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09 फ़रवरी 2010

सुभाष गाताडे का खुला पत्र विभूति नारायण राय के नाम


श्री विभूति नारायण राय, कुलपति महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के नाम एक पत्र 9 फरवरी २०१०


प्रिय विभूतिजी
अभिवादन !




उम्मीद है, स्वस्थ होंगे ।लम्बे समय से इस उधेड़बुन में था कि चन्द बातें आप तक किस तरह सम्प्रेषित करूं ? व्यक्तिगत मुलाकात सम्भव नहीं दिख रही थी सोचा पत्र के जरिए ही अपनी बात लिख दूं। और यह एक ऐसा पत्र हो जो सिर्फ हमारे आप के बीच न रहे बल्कि जिसे बाकी लोग भी पढ़ सकें, जान सके। इसकी वजह यही है कि पत्र में जिन सरोकारों को मैं रखना चाहता हूं उनका ताल्लुक हमारे आपसी सम्बन्धों से जुड़े किसी मसले से नहीं है।आप को याद होगा कि महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर आप की नियुक्ति होने पर मेरे बधाई सन्देश का आपने उसी आत्मीय अन्दाज़ में जवाब दिया था। उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की अनुचित गिरफ्तारी के मसले को जब मैंने आप के साथ सांझा किया तब आपने अपने स्तर पर उस मामले की खोजख़बर लेने की कोशिश की थी। हमारे आपसी सम्बन्धों की इसी सांर्द्रता का नतीजा था कि आप के सम्पादन के अन्तर्गत साम्प्रदायिकता के ज्वलंत मसले पर केन्द्रित एक किताब में भी अपने आलेख को भेजना मैंने जरूरी समझा। इतना ही नहीं कुछ माह पहले जब मुझे बात रखने के लिए आप के विश्वविद्यालय का निमंत्रण मिला तब मैंने भी इसे सहर्ष स्वीकार किया।



यह अलग बात है कि वर्धा की अपनी दो दिनी यात्रा में मेरी आप से मुलाक़ात सम्भव नहीं हो सकी। सम्भवतः आप प्रशासनिक कामों में अत्यधिक व्यस्त थे। आज लगता है कि अगर मुलाक़ात हो पाती तो मैं उन संकेतों को आप के साथ शेअर करता -जो विश्वविद्यालय समुदाय के तमाम सदस्यों से औपचारिक एवम अनौपचारिक चर्चा के दौरान मुझे मिल रहे थे - और फिर इस किस्म के पत्र की आवश्यकता निश्चित ही नहीं पड़ती।



मैं यह जानकर आश्चर्यचकित था कि विश्वविद्यालय में अपने पदभार ग्रहण करने के बाद अध्यापकों एवम विद्यार्थियों की किसी सभा में आप ने छात्रों के छात्रसंघ बनाने के मसले के प्रति अपनी असहमति जाहिर की थी और यह साफ कर दिया था कि आप इसकी अनुमति नहीं देगे। यह बात भी मेरे आकलन से परे थी कि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित तबके से आनेवाले एक छात्रा - सन्तोष बघेल - को विभाग में सीट की उपलब्धता के बावजूद शोध में प्रवेश लेने के लिए भी आन्दोलन का सहारा लेना पड़ा था और अन्ततः प्रशासन ने उसे प्रवेश दे दिया था। विश्वविद्यालय की आयोजित एक गोष्ठी में जिसमें मुझे बीज वक्तव्य देना था, उसकी सदारत कर रहे महानुभाव की ‘लेखकीय प्रतिभा’ के बारे में भी लोगों ने मुझे सूचना दी, जिसका लुब्बेलुआब यही था कि अपने विभाग के पाठयक्रम के लिए कई जरूरी किताबों के ‘रचयिता’ उपरोक्त सज्जन पर वाड्मयचौर्य अर्थात प्लेगिएरिजम के आरोप लगे हैं। कुछ चैनलों ने भी उनके इस ‘हुनर’ पर स्टोरी दिखायी थी।



बहरहाल, विगत तीन माह के कालखण्ड में पीड़ित छात्रों द्वारा प्रसारित सूचनाओं के माध्यम से तथा राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से में विश्वविद्यालय के बारे में प्रकाशित रिपोर्टों से कई सारी बातें सार्वजनिक हो चुकी हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति से सम्बधित छात्रों के साथ कथित तौर पर जारी भेदभाव एवम उत्पीड़न सम्बन्धी ख़बरें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। 6 दिसम्बर 2009 को डा अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित रैली में शामिल दलित प्रोफेसर लेल्ला कारूण्यकारा को मिले कारण बताओ नोटिस पर टाईम्स आफ इण्डिया भी लिख चुका है। उन तमाम बातों को मैं यहां दोहराना नहीं चाहता।



