हुआ वनाधिकार कानून 2006 की असिलियत अब जगजाहिर होने लगी हैं। आदिवासियों और परम्परागत वन वासियों को इस कानून का सही मायने में लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस कानून की गड़बडी के चलते क्रियान्वयन की डवांडोल स्थितियां बनी हुई है। 1927 में बने पहले वन कानून के बाद से आजतक आदिवासियों को कई उलझनों में उलझाकर उनका शोषण का सिलसिला चलता ही जा रहा है।

पिछले महिने प्रदेश कांग्र्रेस अध्यक्ष सुरेश पचैरी ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान के गृह क्षेत्र बुधनी का दौराकर एक मामला उछला कि आदिवासियों को पट्टे नहीं मिल रहे है। इसके लिये कई जगह गुहार ला दी पर कोई सुनता ही नहीं है। मसला सिर्फ राजनैतिक मुद्दा बन ही नहीं हैं, सोचने की बात है कि प्रदेष के राजा के क्षेत्र में यह वनअधिकार के यह हाल है तो दूर-दराज के आदिवासी अंचलों में स्थितियां होगी?? मुख्यमंत्री के गृह जिला सीहोर में पट्टे के लिये 12284 दावे आये थे जिनमें से प्रशासन ने 9151 दावों को निरस्त कर दिया। निरस्त दावों का कोई जबाब भी नहींें मिला और मिला भी तो गुमराह करने वाला।  इस कानून में अहम भूमिका ग्रामसभा को दी गई है। ग्राम सभा और वन अधिकार समिति स्तर पर तो अधिकतर दावों को मंजूरी दे दी जाती है परन्तु बढ़ते क्रम में उपखण्ड स्तरीय व जिला स्तरीय समिति में बडी संख्या में  दावे खारिज कर दिये जाते है। इन समितियों जनप्रतिनिधि व प्रशासकीय अमला होता है।। इस तरह देखे तो इस प्रक्रिया में ग्रामसभा की भूमिका महत्वपूर्ण नजर ही नहीं आती है। जबकि इस कानून की धारा 2 (छ) में स्पष्ट कहा गया है कि औपनिवेशिक काल से चली आ रही वन प्रशासन को प्रजातांत्रिकरण करने के लिये ग्राम सभा को सशक्त एवं सर्वमान्य बनाना होगा। प्रदेष में वनविभाग और अन्य शक्तिशाली नुमाईंदो ने इस कानून के प्रमुख लक्ष्यों को धराशायी कर दिया हैं, साथ ही ग्रामसभा को सशक्त होने की प्रक्रिया को खत्म कर दिया हैं, कई जगह तो वन अधिकार समितियां आज तक नहीं बनाई गई हैं। कुलमिलाकर अभी भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से वन विभाग की दादागिरी ही कारगार साबित हो रही है। दूसरा सरकारी आंकड़ो से ज्ञात ही नही होता कि जिन लोगो को व्यक्तिगत पट्टा दिया गया है, इन्होंने कितने एकड़ जमीन के लिये आवेदन किया था । और कितने एकड़ जमीन का पट्टा दिया गया है। 

वास्तव में तो सरकार की इच्छा इस कानून को लागू करने ही नहीं थी तभी तो इस विधेयक को लागू करने में आनाकानी करते हुये ढेड़ वर्ष की देरी कर दी। ऊपरी मन से दी गई मान्यता का ही नतीजा है कि ना ही इस कानून का प्रचार-प्रसार किया गया, ना ही लोगों को इसकी ठीक-ठीक जानकारी दी गई। इस कानून के लागू होने के डेढ़ वर्ष बाद आज भी न ग्राम सभा का,े ना ही वनअधिकार समिति को इस संबंध में कुछ पता है और ना ही इनके प्रस्ताव कही लिए गये। आज भी आधे से अधिक आदिवासी इस कानून के नाम, लक्ष्य व प्रक्रिया से अनभिज्ञ है। कानून का प्रमुख लक्ष्य है कि आदिवासियों को उनके गांव की पारम्परिक सीमा में सामुदायिक अधिकार देना है। हमारी सरकार मात्र व्यक्तिगत पट््टा देना ही आपनी पूर्ण जिम्मेदारी से मुक्त होना ही समझ रही है। वन संसाधन पर सामूदायिक अधिकार लोगों को मिलना इस कानून का प्रमुख प्रावधान हैं। वन संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार ही तो आदिवासी की अस्मिता को बचाऐ रखने का मूल आधार है। यह महत्वपूर्ण इसलिये और भी हैं कि वन संसाधनों पर अभी दावा करके अधिकार स्थापित नहीं किया गया तो फिर समुदायिक उपयोग और संरक्षण का अधिकार नहीं मिल पायेगा। वन संसाधन का उपयोग प्रदेष की आबादी के 20 प्रतिषत आदिवासी के अलावा जंगलों से लगे 18 प्रतिषत गांव के लोग भी इस का उपयोग करते है। परन्तु सरकारें इन संसाधनों पर लोगों को अधिकार देना ही नहीं चाहती हैं, इसी वजह से आज तक सामुदायिक अधिकार के दावा फार्म बिल्न्कुल नहीं भरवाये जा रहे है। कानून के अनुसार दो फार्म भरवाऐं जाने चाहिये थे, एक व्यक्तिगत अधिकार का दावा फार्म और दूसरा सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार के लिए, पर सामुदायिक अधिकार का फार्म क्यों नहीं भरवाऐं जा रहे हैं? जिसके चलते अभी तक कहीं भी वनसासियों को सामुदायिक अधिकार नहीं दिये गये है।

