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16 दिसंबर 2009

प्यार एक भयावह मानसिक रोग है..




(पिछले दिनों यूं ही एक और काम कर डाला --- प्रेम पर कोई ढाई-तीन सौ कोटेशन्स का अनुवाद। और अब ये एक साथ किताब के रूप में आ रहे हैं। कवर पेज़ यहां लगा रहा हूं और कुछ मज़ेदार कोटेशन भी । ऊपर शीर्षक के रूप में दिया गया कोट प्लेटो का है )

प्रेम दीवानावार चाहे जाने की दीवानावार चाहत है -- मार्क ट्वेन

प्यार में पडने का मतलब केवल इतना है - कल्पनाओं को ख़ुला छोड देना और विवेक को क़ैद कर लेना -- हेलन रोलैण्ड

अगर हम प्रेम के सुख की तलाश में हैं तो दीवानगी कभी-कभी होनी चाहिये और विवेक सतत -- राबर्ट्सन डेविस

महान दीवानगियां नहीं होतीं मेरी जान,वे बस झूठी कल्पनायें होती हैं। जो होते हैं वे हैं सामान्य प्रेम जो थोडे दिन चलते हैं या फिर ज़्यादा दिन -- आग्ना मैग्नानी

मै जीना नहीं चाहता- मै पहले प्यार करना चाहता हूं फिर जीना -- ज़ेल्डा फ़िट्ज़गेराल्ड

कोई पुरुष जो एक आकर्षक स्त्री को चूमते हुए गाडी चला सकता है उसके बारे में इसी एक वज़ह से कहा जा सकता है कि वह चुम्बन को यथेष्ट महत्व नहीं दे रहा -- आंईस्टीन

24 जुलाई 2009

एक क्रांतिकारी के प्रेम पर कुछ विचार




( चेग्वेरा की एक किताब का अनुवाद करते हुए एक दूसरी किताब, क्यूबा में समाजवाद और व्यक्ति, के ये उद्धरण सामने आये। प्रेम पर उनके ये विचार एक मनुष्य के तौर पर उनकी उदात्तता और एक क्रांतिकारी के तौर पर उनके एकनिष्ठ समर्पण को रेखांकित करते हैं)



हर क्रांतिकारी प्रेम की तीव्र भावना से संचालित होता है। ऐसे सच्चे क्रांतिकारी की कल्पना करना असंभव है जिसमें इस गुण का अभाव हो। किसी नेतृत्वकर्ता के सामने सबसे बडी चुनौती यही होती है कि उसे उत्साहसिक्त भावनाओं को शांत मष्तिष्क के साथ संयोजित करना होता है और चूके बिना सही निर्णय लेने होते हैं।


''हमारे हिरावल क्रांतिकारियों के मन में जनता तथा सबसे पवित्र उद्देश्यों के लिये जो प्रेम है उसे वही अविभाज्य प्रेम होना चाहिये। सामान्य लोगों द्वारा प्रदर्शित प्रेम के भोंडे प्रदर्शन उनके लिये नहीं होते।''


क्रांतिकारी नेता बारहां अपने बच्चों के पहले तोतले शब्द सुनने के लिये उपस्थित नहीं होते, क्रांति अपने लक्ष्य तक पहुंच सके इसके लिये उनकी पत्नियों को भी उनकी क़ुर्बानियां साझा करनी होती हैं, उनके दोस्त केवल क्रांतियुद्ध के कामरेडों में ही पाये जाते हैं।उनके लिये इंक़लाब से बाहर कोई ज़िंदगी नहीं होती। अगर उन्हें सैद्धांतिक अतियों, बांझ बौद्धिकता और जनता से अलगाव से बचना है तो उनमें अगाध मानवीयता और न्याय तथा सत्य का बोध होना आवश्यक है। यही उनका रोज़ ब रोज़ का वह संघर्ष है जो जीवित मानवता के लिये उनके प्रेम को ठोस कार्यभारों और ऐसे कामों मे परिणित करेगा जो लोगों को इंक़लाब के रास्ते पर आगे बढायेगा और एक शानदार उदाहरण पेश करेगा।

16 फ़रवरी 2009

एक अभियान प्रेम के पक्ष में


युवा सम्वाद, मध्य प्रदेश ने वेलेन्टाईन डे पर एक अभियान चलाया। भोपाल, ग्वालियर, देवास, उज्जैन सहित अनेक जगहो पर एक परचा वितरित किया गया और युवाओं से उनके विचार आमन्त्रित किये गये। हर जगह युवाओं ने शिवसेना और राम सेना जैसे सन्गठनो की कारवाईयो की जमकर भर्त्सना की।
भोपाल मे १४ तारीख़ को एक खुली परिचर्चा आयोजित की गयी जिसमे युवाओं ने बढचढ कर हिस्सा लिया। परचा आप पिछली पोस्ट मे पढ ही चुके हैं ।

05 फ़रवरी 2009

हमारे समय में प्रेम



वसन्त पंचमी अभी बीती है और वेलेन्टाईन डे एक बार फिर करीब है। शहर के थोड़ा बाहर जाये तो सरसों की पीली चादर ओढे धरती प्रेम का संदेश बाँट रही है और हवाएँ इसकी खुशबू से सराबोर है। ऐसे में इस बदलते हुए समय में प्रेम का मतलब क्या है? क्या है प्रेम की भारतीय परम्परा और कैसे उसे बदलती हुई सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने बदला है? प्रेम में क्या ग़लत है और क्या सही तथा इसके समर्थन व विरोध में उठने वाले स्वरो की हक़ीक़त क्या है? इन्ही सब सवालों के साथ ‘युवा सम्वाद’ आप सबके बीच उपस्थित है।