जनवरी माह की शुरूआत में मुझे यहभी पता चला कि हिन्दी जगत में प्रतिबद्ध पत्रकारिता के एक अहम हस्ताक्षर श्री अनिल चमडिया - जिन्हें आप के विश्वविद्यालय में स्थायी प्रोफेसर के तौर पर कुछ माह पहले ही नियुक्त किया गया था - को अपने पद से हटाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन आमादा है। फिर चन्द दिनों के बाद यहभी सूचना सार्वजनिक हुई कि विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद की आकस्मिक बैठक करके उन्हें पद से मुक्त करने का फैसला लिया गया और उन्हें जो पत्रा थमा दिया गया उसमें उनकी नियुक्ति को ‘कैन्सिल’ करने की घोषणा की गयी।



मैं समझता हूं कि विश्वविद्यालय स्तर पर की जानेवाली नियुक्तियां बच्चों की गुड्डी-गुड्डा का खेल नहीं होता कि जब चाहे हम उसे समेट लें। निश्चित तौर पर उसके पहले पर्याप्त छानबीन की जाती होगी, मापदण्ड निर्धारित होते होंगे, योग्यता को परखा जाता होगा। यह बात समझ से परे है कि कुछ माह पहले आप ने जिस व्यक्ति को प्रोफेसर जैसे अहम पद पर नियुक्त किया, उन्हें सबसे सुयोग्य प्रत्याशी माना, वह रातोंरात अयोग्य घोषित किया गया और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया ?कानून की सामान्य जानकारी रखनेवाला व्यक्ति भी बता सकता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कदम प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के खिलाफ है। और ऐसा मामला नज़ीर बना तो किसी भी व्यक्ति के स्थायी रोजगार की संकल्पना भी हवा हो जाएगी क्योंकि किसी भी दिन उपरोक्त व्यक्ति का नियोक्ता उसे पत्र थमा देगा कि उसकी नियुक्ति -कैन्सिल’।



यह जानी हुई बात है कि हिन्दी प्रदेश में ही नहीं बल्कि शेष हिन्दोस्तां में लोगों के बीच आप की शोहरत एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की रही है जिसने अपने आप को जोखिम में डाल कर भी साम्प्रदायिकता जैसे ज्वलंत मसले पर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की कोशिश की। ‘शहर में कफ्र्यू’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से या ‘वर्तमान साहित्य’ जैसी पत्रिका की नींव डालने के आप की कोशिशों से भी लोग भलीभाति वाकिफ हैं। सम्भवतः यही वजह है कि कई सारे लोग जो कुलपति के तौर पर आप की कार्यप्रणाली से खिन्न हैं, वे मौन ओढ़े हुए हैं। इसे इत्तेफा़क ही समझें कि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय अपने स्थापना के समय से ही विवादों के घेरे में रहा है। चाहे जनाब अशोक वाजपेयी का कुलपति का दौर रहा हों या उसके बाद पदासीन हुए जनाब गोपीनाथन का कालखण्ड रहा हो, विवादों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है। मेरी दिली ख्वाहिश है कि साड़े तीन साल बाद जब आप पदभार से मुक्त हों तो आप का भी नाम इस फेहरिस्त में न जुड़ें।



मैं पुरयकीं हूं कि आप मेरी इन चिन्ताओं पर गौर करेंगे और उचित कदम उठाएंगे।


आपका


सुभाष गाताडे

04 अक्टूबर 2009

डा आंबेडकर से नई मुलाक़ात का वक़्त



(यह जाने माने विचारक सुभाष गाताडे के लंबे आलेख का एक हिस्सा है जिसे युवा संवाद ने एक पुस्तिका के रूप में छापा है)



एक बात जो लगभग हमारे सहजबोध (कामन सेन्स) का हिस्सा बन गयी है - जिसका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं - जो डा अम्बेडकर के बारे में कही जाती है, कि वह ‘दलितों के मसीहा’ थे। दिलचस्प है कि समूचे राजनीतिक स्पेक्ट्रम में यह बात स्वीकार्य है। अपने आप को उनका सच्चा वारिस घोषित करनेवालों के लिए भी यह बात सुनकर कोई बेआरामी नहीं होती।