इस कानून में अन्य परम्परागत वन निवासियों के लिये उनके पूर्वजों की तीन पीढ़ियों के रहने का प्रमाण साबित करने का प्रावधान रखा गया है इन दोनों तरह के दस्तावेजों को जुटाने की शर्त ने पारम्परिक आदिवासी व जंगलवासी को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। इन प्रमाणों को प्रषासन के सामने पेष करने के लिये इन्हें लोहे के चने चबाने पड़ रहे हेै। और सरकार भी इन लोगों को सबूत मोहिया कराने में कोई मद्द नहीं कर रही है। जिस जगह पट्टा देने की प्रक्रिया चल रही है वहां पर इनकी जमीन नपाई पारम्परिक रूप से चैन के जरिये होना चाहिये था जबकि मषीन के जरिये से हो रही है। मशीन का खेल इन लोगों को समझ नहीं आता हैं। कई जगह तो नपाई के दौरान मषीन खराब हो गई तो वह मशीन वापिस चली गई। और यहां के लोग आज तक इन्तजार कर रहे हैं कि कब आयेगी मषीन और आगे की प्रक्रिया पूरी होगी और हमें पट्टा मिलेगे। दावा फार्म भरने के लिये एक समय सीमा तय की गई थी, पर कई जगह इसकी जानकारी लोगों को देरी से दी गई,, तब प्रमाण पत्र जुटाने में देर हो गई। तथा बहुत से लोग इस दौरान रोजगार के लिये पलायन कर गये थे। ऐसी स्थितियों में ये कैसे आवेदन कर पाते। कानून में स्पस्ट है कि परिवार जितने एकड़ जमीन पर खेती करता है उसे उतनी जमीन दी जायेगी जो कि अधिकतम 10 एकड़ तक हो सकती है। पर लोगों ने जितने एकड़ जमीन पर हक के लिये दावा किया है, उसमें से आधी-अधूरी जमीन का ही पट्टा मिल रहा हैं। वन विभाग को साफ निर्देष दिया गया है कि जब तक भूमि अधिकारों का सत्यापन पूरा नहीं हो जाता तब तक किसी को बेदखल नहीं करें। इसके लिये म.प्र. सरकार ने इस प्रक्रिया का स्वरूप और उसकी समयअवधि तय की हैं। परन्तु इसका भी सरे आम उल्लखन हो रहा है। लोगों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। दमोह में 30 आदिवासियों को पट्टे देने का कहकर पुलिस चैकी में बुलाया और उन्हें जंगल से लकड़ी चुराने के नाम पर बन्द कर दिया गया, जमीन अतिक्रमण के नाम पर उनके झोपड़ो में आग लगा दी गई। इसी तरह बैतूल, शिवपुरी, गुना, झाबुआ, अशोकनगर, मण्डला सहित प्रदेश में ऐसी घटना आये दिन हो रही है।


वनअधिकार कानून के क्रियान्वयन में हो रही इन गड़बड़ियों को देखकर प्रदेषभर के आदिवासी लाभबंद हो रहे है। जिसको देखते हुऐ और केन्द्र सरकार की टिप्पणी के आधार पर प्रदेष के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान ने एक बैठक में कहा कि निरस्त हुये दावों पर पुनः गौर किया जायेगा । परन्तु स्वयं व सरकार को बचाते हुये, उन्होंने कहा हैे कि ग्राम सभाओं के झगड़े व गांवों की आपसी गुटबाजी के कारण गड़बड़ संभव हैं। यह कहां तक उचित है कि ग्रामसभा और गांव को गुनाहगार ठहराकर स्वयं बचा जाये। उनको शायद नहीं मालूम हैं कि वनविभाग की दादागिरी व जबरन की दखलअंदाजी की चलते दिक्क्तें पैदा हो रही है जबकि वनविभाग को इसका कोई अधिकार नहीं हैं तथा इस कानून के लागू करने की मंषा सरकार की नही थी? पर ऊपरी मंषा से इसे लागू करना ही पड़ा और इस विधेयक की प्रस्तावना में स्वीकार किया गया है कि आदिवासियों पर ऐतिहासिक रूप से अन्याय हुआ हैं और जंगल पर उनके अधिकार सही स्थापित नहीं किये गये इसलिये अन्याय को दूर करने के लिये यह कदम उठाया गया हैं। पर हमारी सरकार भी एक कठपूतली की भूमिका मंे ही है। और इसी नचाने वाले और कोई हैं, सरकार उन्हें प्रसन्नचित रखने के लिये उनके इषारे को वरदान मानकर उन पर नाचने को अपना सौभाग समझती है। इसी तरह इस कानून के पीछे कि वास्तविक मंषा तो विष्वबैंक व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुष करने की है, जो कि भारत की वन सम्पत्ति पर अपनी नियत लगाये हुये बैठे है। विष्वबैंक ने अपने कई प्रस्तावों व घोषणाओं में स्वष्ट रूप से आदिवासियों को अधिकार देने की बात बड़ी चलाकी से कही है। ऐसे ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियो तो भारत के वनो पर अपनी मालकियत जमाना ही चाहती हैं परन्तु वह यह भी नहीं चाहते है कि इस मंषा के चलते अदिवासियों के हक छुडाऐ जाऐं। क्योंकि इस तरह करने से मानवअधिकार हनन का षोर मचेगा, और उन्हें कटघरे में खडा होना पड़े। अतः विश्वबैंक व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों इतनी चालाक है कि  उन्होंने इस कानून के रूप में छुट-पूट अधिकार देने का समर्थन किया है, ताकि यह आदिवासी अपने हक की मांग नही उठाऐंगें तथा चुप रहेगें तो उन्हें इस वन सम्पदा का बाजारीकरण करने में दिक्कतें नहीं आयेगी।


आदिवासी व अन्य वनवासियों नेे लम्बे संघर्ष के बाद इस कानून को लागू करवाया है तथा इस कानून से मिले अधिकार के रूप में पट्टे मिलने मात्र से पूर्ण अधिकार नहीं मिल सकतें। क्योंकि जंगल से संबंधित जो भी कानून अभी तक आये हैं, उनका मकसद समाज के एक खास तबके को लाभ पहुंचाना ही रहा है। सरकारें, विष्वबैंक, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों इन्हें हथयाने के लिये कुछ भी कर ले पर वन सम्पदा  हमारी रही है और रहेगी, इनकी चालों को नाकाम करना ही पडेगा। इस कानून के तहत आदिवासी केवल जमीन का एक टुकडा नहीं चाहते है वे जमीन सहित संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग व संरक्षण का सम्पूर्ण हक चाहते है। इन आदिवासियों की मंशा व्यक्तिगत स्वार्थ की नहीं बल्कि जंगल, खनिज संसाधन, वन्य जीव, पानी पर संरक्षण करते हुये अपना जीवन जीना चाहते है।

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20 मई 2010

क्या बच्चे बड़ों के उपनिवेश हैं?

इनके भी हक़ूक हैं!
बड़ों के उपनिवेश नहीं हैं बच्चे 

  •  चन्दन यादव


किसी एक देश पर दूसरे देश के प्रत्यक्ष राजनैतिक शासन को ‘उपनिवेश’ कहा जाता है, अगर  उपनिवेश शब्द को इंसानों के लिये उपयोग किया जा सके तो मैं कहूंगा कि बच्चे अभी तक बडों के ‘उपनिवेश’ बने हुए हैं। चूंकि वे अपनी परवरिश के लिये अपने से बड़ों पर निर्भर हैं, इसलिये इससे उनकी मुक्ति तभी संभव है जब बड़े यह समझ सकें कि बच्चों पर उनके औपनिवेशिक शासन की अन्तर्वस्तु क्या है ? और यह बच्चों के वर्तमान और उनके भविष्य को किस तरह प्रभावित कर रही है ?

