05 फ़रवरी 2009

हमारे समय में प्रेम



वसन्त पंचमी अभी बीती है और वेलेन्टाईन डे एक बार फिर करीब है। शहर के थोड़ा बाहर जाये तो सरसों की पीली चादर ओढे धरती प्रेम का संदेश बाँट रही है और हवाएँ इसकी खुशबू से सराबोर है। ऐसे में इस बदलते हुए समय में प्रेम का मतलब क्या है? क्या है प्रेम की भारतीय परम्परा और कैसे उसे बदलती हुई सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने बदला है? प्रेम में क्या ग़लत है और क्या सही तथा इसके समर्थन व विरोध में उठने वाले स्वरो की हक़ीक़त क्या है? इन्ही सब सवालों के साथ ‘युवा सम्वाद’ आप सबके बीच उपस्थित है।

आदम और हव्वा के ज़माने से ही पुरुष और स्त्री के बीच प्रेम का सहज आकर्षण और समाज द्वारा उसके नियन्त्रण की कोशिशें ज़ारी हैं। मनोविज्ञान और जीवविज्ञान दोनों इसे सहज और प्राकृतिक बताते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थायें बनी और उसमें विभिन्न संस्तर (layers) बने वैसे-वैसे ही प्रेम पर नियंत्रण की कोशिशें और तेज़ होती गईं। जाति, धर्म तथा अमीरी-ग़रीबी मे बँटे समाज में प्रेम का अर्थ भी बदला और रूप भी। राजा-महाराजाओ के सामंती युग में विवाह और प्रेम का निर्णय व्यक्तिगत न होकर सामाजिक हो गये। पिता और समाज के नियंता पुरोहित, पादरी और मुल्ले तय करने लगे कि किसकी शादी किसके साथ होनी चाहिये। पुरुषप्रधान समाज में औरतों और दलित कही जाने वाली जातियों को घरों में क़ैद कर दिया गया और उनकी पढाई-लिखाई पर रोक लगा दी गयी कि कहीं वे अपने अधिकारों की माँग न कर बैठे। ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता’ किताबों मे क़ैद रहा और औरतें चूल्हे से लेकर चिताओं तक में सुलगती रहीं।

सामन्ती समाज के विघटन के साथ-साथ जो नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था औद्योगिक क्रान्ति के साथ सामने आई उसने जनतन्त्र को जन्म दिया जो मूलतः समानता, भाईचारे और व्यक्ति की स्वतंत्र अस्मिता ( identity) के सम्मान पर आधारित थी। यह आज़ादी अपनी ज़िन्दगी के तमाम फ़ैसलों की आज़ादी थी और समानता का मतलब था जन्म ( (भारत के सन्दर्भ में धर्म, जाति, ज़ेन्डर और क्षेत्रीयता) के आधार पर होने वाले भेदभावो का अन्त। यही वज़ह थी कि हमारे संविधान मे जहां सबको वोट देने का हक़ दिया गया वहीं दलितों, स्त्रियों और दूसरे वंचित तबक़ों की सुरक्षा तथा प्रगति के लिये प्रावधान भी किये गये। अन्तर्जातीय तथा अन्तर्धार्मिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देकर जीवनसाथी चुनने के हक़ को सामाजिक से व्यक्तिगत निर्णय मे बदल दिया गया।

लेकिन दुर्भाग्य से जहां संविधान में ये क्रान्तिकारी प्रावधान किये गये समाज मे ऐसा कोई बडा आन्दोलन खडा नही हो पाया और जाति तथा धर्म के बन्धन तो मज़बूत हुए ही साथ ही औरतों को भी बराबरी का स्थान नही दिया जा सका। पन्चायतो से महानगरों तक प्रेम पर पहरे और भी कडे होते गये।