क्या उनका यह चित्रण पूरी तौर पर सही है ? या उनको दलितों का मसीहा कह देने से उनके जीवन के तमाम पक्ष छूट जाते हैं और उनकी एकांगी किस्म की छवि बनती है।



अगर उनके इस चित्रण को सही मान लें तो उनके लगभग चालीस साला राजनीतिक-सामाजिक जीवन के कई अहम पहलुओं पर चुप्पी साधनी पड़ती है। और यही बात स्वीकारनी पड़ती है कि मनु के विधान की स्वीकार्यतावाले हमारे समाज में - जिसने शूद्रों-अतिशूद्रों-स्त्रिायों की विशाल आबादी को तमाम मानवीय हकों से वंचित किया था - उन्होंने अतिशूद्रों के अधिकारों के लिए कुछ संघर्ष किया एवम कुछ रिआयतें हासिल कीं।


फिर इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन हो जाता है कि क्या वे स्त्रिायों के अधिकारों के लिए संघर्षरत नहीं रहे या क्या किसानों-मजदूरों की समस्या की ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी, क्या जनता के आर्थिक सवालों से वह बेख़बर रहे या क्या वह शूद्रों-अतिशूद्रों का नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर करनेवाली जाति/जातियों के खिलाफ थे या उस मानसिकता के खिलाफ थे जिसने इस स्थिति का निर्माण किया था ? शिक्षा संस्थानों का जाल बिछाने के पीछे तथा अख़बार-पत्रा-पत्रिकाओं को शुरू करने के पीछे उनका क्या मकसद था ? और सबसे बढ़ कर क्या उन्होंने उपनिवेशवादियों के खिलाफ जारी राजनीतिक आन्दोलन की सीमा को उजागर नहीं किया जिसके लिए उन्हें जोखिम उठाना पड़ा।



एक गुलाम मुल्क में उपनिवेशवादियों के खिलाफ राजनीतिक आन्दोलनों के साथ एक सुविधा रहती हैं कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समूचे जनसमुदाय का उन्हें समर्थन प्राप्त रहता है लेकिन बाबासाहेब की अपनी जद्दोजहद का अच्छा खासा हिस्सा समाज की अपनी बीमारियों, परम्पराओं, संस्थाओं के खिलाफ, उपनिवेशवादियों के आगमन से पहले से चली आ रही उस सामाजिक-धार्मिक निज़ाम के खिलाफ था। उनके सामने खड़ी चुनौती को आसानी से समझा जा सकता है जहां उन्हें उन लोगों को भी निशाने पर लेना पड़ रहा था जो खुद साम्राज्यवाद से उत्पीड़ित थे या उसके विरोध में संघर्ष के लिए तैयार थे मगर जो खुद भारतीय समाज की उस मंज़िलनुमा बनावट के खिलाफ खडे़ होने के लिए तैयार नहीं थे। अपने एक आलेख में डा अम्बेडकर ने उच्चनीचअनुक्रम, शुद्धता एवम प्रदूषण पर टिकी भारतीय समाज रचना की तुलना उस बहुमंजिली इमारत से की थी जिसमें एक मंज़िल से दूसरी पर जाने के तमाम दरवाजे़ बिल्कुल बन्द थे। वे लोग जो जातिप्रथा को श्रम का विभाजन कह कर महिमामण्डित करते थे, उन्हें करारा जवाब देते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि ‘जातिप्रथा श्रम का नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है।’



उनके जीवन एवम संघर्ष को सरसरी निगाह से देखने पर पता चलता है कि तमाम शोषितों-उत्पीड़ितों के हालात के प्रति उनका गहरा सरोकार एवम उसको बदल डालने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। और अहम बात जो उनके यहां नज़र आती है वह है राजनीतिक-आर्थिक संघर्षों में या सामाजिक-सांस्कृतिक हलचलों के बीच उनके यहां किसी ‘चीन की दीवार’ की अनुपस्थिति। ( क्या यह कहना अनुचित होगा कि उत्तरअम्बेडकर आन्दोलन में इस सिलसिले का बनाये नहीं रखा जा सका)