दुनिया के सारे माँ बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो। इसलिये वे ये तय करते हैं कि बच्चे क्या करें, क्या ना करें ? वे किस तरह की पढ़ाई करें ? बच्चों की दासता की सबसे बड़ी वजह, बड़ों की यही चाह है। चूंकि बच्चे क्या करें, कैसे करें, आदि उनके भविष्य से जुड़े सवाल हैं। बच्चों के भविष्य की तैयारी से जुड़े सवाल हैं, और बड़ों के लिये यही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इसलिये बच्चों का वर्तमान संकट में है। वे अपने वर्तमान की पीठ पर भविष्य के बोझ की ऐसी गठरी ढो रहे हैं, जिसके बारे में वे खुद भी नहीं जानते कि इस गठरी का क्या होने वाला है ? किसी भी इंसान के लिये इससे दुर्भाग्यपूर्ण कुछ और नहीं हो सकता कि वह अपने वर्तमान में ना जी पाये। वर्तमान में जीने का मतलब है, अपनी इच्छा और खुशी के काम कर सकना। जो अभी है, उसमें जीना। अपने समय और समाज के प्रति जो जिज्ञासा है, उसको अपनी तरह से समझने के लिये स्वतंत्र होना। किसी भी बच्चे के लिये आज यह बहुत मायने नहीं रखता कि उसे बड़ा होकर इंजीनियर, डाक्टर या आई. ए. एस. बनना है। अभी उसके लिये खेलना, चित्र बनाना, संगीत सुनना, नाचना, आज स्कूल नहीं जाना या कुछ भी नहीं करना, इनमें से कोई बात, मायने रखने वाली हो सकती है। बड़ों के लिये ये सब बातें बच्चे के भविष्य के लिये घातक हैं। इसलिये वे उन पर भविष्य की तैयारी का बोझ लादते हैं। धीरे धीरे बहुत से बच्चे इसी के लिये अनुकूलित हो जाते हैं। वे कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिये तैयारी करते हैं। इसमें असफल हो जाने पर कुछ आत्महत्या भी कर बैठते हैं। कुछ इंजीनियर, डाक्टर या आई. ए. एस. भी बन जाते हैं। पर ये सफल लोग भी अपनी इच्छा और खुशी को बचपन में ही इतने गहरे दफन कर चुके होते हैं कि आजीवन उसको पहचानने में असमर्थ बने रहते हैं। वे आजीवन भविष्य की तैयारी के लिये जीते हैं। पर भविष्य की तैयारी आज जीने से भिन्न है। इसमें कल के लिये धन दौलत जुटाना और अपने बच्चों को कुछ उसी तरह के भविष्य के लिये मुस्तैद करना, जिससे गुजरकर वे यहाँ तक पहुंचे हैं, से ज्यादा क्या हो सकता है ? नतीजतन हम ऐसा सामाजिक वातावरण पाते हैं, जिसमें सब तेजी से भाग रहे हैं। दूसरों के मुकाबले पिछड़ जाने से भयभीत और कुण्ठित तथा अपने समय और समाज से कटे हुए लोग पाते हैं। इस तरह का समाज बच्चों को, बड़ों की इच्छाओं का ‘उपनिवेश’ बना देने का नतीजा है। इसके उलट अगर बच्चों को बनी बनाई मान्यताओं को अपनाने की जगह खुद सोचने समझने के मौके दिये जायें। उन्हें अपनी रुचि को पहचानने की मोहलत दी जाये, तब भी वे षायद कोई बड़ा सपना ही देखेंगे। पर वह उनका अपना सपना होगा।    

बच्चों से जुड़ा दूसरा पक्ष ‘समाज’ है जो परिवारों का समूह होने के कारण इससे भिन्न नहीं है। समाज और बच्चों के रिश्ते पर जो मैं यहाँ कह रहा हूं वो परिवारों पर भी लागू होता है। बच्चों के बारे में समाज की मान्यता यह है कि वे नादान हैं, इसलिये उनको समाज के तौर तरीके और मूल्य मान्यताएं समझाना बड़ों का फर्ज है। तो बड़े बच्चों को समझाते हैं कि झूठ मत बोलो, चोरी करना बुरी बात है, अपने से बड़ों का सम्मान करो, ये करो, वो मत करो बगैरा। ये सूची कितनी लम्बी हो सकती है इसका जिक्र मस्तराम कपूर ने अपने एक लेख में किया है। उन्होंने लिखा है कि वे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में शामिल हुए थे जिसका विषय ‘मानव मूल्यों की पहचान’ था। इसमें शामिल विद्वानों ने उस समय बच्चों को सिखाने के लिये 83 मानव मूल्यों की पहचान की थी। तथा इसमें 400 मानव मूल्यों को खोजने का लक्ष्य रखा गया था। इससे पता चलता है कि बड़े बच्चों को सिखाने के लिये कितने लालायित रहते हैं। और दरअसल यह होता हेै कि झूठ मत बोलो सिखाने वाले पिताजी को बच्चा आफिस से छुट्टी लेने के लिये बीमारी का बहाना करते देखता है। चोरी मत करो सिखाने वाले पिताजी को रिष्वत का पैसा घर में लाते देखता है। बच्चे सुनते हैं कि बड़ों का आदर करो। पर व्यवहार में पाते हैं कि घर के नौकर और खुद से हैसियत में छोटे लोगों के बारे में यह बात लागू नहीं होती। तो बच्चों को संस्कारित करने के इस पूरे प्रपंच से बच्चा ये सीखता है कि अच्छी अच्छी बातें पढ़ने और बोलने के लिये ही हैं। असली बात है किसी भी तरह से अपना काम निकालना और सफलता पाना। 

बच्चों के लिये यह दुनिया इतनी बुरी नहीं होगी, अगर बड़े इस सोच से उबर पायें कि बच्चे नादान नहीं होते। वे अपने परिवार ओर परिवेश के वातावरण से सीखते हैं। उन पर अपने विचार थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिये। बल्कि सीखने में उनकी सहायता करनी चाहिये। उन्हें अपनी खुशी और रुचि से सीखने की मोहलत दी जानी चाहिये। 

बच्चों के सरोकारों से वास्ता रखने वाली दो अन्य संस्थाएं हैं, स्कूल और सरकार। स्कूल पर मैं सिर्फ इतनी टिप्पणी करना चाहता हूं कि वे हमारे ‘समाज’ के आईने हैं। सरकार इंसानों को संसाधन की तरह देखती है। इसके लिये बाकायदा ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ नाम का एक विभाग अस्तित्व में है। हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षा के बारे में इस तरह के अनुमान साफ पढ़े जा सकते हैं जिनमें यह उल्लेख होता है कि आने वाले कुछ सालों में इस देश को इतने साक्षर मजदूर, इतने क्लर्क, इतने साफटवेयर इंजीनियर, आदि की आवष्यकता होगी। जिसके लिये फलां फलां प्रबंध किये जाने के लिये फलां राशि की आवष्यकता होगी। इंसानों के बारे में की जाने वाली ये बातें सरकार के इंसानों, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, के बारे में किसी मानवीय समझ को नहीं, ‘मानव संसाधन प्रबंध’ को दर्शाती हैं। 