इसी के साथ बाज़ार केन्द्रित आर्थिक व्यवस्था ने प्रेम और औरत को एक सेलेबल कमोडिटी में बदल दिया। हालत यह हुई कि प्रेम की सारी भावनाओं की जगह अब गर्लफ़्रैंड-ब्वायफ़्रैन्ड बनाना स्टेटस सिम्बल बनते गये। क्रीम-पावडर के बाज़ार ने सुन्दरता के नये-नये मानक (standard) बना दिये और प्रेम मानो सिक्स पैक और ज़ीरो फ़ीगर मे सिमट गया। वेलेन्टाइन ने प्रेम के लिये बलिदान किया था पर बाज़ार ने उसे ‘लव गुरु’ बना दिया। इस सारी प्रक्रिया ने कट्टरपन्थी मज़हबी लोगो को प्रेम और औरत की आज़ादी पर हमला करने के और मौके उपलब्ध करा दिये। यह हमला दरअसल हमारी संस्कृति तथा लोकतान्त्रिक अधिकारों पर हमला है।

दरअसल प्रेम का अर्थ क्या है? हमारा मानना है कि यह एक दूसरे की आज़ादी का पूरा सम्मान करते हुए बराबरी के आधार पर साथ रहने का व्यक्तिगत निर्णय है और इसमें दख़लन्दाज़ी का किसी को कोई अधिकार नहीं। बिना आपसी बराबरी और सम्मान के कभी भी सच्चा प्रेम हो ही नही सकता। आज विवाह क्या है? लडकी के सौन्दर्य और घरेलू कामो मे निपुणता तथा लडके की कमाई के बीच एक समझौता जिसकी क़ीमत है दहेज़ की रक़म। आखिर जो लडके/लडकी एक डाक्टर, इन्जीनियर, मैनेज़र या सरकारी अफ़सर के रूप में इतने बडे-बडे फ़ैसले लेते हैं वे अपना जीवनसाथी क्यों नहीं चुन सकते?

युवा सम्वाद का मानना है कि एक बराबरी वाले समाज में ही प्रेम अपने सच्चे रूप मे विकसित हो सकता है तथा इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया में तब्दील कर सकता है। प्रेम और शादी का अधिकार हमारा संवैधानिक हक़ है और व्यक्तिगत निर्णय। आप क्या सोचते हैं ?



15 टिप्‍पणियां:

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

हम वहीं सोचते हैं
जो आपने नहीं सोचा
14 तारीख को ही करेंगे
प्रस्‍तुत पूरा लेखा जोखा।

संगीता पुरी ने कहा…

सबका अपना अपना विचार होता है.....एक सा कैसे हो सकता है ?

the_andaz ने कहा…

ahok bhai parcha achha bana hai .. yuva samvad gwaliwr kea sabhi sathioon koo badahi

Annu ने कहा…

पर्चा अछा है लेकिन दुसरे पेराग्राफ में कुछ सुधार की गुन्जायिश है | पाँचवे और छ: पैरा में कुछ उदाहरण जरुर दिए जाने चाहिए जो अभी अभी के है जैसे बैंगलोर या महाराष्ट्रा में होता है या वेलेंटाइन डे पर जब संघीय लोग सड़को पर उतरेंगे तो क्या किया जा सकता है | Anand , for yuva samvad ujjain

बेनामी ने कहा…

bhai jaise jaise samay badlata hai hamare taur tarike bhi badalte hai. ye sahi hai zamaana girlfrnd boyfrnd ka hai lekin ye aap kaise kah sakte hai ye prem nahi ............aur aap kaun ho .........thts it.......

Nirmla Kapila ने कहा…

sahi kaha aapne lekin hamare shahar me ek case hua hai ki ladki m.a math hai ladka berojgar matric pass magar prem vivah kar liya itne ameer ghar me rahne vali ladki aaj ek gande se ghar me rehti hai maar peet shuru ho chuki hai aise prem vivah ko aap kya kahenge kya aaj sabhi bache itne samajhdaar hain ki prem ka matlav samajh rahe hon phir bhi mera manna hai ki agar dono ka chunav sahi ho to prem vivah bahut achha hai

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

सही कहा निर्मलाजी
बस इतना कहना चाहता हूँ यह सही चुनाव तभी हो सकता है जब औरतो को शुरू से बराबरी का अधिकार नही दिया जाता।
अलग होने का अधिकार चुनाव मे शामिल है।
अरेन्ज़्ड मैरेज़ मे कम परेशानियां नही आती पर आर्थिक अधिकारो और सामाजिक नियमो के चलते औरते उसमे से बाहर नही आ पाती।

anonymos मित्र हमे कहां दिक़्क़त है ब्वाय-गर्लफ़्रेन्ड से। बस इसे स्टेटस सिम्बल बनने से प्राब्लम है। एक कमिटमेन्ट ज़रूरी है यह शादी भी हो सकता है और नही भी।