उनके जीवन के सबसे पहले ऐतिहासिक संघर्ष को ही देखें जब 1927 में महाड के चवदार तालाब पर सत्याग्रह करने वह पहुंचते हैं (19-20 मार्च 2008) जिसके बारे में मराठी में हम कहते हैं कि जब ‘उन्होंने पानी में आग लगा दी।’ मालूम हो कि महाराष्ट्र के कोकण नामक इलाके के महाड नामक क्षेत्रा के सार्वजनिक तालाब पर हजारों की संख्या में दलितों ने अन्य तमाम समानविचारी लोगों डाॅ बाबासाहेब आम्बेडकर के नेतृत्व में एक सत्याग्रह किया था। यूं तो कहने के लिए यह महज पानी पीने का हक था लेकिन इसकी विशिष्टता इसी में निहित थी कि सदियों से उच्चनीचअनुक्रम पर टिके, प्रदूषण एवम शुद्धता पर आधारित समाज केे उत्पीड़ित जनों ने अपने विद्रोह का एक संगठित हुंकार भरा था।



इस अवसर पर आयोजित सम्मेलन के प्रस्ताव गौर करनेलायक हैं। प्रस्तुत सम्मेलन में कई सारे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गये। जंगल की जमीन दलितों को खेती के लिये दी जाय, उन्हें सरकारी नौकरियां मिलें, सरकार न केवल शिक्षा को अनिवार्य करे बल्कि 20 साल के छोटे लड़कों तथा 15 साल से छोटी लड़कियों की शादी पर भी पाबन्दी लगाये आदि विभिन्न आर्थिक सामाजिक मसलों पर प्रस्ताव मंजूर हुए । सरकार से अपील की गयी वह शराबबन्दी लागू करे तथा मरे हुए जानवरों का मांस खाने पर पाबंदी लगा दे । सम्मेलन में उच्चवर्णीयों से भी आवाहन किया कि वे अछूतों को उनके नागरिक अधिकार दिलाने में सहायता करें, उन्हें नौकरियां दें, अपने मरे हुए जानवरों को खुद दफनायें।



सत्याग्रह के दूसरे चरण में उन्होंनेे शुचिता तथा प्रदूषण के आधार पर उनके अपमान को जायज ठहराने वाले पवित्र कहलानेवाले मनुस्मृति नामक ग्रंथ को भी आग के हवाले किया था। (25 दिसम्बर 1927)



सम्मेलन के अपने शुरूआती वक्तव्य में बाबासाहेब ने प्रस्तुत सत्याग्रह परिषद का उद्देश्य स्पष्ट किया ।‘‘ अन्य लोगों की तरह हमभी इन्सान है इस बात को साबित करने के लिए हम तालाब पर जाएंगे । अर्थात यह सभा समता संग्राम की शुरूआत करने के लिए ही बुलायी गयी है । आज की इस सभा और 5 मई 1789 को फ्रांसीसी लोगों की क्रांतिकारी राष्ट्रीय सभा में बहुत समानताएं हैं । .. इस राष्ट्रीय सभा ने राजारानी को सूली पर चढ़ाया था, सम्पन्न तबकों के लिए जीना मुश्किल कर दिया था, उनकी सम्पत्ति जब्त की थी । 15 साल से ज्यादा समय तक समूचे यूरोप में इसने अराजकता पैदा की थी ऐसा इस पर आरोप लगता है। मेरे खयाल से ऐसे लोगों को इस सभा का वास्तविक निहितार्थ समझ नहीं आया।.. इसी सभा ने ‘जन्मजात मानवी अधिकारों को घोषणापत्रा जारी किया था.. इसने महज फ्रान्स में ही क्रान्ति को अंजाम नहीं दिया बल्कि समूची दुनिया में एक क्रांति को जनम दिया ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा‘‘ उन्होंने अपील की थी इस सभा को फ्रेंच राष्ट्रीय सभा का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए..‘‘ हिन्दुओं में व्याप्त वर्णव्यवस्था ने किस तरह विषमता और विघटन के बीज बोये हैं इस पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘ समानता के व्यवहार के बिना प्राकृतिक गुणों का विकास नहीं हो पाता उसी तरह समानता के व्यवहार के बिना इन गुणों का सही इस्तेमाल भी नहीं हो पाता। एक तरफ से देखें तो हिन्दु समाज में व्याप्त असमानता व्यक्ति का विकास रोक कर समाज को भी कुंठित करती है और दूसरी तरफ यही असमानता व्यक्ति में संचित शक्ति का समाज के लिए उचित इस्तेमाल नहीं होने देती। ॥‘‘सभी मानवों की जनम के साथ बराबरी की घोषणा करता हुआ मानवी हकों का एक ऐलाननामा भी सभा में जारी हुआ।



सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गये जिसमें जातिभेद के कायम होने के चलते स्थापित विषमता की भत्र्सना की गयी तथा यहभी मांग की गयी कि धर्माधिकारी पद पर लोगों की तरफ से नियुक्ति हो। इसमें से दूसरा प्रस्ताव मनुस्मृतिदहन का था जिसे सहस्त्राबुद्धे नामक एक ब्राहमण जाति के सामाजिक कार्यकर्ता ने प्रस्तुत किया था । प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘‘शूद्र जाति को अपमानित करनेवाली उसकी प्रगति को रोकनेवाली उसके आत्मबल को नष्ट कर उसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को मजबूती देनेवाली मनुस्मृति के श्लोेकों को देखते हुए ॥ ऐसे जनद्रोही और इन्सानविरोधी ग्रंथ को हम आज आग के हवाले कर रहे हैं।’’



इस सत्याग्रह के अवसर महिलाओं को दिया गया उनका स्वतंत्रा उद्बोधन काफी चर्चित रहा है। मनुस्मृति दहन के बाद रात में स्त्रिायांे को अलग सम्बोधित करते हुए डा अम्बेडकर ने जोर देकर कहा था:



‘‘ परिवार की दिक्कतें स्त्राी एवम पुरूष दोनों मिला कर ही सुलझाते है और उसी तरह समाज की, दुनिया की कठिनाइयों को भी स्त्रिायों एवम पुरूषों को दोनों को मिला कर ही सुलझानी चाहिए। स्त्रिायां ही इस काम को बखूबी कर सकती हैं, इस पर मुझे पूरा यकीन है। इसके आगे आप को भी सभाओं एवम सम्मेलनों में आना चाहिए।आप ने हम पुरूषों को जन्म दिया है। आप के पेट से जन्म लेना आखिर अपराध क्यों माना जाता है और ब्राह्मण स्त्राी के पेट से जन्म लेना पुण्य क्यों समझा जाता है ? .. स्त्रिायां गृहलक्ष्मी बनें यही हमें क्यों सोचना चाहिए, इसके आगे की मंजिल उन्हें क्यों नहीं पार करनी चाहिए ? ... ज्ञान और विद्या की आवश्यकता सिर्फ पुरूषों के लिए नहीं है वह स्त्रिायों के लिए भी उतनीही जरूरी है। इसलिए आनेवाली पीढ़ी को सुधारना हो तो आप को चाहिए कि बेटों के साथ बेटियों को भी शिक्षा दें।
स्त्रिायों को राजनीतिक-सामाजिक सक्रियताओं में उतारने की, उन्हें अधिकारों से लैस करने की चिन्ता हमें उनके समूचे जीवन में दिखती है।



अगर हम 50 के दशक में नेहरू मंत्रिमण्डल से उनके इस्तीफे पर गौर करें तो क्या वजह समझ में आती है। जहां वे इस बात के प्रति क्षुब्ध है कि अनुसूचित जातियों एवम जनजातियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रति सरकार पर्याप्त गम्भीरता का परिचय नहीं दे रही हैं वहीं वे इस बात को विशेष तौर पर रेखांकित करते हैं कि उनके इस निर्णय लेने के पीछे ‘हिन्दु कोड बिल’ को लेकर नज़र आती सरकार की आनाकानी का मसला अहम था।आखिर क्या था ‘हिन्दु कोड बिल’ ? दरअसल हिन्दु कोड बिल के जरिये आपसी सम्बन्ध विच्छेद एवम जायदाद के मामले में हिन्दु महिलाओं को अधिकार दिए जा रहे थे। सभी जानते हैं कि उसके पहले हिन्दुओं में बहुपत्नीप्रथा कायम थी, यहां तक कि तलाक या सम्पत्ति के मामले में उन्हें कोई अधिकार नहीं प्राप्त थे। हिन्दु कोड बिल को लेकर डा अम्बेडकर को जो जद्दोजहद करनी पड़ी वह अपने आप में एक रोचक इतिहास है। स्त्रिायों को अधिकारसम्पन्न कर ‘हिन्दु संस्कृति एव परम्परा को ध्वस्त करने’ की कोशिश करने के लिए कई बार उनके घर पर प्रदर्शन भी हुए। इस बिल को न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध था बल्कि कांग्रेस के अन्दर मौजूद रूढिवादी/सनातनी तत्वों ने भी उनके इस कदम की लगातार मुखालिफत की थी जिसमें अग्रणी थे बाबू राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल आदि।नेहरू मंत्रिमण्डल से इस्तीफा सौंपते हुए प्रस्तुत वक्तव्य में उन्होंने लिखा था:



‘हिन्दु कोड बिल एक तरह से इस मुल्क की विधायिका द्वारा हाथ में लिया गया समाज सुधार का सबसे बड़ा कदम था। अतीत में हिन्दोस्तां की विधायिका द्वारा पारित किसी भी कानून से या भविष्य में पारित किए जा सकनेवाले किसी भी कानून से इसकी तुलना नहीं की जा सकती। वर्ग और वर्ग के बीच की गैरबराबरी, लिंगों के बीच की गैरबराबरी - जो हिन्दु समाज की आत्मा है - को अक्षुण्ण बनाये रखना तथा आर्थिक समस्याओं को लेकर एक के बाद एक विधेयक पारित करते रहना, एक तरह से संविधान का माखौल उड़ाना है और गोबर के ढेर पर महल खड़े करने जैसा है। ॥मेरे लिए हिन्दु कोड का यही महत्व रहा है। और अपने मतभेदों के बावजूद इसी वजह से मैं मंत्रिमण्डल का सदस्य बना रहा।’



डा अम्बेडकर के जीवन और संघर्षों की व्यापकता जानना हों तो तीस का दशक कई मायनों में अहम दिखता है जिसमें वह सामाजिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर भी नयी जमीन तोड़ते प्रतीत होते हैं वहीं वह राजनीतिक-आर्थिक मसले पर भी एक अलग रास्ता अख्तियार करते नज़र आते हैं।
(शेष अगली पोस्ट में )