अतः हम कह सकते हैं कि बच्चे बड़ों के ‘उपनिवेश’ बने हुए हैं। उन्हें भविष्य में काम आने वाली चीज बनने के लिये तैयार किया जा रहा है। इसलिये उनके पास इतना अवकाश नहीं है कि वे अपने आसपास घट रही बातों के बारे में सोच सकें। वे अपने समय और समाज की वास्तविकताओं से इतने अनिभिज्ञ हैं कि उन्हें कोई भी लालकृष्ण या रामचन्द्र धर्म, संस्कृति, देश और जाति के नाम पर भड़का सकता है। वे जकड़न और अकेलापन महसूस करते हैं, कुण्ठित होते हैं। असफलता उन्हें इतना तोड़ देती है कि वे आत्महत्या तक कर लेते हैं।

इसलिये अगर हम एक सचमुच का लोकतांत्रिक और बराबरी पर आधारित समाज बनाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले बच्चों से पेश आने का तरीका बदलना होगा।                                                                       

11 अप्रैल 2010

‘सारे हिन्दू धार्मिक ग्रंथों को तोप से उड़ाकर उनका पुर्नलेखन होना चाहिए।



(युवा दख़ल की यह सौवीं पोस्ट सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता डा अम्बेडकर के विचारों पर केन्द्रित  करते हुए हमें अत्यंत संतोष का अनुभव हो रहा है। एक नौसिखुए की तरह शुरुआत करके हमारा संगठन और ब्लाग इस समयावधि में काफ़ी परिपक्व हुए हैं। इस अवसर पर हम अपने सभी मित्रों, सहयोगियों, साथियों और पाठकों के अत्यंत आभारी है। युवा कहानीकार जितेंद्र का यह आलेख युवा दख़ल के ताज़ा मुद्रित अंक से बाबा साहब के जन्म दिवस 14 अप्रैल के अवसर पर)



डा अम्बेडकर
डा. अंबेडकर और धार्मिक राष्ट्रवाद
जितेन्द्र विसारिया

यह किसी से छिपा नहीं है कि भारतीय इतिहास में दलितोद्धार के जितने भी आन्दोलन चले उनका सीधा विरोध, इस देश में सदियों से वर्तमान असमानता पर आधारित मनुष्यता विरोधी जाति और वर्णव्यवस्था से रहा है। इन आन्दोलनों के नायकों में चाहे कितना ही दृष्टि संकोच रहा हो, किन्तु उनका मानवता पर अटूट विश्वास संदेह से परे की वस्तु है। क्योंकि वे स्वयं इस समाज की अमानवीय व्यवस्था के भुक्तभोगी रह चुके थे। उन्होंने इसीलिए इन अमानवीय प्रथाओं के विरूद्ध आजन्म, कभी मुखर तो कभी शांत रूप में अपना विरोध दर्ज़ किया।...यह प्रक्रिया आज भी जारी है।

बाबा साहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर भी एक ऐसे ही मानवतावादी दलित चिंतक थे। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में इस देश की सबसे घृणित और अमानवीय जाति और वर्णव्यवस्था की देन, अस्पृश्यता के दंश को बड़ी गहराई से महसूस किया था। उनका मानना था कि ‘हिन्दू समाज में अन्तर्निहित जातिवाद के कारण, जो एक तरह का रंगभेद ही है, राष्ट्र बनाना मुश्किल साबित हुआ है और इतिहास में राष्ट्रवाद की भावना मौजूदगी की चर्चा करना बिल्कुल बेकार है। उनके अनुसार यह छुआछूत पर आधारित हिन्दू धर्म ही है-जो जोड़ने की जगह टूटने का उपदेश देता है’’(बी आर अम्बेडकर- पाकिस्तान या भारत का विभाजन, बाबा साहब डाॅ.अम्बेडकर संपूर्ण वांग्मय, खंड 15 बंबई, 2000 पृ,198.199) । जाति और वर्णव्यवस्था को हिन्दू धर्म और इस देश से समूल नष्ट करने के लिए उन्होंने, एक बड़े स्तर पर इससे दो-दो हाथ भी किये थे। लेकिन जाति और वर्ण के अहम् में डूबे देश के तत्कालीन सवर्ण समाज का उन्हें इसके लिए कोई सहयोग प्राप्त नहीं हो पाया था। गाँधी जैसे उदार और अश्यपृश्य हितैषी कहे जाने वाले नेता से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी थी! ‘‘गाँधी जी के चिंतन में भारत की पारंपरिक हिन्दू पहचान को बनाये रखने पर बड़ा जोर हैै। यहाँ तक कि हिन्दू-मुसलिम एकता की अपील करते समय भी अपने सार्वजनिक भाषणों में वह राष्ट्रीय नेता के रूप में दोनों का प्रतिनिधित्व करने वाले के रूप में न बोलकर हिन्दू नेता के रूप में ही अधिक बोलते थे।’’ (श्रीवास्तव रवि-अंबेडकर और उनका राष्ट्रवाद, प्रगतिषील वसुधा दलित स्त्री एवं मुक्ति का प्रश्न रचनात्मक अभिव्यक्ति के संदर्भ मार्च 2009 पृ.35.) बाबा साहब ने अस्पृश्यता के सवाल पर अछूतों को कर्मकांडी धार्मिकता से अलग होकर राजनीतिक अधिकारों पर ध्यान देने और गाँधीवाद से सावधान रहने की चेतावनी दी। उन्होंने कहा, ‘अछूतों को यह बात अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए कि हिन्दू धर्म सामाजिक न्याय की स्थापना करेगा चाहे वह काम इस्लाम,ईसाई या बौद्ध धर्म को ही क्यों न करना पड़े। वह तो स्वयं असमानता एवं अन्याय पर खड़ा है’’ (देखें श्रीवास्तव रवि, वही पृ.36) । देश की तथाकथित उच्च-जातियों के असहयोग से वह इतने आहत हुए थे कि उन्हें अपने जीवन के मध्यकाल में ही यह घोषणा करनी पड़ी कि ‘‘मैं भले ही हिन्दू के तौर पर जन्मा हूँ, लेकिन हिन्दू के तौर पर मरूँगा नहीं।’’ और यह सत्य ही सिद्ध हुआ, हिन्दू धर्म और वर्णव्यवस्था के भीतर स्वयं और इस देश के लाखों करोड़ों दलितों को उचित स्थान प्राप्त होता न देख उन्होंने एकला चलो की राह अपनाई। जिसमें उनके साथ अंत तक कोई उदार हिन्दू सम्मलित नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि उन्होंने अपने अपने हिन्दू होकर न मरने के उदघोष के बाद भी हिन्दू धर्म से किसी तरह की अपेक्षा नहीं की हो। वे लगातार संघ और सावरकर की ओर इस अपेक्षा की दृष्टि से सम्पर्क में रहे कि वे हिन्दू धर्म के बारे में कुछ सोचते हैं। इसके लिए उन्होंने एकाध बार संघ और स्वयं सेवकों के कार्यककलापों को नजदीक से देखने के अवसर भी प्राप्त किये थे। (देखें कोई हिन्दू पतित नहीं होताः श्रीधर पराड़कर, स्वदेश दीपावली विशेषांक-2006 ग्वालियर, पृ.08) पर वह अंततः समझ गये कि संघ की दिशा का न तो दलितोद्धार से कोई संबध है न ही एक मानवता पर आधारित एक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण से। लेकिन वह एक दिशा में बढ़ते हुए भी निरंतर इस देश के सवर्ण समाज के उन्मुख रहे, यह सामना कभी सीधा टकराहट भरा होता था तो कभी उदार भाव लिए, हिन्दू धर्म में बने रहने की उनकी तलाश संभवतः आखिरी वक्त तक बनी रही। वरना क्या कारण रहा, कि वह बौद्ध धर्म में प्रस्थान तब करते हैं जब उनके जीवन के मात्र 52-53 दिन ही शेष बच रहे थे! 