बेनामी ने कहा…

ashok bhai mujhe achha laga ki aap ne is disha me kadam uthaya me aapke saath hun
salaam
pallav thudgar

दिल दुखता है... ने कहा…

apne kaha ki vivah hamara vyaktigat nirnay hona chahiye thik hai lekin utna si sach ye bhi hai ki vivah se vyaktigat badlav ya judav nahi hote, vivah se nishchit hi pariwaron ka milan hota hai. fir hum kaise kah sakte hai ki vivah vyaktigat nirnay hona chahiye. usme hamesa babe or anubhvi logon ki salah hi jaruri hoti hai. warna jeeo akele pariwar mei kyo jeete ho? jeevan k har mod par to pariwar ki madad or yahan hamara hi adhikar hona chahiye, kisi ko had nahi.

दिल दुखता है... ने कहा…

apne kaha ki vivah hamara vyaktigat nirnay hona chahiye thik hai lekin utna si sach ye bhi hai ki vivah se vyaktigat badlav ya judav nahi hote, vivah se nishchit hi pariwaron ka milan hota hai. fir hum kaise kah sakte hai ki vivah vyaktigat nirnay hona chahiye. usme hamesa babe or anubhvi logon ki salah hi jaruri hoti hai. warna jeeo akele pariwar mei kyo jeete ho? jeevan k har mod par to pariwar ki madad or yahan hamara hi adhikar hona chahiye, kisi ko had nahi.

sunil ने कहा…

duniya ko pyar karne ke liye upyukt jagah banane ki disha me pahal to karni hee hogi.

बेनामी ने कहा…

Dear Ashok ,

Bahut hi acha parcha hai ...jisme individual choice ki baat kahi hai ...hum eshme agar yonikta & pitrasatta ko jo de to or hum apni baato ko spast kar payenge...kyoki jab hum right to choice ki baat karhte hai to sabse pahle humara pitrasatta samaj yonikta per control karta hai....hum apke sath hai.....

With Regards
Argha

neera ने कहा…

Your interesting article raises number of issues... love is a personal thing but marriage is social thing...absolutely! love is losing its meaning, passion and values in girl friend/boy friend culture......as parents we should empower our sons and daughters to take their own decision to choose their life partners... in case the decision goes wrong we should support them with our arms open....equality for women? I rather not say anything...

varsha ने कहा…

एक बराबरी वाले समाज में ही प्रेम अपने सच्चे रूप मे विकसित हो सकता है

mayamrig ने कहा…

बहुत सुलझी हुई सोच से लिखा गया है यह परचा। बाजार की ताकतों ने प्रेम दिवस के बहाने कुछ सामंती अवशेषों को तोड़ने का काम तो ि‍कया लेकिन उसे सामाजिक विद्रूपताओं से चल रही लड़ाई से कोई लेना देना नहीं। वह लड़ाई अपनी जगह रहे और हम सावचेत रहकर बाजार के केवल उन्‍हीं तत्‍वों का अपनी लड़ाई के हित में प्रयोग करें जिनकी जरूरत है और जिन्‍हें बाद में खंगाल कर बाहर किया जा सके। दरअसल वेलेन्‍टाइन डे के बहाने कट्टरपंथियों ने दो वर्ग बनाने की कोशिश्‍ा की है एक वे जो उनके साथ हैं, तथाकथित संस्‍कृति रक्षक और बाकी जो रहे वे सब द्रोही। यह भगवा ताकतों का पुराना खेल है। राममंदिर के मुद्दे पर यही किया आप या तो हिन्‍दू समर्थक हैं या फिर मुस्लिम समर्थक...तीसरे के लिए जगह नहीं। परमाणु परीक्षण के समय भी यही किया...कितना भी गिन लें...खेल वही है, तरीका वही है, हथियार वही है कथित देशभक्ति और संस्‍कृति का ठेका...। आपने सभी पक्षों को बेहतर समझा है, समेटा है...बधाई