19 अक्टूबर 2008

'अच्छे संदिग्ध' की तलाश

सरहदों के नाम पर आखिर लोग इस कदर एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों हो जाते हैं ?
यह सवाल अपने अपने दौर के मनीषियों को हमेशा मथता रहा है। इराक पर अमेरिकी आक्रमण के बाद खुद अमेरिका के अन्दर युध्दविरोधी आन्दोलन के प्रवक्ताओं ने इससे जूझने की कोशिश की है और यह जानना चाहा है कि आखिर प्रबुध्द कहलाने वाला अमेरिकी नागरिक या जनतंत्र का प्रहरी कहलाने वाला मीडिया हुकूमतों द्वारा फैलाये जाने वाले सरासर झूठ पर कैसे यकीन करता है, जिसकी परिणति अन्यायपूर्ण युध्दों में होती हो, जहां हजारों हजार लोग मौत की नींद सो जाते हैं ?
अमेरिका के रैडिकल विद्वान हावर्ड झिन (जिनकी किताब ' ए पीपुल्स हिस्ट्री आफ युनाइटेड स्टेटस' की दस लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं और जो दुनिया के कई अन्य भाषाओं में अनूदित भी हुई है ) ने कुछ समय पहले अपने एक लेख में (Howard Zinn , America's Blinders, April 2006 Issue, Progressive) अपने स्तर पर इसकी विवेचना की थी। उनके हिसाब से इसके दो कारण हैं और उनके मुताबिक अगर इन्हें समझा जा सके तो हम धोखा खाने से बच सकते हैं। वे लिखते हैं : ''एक है समय का आयाम, अर्थात ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का अभाव और दूसरा है स्थान का आयाम अर्थात, राष्ट्रवाद की सीमाओं के बाहर न सोच पाने की क्षमता।' हावर्ड झिन आगे लिखते हैं कि 'हम लोग दरअसल इस अहंकारपूर्ण विचार के शिकार हैं कि यह मुल्क विश्व का केन्द्र है, अत्यधिक सद्गुणसम्पन्न है, प्रशंसनीय है और श्रेष्ठ है।'
अगर कोई यही प्रश्न हमें पूछे तो हम क्या कह सकते है ?
क्या यही विश्लेषण हमारे लिए काफी होगा या इसमें कुछ बात जोड़नी पड़ेगी, जबकि हम खुद देख रहे हैं कि यहां की सरहदें तो महज भौतिक नहीं हैं, वे तो मानसिक भी हैं, समाजी-सियासी -सांस्कृतिक इतिहास द्वारा गढ़ी भी गयी हैं, जहां हम पा रहे हैं कि मुल्क के अन्दर नयी 'सरहदों' का, नए 'बॉर्डरों' का निर्माण होता दिख रहा है।
फौरी तौर पर कहा जा सकता है कि कर्नाटक में जला दिये गये समुदाय विशेष के प्रार्थनास्थलों की राख से, डांग जिले के एकमात्र मुस्लिम बहुल गांव पर सरकारी शह पर जारी हमलों के बीच से या कंधामाल तथा उड़िसा के विभिन्न हिस्सों से गांवों तथा नगरों से खदेड़ दिए गए और अपने ही मुल्क में शरणार्थी बने लोगों की ''वीरान हो चुकी आंखों से या कुम्हेर, खैरलांजी और गोहाना, हरसौला जैसे दलित अत्याचारों की निशानियों से गणतंत्र हिन्दोस्तां में उभरी इन 'सरहदों' का सवाल फिर एक बार हमारे सामने नमूदार हुआ है और सिर्फ हिंसा के उस प्रगट दौर में ही नहीं बल्कि स्थगित हिंसा के लम्बे दौर में, जब लोग जीवन की सुरक्षा का हवाला देते हुए अपने-अपने 'घेट्टो' में पहुंच रहे हैं।
हावर्ड झिन की बहस को आगे बढ़ाते हुए यह रेखांकित किया जा सकता है कि हुकूमतों के लिए भी यह ज्यादा आसान होता है कि वह 'बाहरी दुश्मनों' के सहयोगी 'आन्तरिक दुश्मनों' पर भी जोर दें ताकि नागरिक न केवल खुशी खुशी अपनी सरकारों के इन खूंरेजी अभियानों में साथ जुड़े बल्कि अपने स्तर पर भी इसी लड़ाई को इन 'आन्तरिक दुश्मनों के खिलाफ तेज करे। 9/11 के बाद अमेरिका ने जहां 'आतंकवाद विरूध्द युध्द' के नाम पर अपने एक समय के सहयोगी ओसामा बिन लादेन के खिलाफ या उसे कथित तौर पर सहयोग प्रदान करनेवाली अफगाणिस्तान की तालिबान हुकूमत के खिलाफ या बाद में इराक पर आक्रमण किया वहीं इसी के समानान्तर उसने एक ऐसा वातावरण निर्मित किया जिसके तहत चन्द जिहादी आतंकवादी नहीं बल्कि 'इस्लाम को ही विश्व शान्ति के लिए खतरे के तौर पर पेश किया गया', जिसका नतीजा हमारे सामने हैं। 'आतंकवाद विरोधी युध्द' के इन सात सालों में कितने बड़े पैमाने पर अमेरिका के अन्दर इस्लाम को मानने वालों को प्रताडित, अपमानित होना पड़ा है, इसका हिसाब लगाना मुश्किल है। विडम्बना यही है कि अमेरिकी अवाम के एक हिस्से ने भी अपनी हुकूमतों का इसमें साथ दिया है और अधिक बारीकी में पड़ताल करेंगे तो हम यह भी देख सकते हैं कि यह कोई स्वत:स्फूर्त किस्म की प्रतिक्रिया नहीं थी, सोविएत रूस के पतन के बाद एवम शीतयुध्द की समाप्ति के पश्चात दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाए रखने के लिए 'सभ्यताओं की टकराहट' की जो थीसिस हंटिगण्टन ने पेश की थी, उसी की यह तार्किक परिणति थी।