मंदिर प्रवेश के प्रश्न पर अंबेडकर ने धर्मशास्त्रों की खुली अवमानना और सीधी कारवाई का रास्ता अपनाया। उसी का परिणाम था, 1924 में त्रावणकोर के वाइकाम मंदिर जाने वाली प्रतिबंधित सड़़क पर शूद्रों-दलितों का उतरना, 20 मार्च 1927 के दिन महाराष्ट के महाड़ में बाबा साहब की अगंवाई में सार्वजनिक तालाब से पानी पीने की घटना जिसे सवर्ण हिन्दुओं ने अपने लिए सुरक्षित रखा था, 20 सितंबर 1927 को बाबा साहब की अध्यक्षता में ढाई हजार दलितों के सम्मेलन में ‘मनुस्मृति’ का दहन। बाबा साहेब ने उसकी तुलना फ्रांसीसी राज्यक्रांति के दौरान बास्तील के पतन से की थी। इस घटना का ऐतिहासिक महत्व था क्योंकि उससे उपजी सवर्णों की हिंसक प्रतिक्रिया पर बाबा साहब ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, ‘हमारा उद्देश्य समाज में समान अधिकार पाना है हिन्दू समाज में रहते हुए जिस सीमा तक संभव है उस सीमा तक! यदि जरूरी हुआ तो व्यर्थ की हिन्दू पहचान को हम उतार फेकेंगे।’ (देखें, उद्धृत, एम. एस.गोरे’, द सोशल कांटेक्स्ट आइडियालाजी’ सेज’ दिल्ली’ पृ.91)

 इसके बाद दलित-आंदोलन के इतिहास में जो सबसे बड़ी घटना थी वह थी नासिक के कालाराम मंदिर में अछूतों का प्रवेश। इससे पहले 1923 में बंबई की विधानसभा परिषद ने तालाबों’ कुंओं’ धर्मशालाओं आदि सार्वजनिक स्थलों को अछूतों के उपयोग की वैधानिक छूट दे दी थ्ंाी। मंदिर प्रवेश के लिए बाबा साहब ने 2 मार्च 1930 का दिन चुना। यह वही दिन था जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया था। लगभग पांच हजार अछूतों ने मंदिर की ओर कूच किया। बाबा साहब की यह लड़ाई स्वाधीनता-आंदोलन के गांधीवादी तौर-तरीके के विकल्प में एक समानान्तर आंदोलन की तरह थी। उसके पीछे की भावना था, जो माँग अंग्रेजी राज से तुम्हारी है वही माँग हमारी तुमसे भी है, यानि जाति-प्रथा से मुक्ति।(श्रीवास्तव रवि, वही पृ.34)