आदम और हव्वा के ज़माने से ही पुरुष और स्त्री के बीच प्रेम का सहज आकर्षण और समाज द्वारा उसके नियन्त्रण की कोशिशें ज़ारी हैं। मनोविज्ञान और जीवविज्ञान दोनों इसे सहज और प्राकृतिक बताते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थायें बनी और उसमें विभिन्न संस्तर (layers) बने वैसे-वैसे ही प्रेम पर नियंत्रण की कोशिशें और तेज़ होती गईं। जाति, धर्म तथा अमीरी-ग़रीबी मे बँटे समाज में प्रेम का अर्थ भी बदला और रूप भी। राजा-महाराजाओ के सामंती युग में विवाह और प्रेम का निर्णय व्यक्तिगत न होकर सामाजिक हो गये। पिता और समाज के नियंता पुरोहित, पादरी और मुल्ले तय करने लगे कि किसकी शादी किसके साथ होनी चाहिये। पुरुषप्रधान समाज में औरतों और दलित कही जाने वाली जातियों को घरों में क़ैद कर दिया गया और उनकी पढाई-लिखाई पर रोक लगा दी गयी कि कहीं वे अपने अधिकारों की माँग न कर बैठे। ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता’ किताबों मे क़ैद रहा और औरतें चूल्हे से लेकर चिताओं तक में सुलगती रहीं।

सामन्ती समाज के विघटन के साथ-साथ जो नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था औद्योगिक क्रान्ति के साथ सामने आई उसने जनतन्त्र को जन्म दिया जो मूलतः समानता, भाईचारे और व्यक्ति की स्वतंत्र अस्मिता ( identity) के सम्मान पर आधारित थी। यह आज़ादी अपनी ज़िन्दगी के तमाम फ़ैसलों की आज़ादी थी और समानता का मतलब था जन्म ( (भारत के सन्दर्भ में धर्म, जाति, ज़ेन्डर और क्षेत्रीयता) के आधार पर होने वाले भेदभावो का अन्त। यही वज़ह थी कि हमारे संविधान मे जहां सबको वोट देने का हक़ दिया गया वहीं दलितों, स्त्रियों और दूसरे वंचित तबक़ों की सुरक्षा तथा प्रगति के लिये प्रावधान भी किये गये। अन्तर्जातीय तथा अन्तर्धार्मिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देकर जीवनसाथी चुनने के हक़ को सामाजिक से व्यक्तिगत निर्णय मे बदल दिया गया।

लेकिन दुर्भाग्य से जहां संविधान में ये क्रान्तिकारी प्रावधान किये गये समाज मे ऐसा कोई बडा आन्दोलन खडा नही हो पाया और जाति तथा धर्म के बन्धन तो मज़बूत हुए ही साथ ही औरतों को भी बराबरी का स्थान नही दिया जा सका। पन्चायतो से महानगरों तक प्रेम पर पहरे और भी कडे होते गये।

इसी के साथ बाज़ार केन्द्रित आर्थिक व्यवस्था ने प्रेम और औरत को एक सेलेबल कमोडिटी में बदल दिया। हालत यह हुई कि प्रेम की सारी भावनाओं की जगह अब गर्लफ़्रैंड-ब्वायफ़्रैन्ड बनाना स्टेटस सिम्बल बनते गये। क्रीम-पावडर के बाज़ार ने सुन्दरता के नये-नये मानक (standard) बना दिये और प्रेम मानो सिक्स पैक और ज़ीरो फ़ीगर मे सिमट गया। वेलेन्टाइन ने प्रेम के लिये बलिदान किया था पर बाज़ार ने उसे ‘लव गुरु’ बना दिया। इस सारी प्रक्रिया ने कट्टरपन्थी मज़हबी लोगो को प्रेम और औरत की आज़ादी पर हमला करने के और मौके उपलब्ध करा दिये। यह हमला दरअसल हमारी संस्कृति तथा लोकतान्त्रिक अधिकारों पर हमला है।

दरअसल प्रेम का अर्थ क्या है? हमारा मानना है कि यह एक दूसरे की आज़ादी का पूरा सम्मान करते हुए बराबरी के आधार पर साथ रहने का व्यक्तिगत निर्णय है और इसमें दख़लन्दाज़ी का किसी को कोई अधिकार नहीं। बिना आपसी बराबरी और सम्मान के कभी भी सच्चा प्रेम हो ही नही सकता। आज विवाह क्या है? लडकी के सौन्दर्य और घरेलू कामो मे निपुणता तथा लडके की कमाई के बीच एक समझौता जिसकी क़ीमत है दहेज़ की रक़म। आखिर जो लडके/लडकी एक डाक्टर, इन्जीनियर, मैनेज़र या सरकारी अफ़सर के रूप में इतने बडे-बडे फ़ैसले लेते हैं वे अपना जीवनसाथी क्यों नहीं चुन सकते?

युवा सम्वाद का मानना है कि एक बराबरी वाले समाज में ही प्रेम अपने सच्चे रूप मे विकसित हो सकता है तथा इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया में तब्दील कर सकता है। प्रेम और शादी का अधिकार हमारा संवैधानिक हक़ है और व्यक्तिगत निर्णय। आप क्या सोचते हैं ?