हमारे यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सुप्रीमो गोलवलकर अपनी चर्चित रचना 'बंच आफ थॉटस' में (विचार सुमन) में इसी समझदारी को एक सैध्दान्तिक जामा पहनाते हुए चन्द समुदायों एवम विचारशील समूहों को - मुसलमानों, ईसाइयों एवम कम्युनिस्टों को - देश के आन्तरिक दुश्मन घोषित करते हैं। निश्चित ही उनके गोलवलकर के संकीर्ण एवम एकांगी विचारों को माननेवालों के लिए फिर गुजरात 2002 का जनसंहार या उड़िसा में आज जारी संहार एक तरह से 'देशभक्ति का प्रमाण' बन जाता है।
आजादी के बाद तीन ऐसी राजनीतिक हत्याएं हमारे यहां हुई जिसे किसी न किसी रंग के आतंकियों ने अंजाम दिया। चाहे महात्मा गांधी जैसे विश्वविख्यात नेता की हत्या की बात हो - जिसे हिन्दु महासभा के कार्यकर्ता नाथुराम गोडसे ने गोली मारी, प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जिन्हें उनके सिख बाडीगार्डों ने मार डाला या पूर्वप्रधानमंत्री राजीव गांधी जो तमिल हिन्दु गुरिल्लों के आत्मघाती हमले में मारे गए, इसके बावजूद हमारे यहां का समूचा वातावरण देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय विशेष के खिलाफ इतना विषाक्त क्यों हुआ है।
निश्चित ही कई छोटे बड़े आतंकी समूह सक्रिय होंगे जो इस्लाम को मानने वाले हों, लेकिन क्या यह जांचा जाना जरूरी नहीं कि हिन्दोस्तान की हुकूमत ने जिन संगठनों पर आतंकी या विघटनकारी संगठनों के तौर पर पाबन्दी लगायी है, उनमें आखिर तीन या चार ही मुस्लिम बहुल क्यों हैं ? इसकी पड़ताल कौन करेगा कि इनमें 'उल्फा' या 'लिट्टे' जैसे हिन्दुबहुल संगठन कितने हैं या कितने सिख, बौध्द या ईसाई बहुल संगठन हैं ?
हाल के समयों में संघ परिवार से सम्बध्द बजरंग दल या विश्व हिन्दु परिषद के कार्यकर्ता कई स्थानों पर बम बनाते पकड़े गए हैं या बम बनाते मारे गए हैं ! अप्रैल 2006 का नांदेड हो, फरवरी 2007 में फिर नांदेड में बम धमाके की घटना हो, जनवरी 2008 का तमिलनाडु स्थित तेनकासी में संघ कार्यालय पर बमों से हमला करने में हिन्दु मुन्नानी संगठन के कार्यकर्ताओं की गिरतारी हो या हाल में महाराष्ट्र के वाशी एवम ठाणे में सिनेमाहालों में बम रखते हुए पकड़े गए 'सनातन संस्था' और 'हिन्दू जनजागृति समिति' के कार्यकर्ता हों या सबसे ताजी घटना के रूप में कानपुर बम धमाकों में बजरंग दल के दो कार्यकर्ताओं की मौत का प्रसंग हो , आदि तमाम घटनाएं एवम प्रसंग हमें क्या बताते हैं ?
क्या आतंकवाद पर समुदायविशेष की इजारेदारी कभी हो सकती है ? या यह मानना उचित होगा कि कोई भी ऐसा धार्मिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक समूह ऐसी आतंकी कार्रवाइयों पर उतर सकता है, जब उसे लगे कि उसके 'वास्तविक' या 'आभासी' दुखों का निपटारा ऐसे तरीकों से ही हो सकता है।
पांच साल पहले की बात है। गुजरात 2002 के कतलेआम पर कलकत्ता की कविता पंजाबी और उनके दो सहयागियों ने इस जनसंहार के बच्चों और युवाओं पर असर के बारे में एक मर्मस्पर्शी रिपोर्ट 'अगली पीढ़ी ': जनसंहार की छत्राछाया में ' देखने को मिली थी। वे अपनी इस रपट को पूरी करने के लिए तमाम सारे शिविरों में गयी थीं। जनसंहार ने बच्चों को किस तरह अन्दर से धवस्त किया इसका विवरण यह रिपोर्ट पेश करती है। इस रिपोर्ट में आठ साल का सद्दाम भी है जिसकी तस्वीर भी एक मोहक हंसी के साथ रपट में मौजूद है । कविता पंजाबी बताती हैं कि यह उसके चेहरे का स्थायी भाव है जहां उसने यह कृत्रिम सा मुस्कान चस्पा कर लिया है ताकि कोई यह अन्दाज़ा भी न लगा पाये कि उसने अपनी मां के साथ गन्दा काम होते देखा या उसको काट कर जिन्दा जलाये जाते देखा। उनमें आठ साल का जुनैद भी था। यह वही जुनेद है जिसने न केवल अपने मां बाप को मारे जाते देखा बल्कि अपनी चाचियों या मौसियों को पास के कुएं में मार कर फेंकते भी देखा था जिस कुएं के पास वह और उसके अस्सी साल उम्र के दादाजी घण्टों निहारते बैठे रहे और तीन दिन बाद उसकी चाची उसमें से जिन्दा निकली।
कल बड़ा होने पर सद्दाम या जुनैद या उनमें से कोई अन्य, इन्साफ पाने की सभी सूरतें बेकार पाकर, प्रतिशोध के नाम पर किसी आततायी कार्रवाई में जुट जाये, तो यह समाज क्या यह समझने की कोशिश नहीं करेगा कि इसकी जड़ कहां पर है। क्या समाज अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखेगा कि समाज के मौन, उसकी सहभागिता ने ही हालात को यहां पहुंचाया है या वह टाडा या पोटा के और खतरनाक संस्करण के साथ हाजिर होती हुकूमत की तारीफ में कसीदे पढ़ना अपने कर्तव्य की इतिश्री समझेगा!

सुभाष गाताड़े