 इतना होने के पूर्व ही यदि बाबा साहेब को दलितों के साथ हिन्दू धर्म में रुकने का अवसर मिलता तो भी उनका चेहरा आर.एस.एस या अन्य धार्मिक राष्ट्रवादियों से इतर ही होता। कालाराम मन्दिर प्रवेश के आसपास जब वह हिन्दू धर्म में दलितों को सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए संघर्षरत थे उस समय वह अपने केा प्रोटेस्ट हिन्दू कहलाने के पक्षधर थे। उस समय उनके भीतर नवीन हिन्दू मार्टिन लूथर किंग-प्रथम के प्रोटेस्ट ईसाई सा आकार पा रहा था, जिसने यूरोप में ईसाइयों के धर्मगुरू पोप और चर्च की सत्ता को चुनौती दी थी। बाबा साहब ने जब 3 जून 1927 को कालाराम मन्दिर प्रवेश का सत्याग्रह शुरू किया था, उस समय सावरकर ने उन्हें स्वतंत्र मंदिर बनाने की योजना सुझायी थी। बाबा साहेब ने सावरकर की इस स्वतंत्र मंदिर की अवधारणा का विरोध करते हुए कहा था, ‘‘नए मंदिर की कल्पना सुन्दर है, पर अस्पृश्यता दूर करने के उपाय के रूप में यदि वह अस्तित्व मेें आयेगी तो उससे सही मायने में अस्पृश्यता दूर न होकर, अस्पृश्यता बच्चों का खेल हो जाएगा। अस्पृश्यों को मंदिर में जाना है, उन्हें केवल अपना हक जताना है। अलग व्यवस्था करने से यदि अछूत लोग स्पृस्य होंगे तो अछूत, मांतग, चमार बस्तियाँ अनादिकाल से आज तक अलग हैं, उसका परिणाम क्या हुआ? अमेरिका में भी अश्वेतों के लिए सन् 1896 में वहाँ के सर्वोच्च न्यायालय ने ‘अलग किंतु बराबर‘ (सेपरेट बट इक्वल) कानून का फैसला दिया था, जिसे मार्टिन लूथर किंग द्वतीय एवं अन्य नीग्रो आन्दोलन कारियों लम्बे संघर्ष के बाद अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने 1954 में आकर खारिज किया। (देखें दलित साहित्य और अमेरिकन अश्वेत साहित्य-शरण कुमार लिम्बाले, पश्यंती अप्रैल-जून 1998 पृ.73-74) बाबा साहेब हिन्दू धर्म को महान आर्दश और घृणित कार्यों के बीच की पहेली मानते थे। इसीलिए उनका प्रारंभिक चरित्र हिन्दू धर्म से अलगाव का नहीं सुधार का रहा । वह हिन्दू धर्म में असमानता की जड़ उसके धार्मिक ग्रंथ मानते थे। इसलिए उन्होंने एक स्थान पर कहा भी था कि, ‘सारे हिन्दू धार्मिक ग्रंथों को तोप से उड़ाकर उनका पुर्नलेखन होना चाहिए। तब उनका आशय निश्चय ही वर्तमान हिन्दूधर्म से नहीं था जो नानापंथ जाल में फँसा असमानता और शोषण का मायका बना हुआ है। मनुस्मृति दहन के पीछे भी उनकी यही मंशा थी। विध्वंस भी उसे ही शोभा देता है जो नवसृजन का उत्तरदायित्व निभाये। बाबा साहेब ने एक अमानवीय व्यवस्था पोषक ग्रंथ को जलाया तो उसके स्थान पर, इस देश में लोकतंत्र का वाहक और समता पर आधारित एक नया ग्रंथ (संविधान) रचा भी था। संसद भवन के सामने पंडित नेहरू को संविधान सौंपते हुए चित्र में उनके चेहरे पर जो गौरवमयी आत्मसंतुष्टि का तेज दिखाई देता है क्या वह चमक एक पुस्तक (भले ही वह असमानता का हिमालय और शोषण की गंगोत्री रही हो) को जलाने के बाद उसकी जगह बतौर कन्फेशन एक नवीन पुस्तक लिखने की आत्मसंतुष्टि तो नहीं? कहीं हमारा संविधान एक महान समाज सुधारक की लेखकीय संवेदनशीलता और वैचारिक जागरूकता का परिणाम तो नहीं? खैर अगर हम मुद्दे पर लौटतें हैं तब भी बात वहीं आकर ठहर जाती है। क्या डाॅ. अम्बेडकर बौद्ध धर्म में प्रयाण नहीं करते और उन्हें हिन्दू धर्म में सम्माजनक रूप से रूकने का अवसर प्राप्त होता, तब क्या उनका रास्ता वही होता जो आज विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का है। जबाब ना में ही होगा क्योंकि वह पुरानी लीक पर ज्यों के त्यों चलने के पक्षधर नहीं थे। हिन्दूधर्म को भी वह उसी रूप स्वीकार करने वाले नहीं थे। वह अवश्य कोई न कोई क्रांतिकारी परिवर्तन किये वगैर न मानते। तब उसमें धामिर्क राष्ट्रवाद और सामाजिक अलगाव बाद के लिए कितना स्थान शेष रहता इसका हम अंदाज लगा ही सकते हैं। क्योंकि जिस बौद्ध धर्म को हम दुनिया का सबसे वैज्ञानिक और तर्काधारित धर्म समझते हैं। उसे भी उन्होंने ठीक वैसा ही स्वीकार नहीं किया था। उसमें भी उन्होंने अपनी बाइस प्रतिज्ञाएँ शामिल की, ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नामक एक नवीन ग्रंथ रचा जो दुनिया के बौद्धों के लिए भले ही न सही पर भारत के बौद्धों की ‘बाईबल’ मानी जाती है, जिसके लिए बाबा साहब को बहुत से देशी और विदेशी पूर्व बौद्ध आचार्यों का कोप भाजन बनना पड़ा और सराहना भी मिली थी।7 (देखें, बुद्ध और उनका धम्म-बाबा साहेब अम्बेडकर, अनु. भदंत आनंद कौशल्यान भूमिका पृ0 6) लेकिन इसके लिए वह न तो झुके न ही समझौतावादी रास्ता अख्तियार किया। बाबा साहेब को हिन्दू धर्म में यदि किसी तरह रूकने का मौका/सहयोग और इस दिशा में कुछ स्वतंत्र करने के अवसर प्राप्त होते तो अवश्य ही आज हमारा रास्ता, भागलपुर बेलछी, अयोध्या, गुजरात और गोहाना से होकर नही जाता।  

05 मार्च 2010

भविष्यफल और वैज्ञानिकता


(युवा दख़ल पत्रिका पिछले दो सालों से ग्वालियर युवा संवाद द्वारा निकाली जा रही है। इस बार इसमें कुल पन्ने हैं १६ और मूल्य ५ रु… कवर पेज़ बनाया भाई रवि कुमार रावतभाटा ने। मंगाने के लिये मुझे मेल करें या फोन... यहाँ इसी अंक से विष्णु नागर जी का एक आलेख)

भविष्यफल और वैज्ञानिकता
- विष्णु नागर
वैज्ञानिक जंयत नार्लीकर समेत विद्वानों ने फलित ज्योतिष की सच्चाई जानने के संबंध में एक दिलचस्प प्रयोग किया, जिसके बारे में ‘नवनीत’ मासिक के ताजा अंक में एक आलेख छपा है। इन चारों ने मिलकर - जिनमें एक फलित ज्योतिष का ज्ञान रखने वाले भी है- 100 मेधावी और 100 सामान्य छात्रों की अलग-अलग जन्मककुंडलियां बनवाई। फिर इन सारी कुंडलियों को आपस में मिला दिया गया और इन छात्रों की बौद्धिक छमता के बारे में भविष्यवाणी करने के लिए सार्वजनिक रूप से ज्योतिषियों को आमंत्रित किया। 51 ज्योतिषी इतने कम? सामने आए और अपना जवाब भेजने की जहमत इनमें से भी लगभग आधे ज्योतिषियों 27 ने ही उठाई। उन्हें 40-40 कुंडलिया भेजी गई थी। इन 27 ज्योतिषियों ने जो जवाब भेजे, उनका सांख्यिकी विश्लेषण करने पर यह दिलचस्प नतीजा सामने आया कि उनकी भविष्यवाणी उतनी भी ठीक नहीं थीं, जितनी कि सिक्का उछाल कर चित-पट के आधार पर की गई कोई भविष्यवाणी निकलती है। अब ज्योतिषी इसके जवाब में पचास तर्क दे सकते हैं, जन्म समय ठीक नहीं रहा होगा, जन्मकुंडली बनाने वाला ठोक नहीं रहा होगा आदि-आदि, जैसा कि वे हमेशा करते हैं और करते रहेंगे। खैर, इन चार विद्वानों ने अपने आलेख में पश्चिम में हुए दो अन्य प्रयोगों का जिक्र किया है, जिनके नतीजे भी इसी तरह के निकले थे। मिशिगन विश्वविद्यालय में पीएचडी शौध का एक विषय जन्मकुडलियों की सच्चाई का वैज्ञानिक अध्ययन करना था। शोधकर्ता ने शोध के लिए कुल 3,456 जोड़ों को चुना, जिनमें से 2,978 सफल वैवाहिक जीवन बिता रहे थे। बाकी तलाक ले चुके थे या अलग रह रहे थे। इनकी जन्मकुडलियों को भी आपस में मिलाकर दो ज्योतिषियों को दिया गया। उनसे आपसी विचार-विमर्श करके यह तय करने को कहा गया था कि इन जोड़ों की जन्मकुंडलियां आपस में मिलती हैं या नहीं। उन्होंने जो नतीजे दिए, वे खोखले निकले। एक ओर प्रयोग यह किया गया कि क्या जन्म के समय ग्रहों की स्थिति ज्योतिष की मान्यता के अनुसार से उस व्यक्ति के स्वभाव और व्यवहार का निर्धारण होता है और क्या यह कहा जा सकता है कि उसके जीवन में ये-ये प्रमुख घटनाएं भविष्य में होंगी? इस मामले में भी काफी कम भविष्यवाणियां सही निकलीं।
तो यह हाल है उस ज्योतिष का, जिसे विज्ञान बताने के हर संभव प्रयास होते हैं जबकि विज्ञन किसी भी सत्य की परीक्षा प्रयोग के द्वारा करने पर जोर देता है और कोई भी प्रयोग, समान स्थितियों में करें तो वही नतीजे आने चाहिए, जो कि किसी ओर स्थान, समय तथा काल में आए थे। लेकिन यह बात कभी ज्योतिषी पर लागू नहीं होती। बहरहाल, ईश्वर और ज्योतिषी कम-से-कम दो ऐसे विषय हैं जिनमें इनकी अंधश्रद्धा है, उन्हें आप तर्कों से भले ही चुप करा दें, उनके ‘विश्वासों’ से उन्हें नहीं डिगा सकते। इसके कई जटिल कारण हैं। एक तो शायद यह है कि हममें से ज्यादातर को ‘संस्कारों’ से ही अवैज्ञानिकता मिलती है और विज्ञान की थोड़ी-बहुत पढ़ाई और अन्य छिटपुट अध्ययन-पर्यवेक्षण व्यक्ति के उन ‘संस्कारों’ में सेंध नहीं लगा पाते। एक कारण शायद जीवन की अनिश्चितताएं हैं। आजकल जिसके पास जितना ज्यादा है, वह उतना ही ज्यादा आशंकित और अनिश्चत भी है। वह और अधिक पाना चाहता है लेकिन जो उसने पा लिया है, उसके खोने का डर भी उसे लगातार रहता है। एक कारण शायद यह भी है कि हमारे यहां अंधविश्वासों और धर्म का लगभग चोली-दामन का साथ है, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके अलावा धर्म का आर्थिक साम्राज्य बहुत बड़ा है इसलिए उसका यह आर्थिक साम्राज्य धार्मिक साम्राज्य को कभी नष्ट नहीं होने देता। फिर तथाकथित जितने ‘सेलिब्रिटी’ हैं उनमें से 95 प्रतिशत या और भी ज्यादा धर्म तथा अंधविश्वासो से अपनी नजदीकी बताने में कोई संकोच नहीं करते। हमारे नेता, हमारे पूंजीपति, हमारी फिल्मी हस्तियां सबके सब धार्मिक से ज्यादा, अंधविश्वासी हैं।
इन्हीं सब वजहों से तमाम टीवी चैनल भी धड़ल्ले से और आत्मविश्वासों के साथ अंधविश्वासों का प्रचार करते हैं। फिर हम अखबार वाले भी तो अपना ‘विनम्र’ योगदान देते ही हैं! ऐसे में जयंत विष्णु नार्लीकर कितने कितने ही बड़े वैज्ञानिक हों, कितने ही विषयों पर कितनी ही तर्कपूर्ण बातें पिछले दो-तीन दशकों से करते रहें हों, उन्हें कोई भी सड़क छाप ज्योतिषी झिड़क देगा कि इन्हें आता क्या है? और इनकी बात पहुंची भी कितने लोगों तक है और पहुंचती भी है तो इस पहुंचने में निरंतरता कितनी होती है? और होती भी है तो धर्म तथा अंधविश्वास का प्रसार जिस निरंतरता से होता रहता है, उसके आगे इस वैज्ञानिक निरंतरता की क्या हैसियत? और फिर हमारे देश में तो अंतरिक्षयान भी जब नारियल फोड़ कर भेजा जाता है तो किस वैज्ञानिकता की बात करें? वैज्ञानिक भी जरूरी नहीं वैज्ञानिक दृष्टि वालें ही हों। आज जब विज्ञान का इतना विस्तार हो चुका है, तो विज्ञान भी दरअसल एक तकनीकी काम ज्यादा बन चुका है इसलिए बिना वैज्ञानिक दृष्टि के भी अच्छा सफल वैज्ञानिक बने रहना संभव है। मुझे तो अपना हिंदी लेखक समाज अपनी तमाम बुराइयों-कमियों के बावजूद कई बार ज्यादा वैज्ञानिक दृष्टि-संपन्न लगता है। कम से कम अपने सृजनात्मक व्यवहार में, अपने जीवन में भी ज्यादा समय, हालांकि इस बात को भी ज्यादा दूर खींचना ठीक नहीं। इसकी भी अपनी सीमाएं हैं। बहरहाल, तथ्य और सत्य भले ही धारा कि विपरीत हो, उन्हें सुनने-समझने को तैयार लोग कम हों तो भी उो कहना जरूरी है। तभी इसका दीर्घकालिक असर होता है। एक समय तो पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है, इसे भी सत्य मानने को धर्म तैयार नहीं था लेकिन आज है। आज धर्म विज्ञान से सीधी-सीधी मुठभेड़ मोल नहीं लेता। आज धर्म की कोशिश विज्ञान को हजम कर जाने की है, हालांकि विज्ञान में इतनी ज्याद हड्डियां हैं कि उसे पचाना भी आसान नहीं है बल्कि असंभव है। लकिन विज्ञान से ज्यादा मुश्किल है वैज्ञानिक दृष्टि का विकास और प्रसार। यह मनुष्यता की एक जटिल चुनौती है। इसलिए ज्योतिष सहित तमाम अवैज्ञानिक चीजें अपनी अंधविश्वास ताकत भविष्य में दिखाती रहेंगी। पुट्टपार्थी के साईबाबा टाइप लोग चमत्कार दिखा कर फलते-फुलते रहेंगे और उनके द्वारा किए गए ‘चमत्कारों’ के वैज्ञानिक आधार को स्पष्ट करने वाले उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। बीसवीं सदी विज्ञान की सदी कहलाती थी और थी भी। लेकिन पता नहीं कौन सी सदी वैज्ञानिक सोच की सदी होगी? क्या यह इक्कीसवीं सदी, जिसका पहला दषक ही अभी चल रहा है?

27 फ़रवरी 2010

आपका घर गच्ची वाला है

( देवास के हमारे साथी सौरभ का यह लेख युवा दख़ल के ताज़ा अंक में प्रकाशित है। होली की मस्तियों के बीच उम्मीद करता हूं आप इन्हें भी नहीं भुलेंगे!)


पूरे के चावल दे दो



देवास की एक बस्ती में करीब 34 लड़कियां हैं जो नियमित रूप से हमारे पास पढ़ने आती हैं। इन बच्चियों में मूल रूप से मुस्लिम और दलित किषोरियां हैं। उन्हें पता नहीं - कि क्यों पढ़ती हैं, बातचीत में पता चला कि उन्हें पढ़ने और स्कूल जाने के बराबर अवसर नहीं मिले और ना ही कभी वे स्कूल की फेंटेसी को जी पाई हैं। जब मैं रोज़ की तरह सेंटर पहुंचा तो बच्चों का हुजुम हमारे पिछे आ रहा था, करीब दो घंटा पढ़ाई के बाद, बात करते-करते एक बच्ची (मुस्कान 8 वर्ष) ने पूछा कि आप कहां रहते हो ? जवाहर नगर में, मैने कहा। उसने फिर पूछा सर आपका घर गच्ची वाला है ? पहले तो मुझे सवाल समझ नहीं आया कि गच्ची वाला का क्या मतलब है ? तो एक साथी ने बताया कि गच्ची वाला याने छत वाला घर। मैने जब मुस्कान से हां कहा तो उसने कहा - सर आप मुझे एक बार वहां ले चलोगे ? इस सवंाद से मुझे पहली बार एहसास हुआ कि घरों की पक्की दिवारों और छतों के भी अपने मायने होते हैं और वे किसी फेंटेसी से कम नहीं होते। इससे पहले शायद ही मैने कभी अपने घर की छत को देखा हो ?


ऐसे ही मैं एक बार बस्ती में किराने की दुकान पर खड़ा था, तभी एक आवाज़ आई, वह आवाज़ नर्गिस की थी। भैया पूरे के चावल दे दो। दुकानदार व्यस्त था शायद वह सुन नहीं पाया। नर्गिस फिर अपार ख़ुशी और आत्मविश्वास से तेज आवाज़ में पैसे रखकर बोली- भैया पूरे के चावल दे दो। यह संवाद मेरे आपे से बाहर का था, मैं पूरी तरह सिहर गया था क्योंकि नर्गीस के पूरे पैसे से मतलब 5 रूपये से था। एक बच्ची सिम्मो मेरे लिये आरिगेमी से कुत्ता बनाकर लाई और उसने अपने हाथ से उस पर मेरा नाम लिखा था। मैं नहीं समझ पा रहा था कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है। एक तरफ तो मुस्कान ने गच्ची वाला छत नहीं देखी, नर्गिस को 5 रूपये पूरे लगते हैं और यही बच्चे हमारे लिये तोहफे लायें हैं। यह सबकुछ मेरे लिये अनुपम, अद्भूत और ना जाने क्या क्या था। यह सब मेरे लिये इसलिये भी शायद अजीब और नया था क्योंकि मैं एक साफ्टवेअर इंजिनियर के रूप में एक मल्टीनेषनल कंपनी में काम किया करता था जहां मैं साल भर के 5 लाख रूपये कमाता था और मुझे तो वह भी कम लगते हैं। सौरभ वर्मा

22 जून 2009

अब दखल है हमारी प्रादेशिक पत्रिका

दोस्तों
जैसा कि आप जानते हैं कि युवा संवाद की ग्वालियर इकाई पिछले दो सालों से युवा दखल का प्रकाशन कर रही थी...ऐसे ही भोपाल से दस्तक और उज्जैन से भी तरकश नाम से एक-एक पत्रिका युवा संवाद की स्थानीय इकाइयाँ निकाल रही थी। पिछले राज्य सम्मलेन में हमने तय किया था कि इन सबको मिलाकर संयुक्त रूप से एक राज्य स्तरीय पत्रिका निकाली जायेगी।
अब इस योजना को मूर्त रूप दिया जा रहा है। नयी पत्रिका का नाम होगा ''युवा संवाद की दखल '' और २० पेजी इस पत्रिका का मूल्य होगा केवल ५ रूपये। पत्रिका विचार, साहित्य तथा रोज़ ब रोज़ के तमाम मुद्दों पर केंद्रित होगी।
पहला अंक २७ सितम्बर ( भगत सिंह के जन्म दिवस पर जिसे हम युवा दिवस के रूप में मनाते हैं) को प्रदेश के अलग अलग जगहों पर लोकार्पित किया जाएगा। यह अंक युवा शक्ति और परिवर्तन के सवाल पर केंद्रित होगा ।
आपके विचार और सहयोग आमंत्रित हैं.

17 नवंबर 2008

युवा दखल का नया अंक

युवा दखल का नया अंक '' वैश्विक आर्थिक संकट और भारत'' पर आधारित विशेषांक होगा। हम इसमे अमेरिका से आरम्भ होकर दुनिया भर में फैल चुके आर्थिक संकट के विविध पहलुओं और भारत पर उसके वर्तमान तथा भावी प्रभावों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करना चाहते हैं।

अगर आप इसमे अपना योगदान देना चाहते हैं तो अपने लेख इत्यादि हमारे मेल पर भेज सकते हैं। हम आभारी होंगे।

लेख हमारे पते पर भी भेजे जा सकते हैं।
अंक हम दिसम्बर के पहले हफ्ते में निकलना चाहते हैं।
संपादक मंडल, युवा दखल

15 सितंबर 2008

अब नई दखल होगी 'युवा दखल'


दोस्तों ,

कुछ तकनीकी कारणों से इस अंक से पत्रिका का नाम युवा दखल किया जा रहा है।


इस बार हमने इसे युवा विशेषांक के रूप में निकलने का फैसला किया है।

इस अंक में मीडिया पर "पवन मेराज" , "शिक्षा ,आरक्षण और बाज़ार" पर अजय गुलाटी , "नैनो और अनाज" पर अशोक चौहान ने लिखा है। साहित्य के अंतर्गत जेफरी आर्चर की कहानी , वेणु गोपाल तथा कुमार विकल की कवितायें तथा दलित जीवनियों पर जीतेन्द्र बिसारिया का आलेख होगा। फिरोज़ का कालम "ये अलग मिजाज़ का शहर है", तो होगा ही। चार अतिरिक्त पन्नो पर भगत सिंह से जुड़ी सामग्री होगी।

अगर आप प्रिंट में पढ़ने के शौकीन हैं तो युवा दखल की वार्षिक सदस्यता है १० रुपये और सम्पादकीय पता है -

५०८, भावना रेसीडेंसी , सत्यदेव नगर , गाँधी रोड , ग्वालियर -474002

07 अप्रैल 2008

साथियों ,

युवा दखल ग्वालियर में कुछ युवाओं के एक समूह युवा संवाद का वैचारिक बुलेटिन है। हम यहाँ एक बेहतर लोकतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए काम कर रहे हैं। हमारा सूत्र है "ख़ुद को बेहतर बनाते हुए दुनिया को बेहतर बनने की कोशिश " और ''चुप्पी के माहौल में संवाद बनाने की कोशिश '' ।
आईये , मिलकर इस कोशिश को कामयाब बनायें।

अजय गुलाटी
संयोजक , युवा संवाद