( यह आलेख हमे युवा संवाद उज्जैन की अपूर्वा ने भेजा है। आमतौर पर यह कहा जाता है कि जाति प्रथा अब ख़त्म हो रही है, कमज़ोर पड़ रही है…आदि-आदि…यह लेख तस्वीर का दूसरा रुख दिखाता है)
उत्तर प्रदेश में स्कूल के कुछ बच्चों ने मिड डे मील खाने से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि इसे दलित महिलाओं ने पकाया था।
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| बच्चों के बीच ज़हर |
प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले किसी बच्चे की आयु कितनी होती है? उसे इस आयु में इस बात का बोध नहीं होता कि भोजन पकाने वाली महिला किस जाति या वर्ग की है। स्वाभाविक है कि इन बच्चों के अभिभावकों को जब यह पता लगा होगा कि स्कूल में बच्चों के लिए भोजन पकानेवाली महिला दलित वर्ग से है, तो शायद उन्होंने ही अपने बच्चों को भोजन करने से रोक दिया होगा। अभिभावकों ने केवल अपने बच्चों को वह भोजन खाने से ही मना किया, बल्कि कई स्थानों पर स्कूल के रसोईघर में तोड़फोड़ की और पुलिस पर पत्थर भी बरसाए। मुझे सबसे अधिक अफसोस उन संस्थाओं और उनके स्वनामधन्य नेताओं के प्रति होता है जो हिंदुत्व का एजेंडा लेकर चल रहे हैं और नारा उछालते हैं- गर्व से कहो हम हिंदू हैं। हिंदू समाज की ही एक महिला के हाथ के पके भोजन का तिरस्कार करके उन्हें किस प्रकार के गर्व की अनुभूति हो सकती है?
हिंदुत्व का एजेंडा लेकर चलने वाली संस्थाओं की प्राथमिकता में अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण की बात है। देश भर में गौवध पर प्रतिबंध लगाने की बात भी है, पाकिस्तान के प्रति कड़ा रुख अपनाने की बात भी है किंतु सारे देश में दलित वर्ग के प्रति जो भेदभाव बरता जाता है, उसे दूर करने का अभियान चलाना उनकी प्राथमिकता में क्यों नहीं है? छुआछूत की इस व्याधि के कारण असंख्य लोगों को मतांतरण करना पड़ा और डॉ. अंबेडकर को यह कहना पड़ा-मैं हिंदू होकर जन्मा अवश्य हूं, किंतु हिंदू रहकर मरूंगा नहीं। 1950 में जब देश में नया संविधान लागू हुआ था, तो उसमें अस्पृश्यता को अपराध घोषित कर दिया गया था। कानून तो बन गया किंतु लोगों की मानसिकता नहीं बदली।
आज भी देश के विभिन्न भागों से इस प्रकार के समाचार आते रहते हैं कि दूल्हा बने दलित युवक को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया गया, दलितों को सार्वजनिक कुएं से पानी नहीं भरने दिया गया, किसी दलित को मंदिर में नहीं घुसने दिया गया। देश की संपूर्ण जनसंख्या का पांचवां भाग दलित वर्ग का है। इस पूरे वर्ग को जातिवाद पर आधारित हमारी समाज व्यवस्था में भेदभाव की पीड़ा झेलनी पड़ती है। प्राचीनकाल से ही दलित वर्ग को शिक्षा से वंचित रखा गया। उन्हें भूमि ग्रहण करने या किसी प्रकार की संपत्ति रखने का अधिकार या अवसर तो कभी मिला ही नहीं। देश के लगभग सभी भागों में, विशेषरूप से गांवों में दलित और सवर्ण बस्तियां अलग-अलग बनती रही हैं।
तमिलनाडु के मदुराई जिले के एक स्थान उत्युपुरम में यह भेदभाव इस सीमा तक है कि सवर्ण जाति के लोगों ने पांच सौ मीटर लंबी दीवार बना ली है, जिससे दलित उनकी बस्ती में न जा सकें। अस्पृश्यता विरोधी कानून, शिक्षा के प्रसार और आधुनिक जीवन के दबाव के कारण, इस व्याधि ने अनेक नए रूप धारण कर लिए हैं। मैला ढोने के काम पर अधिकतर दलितों को ही लगाया जाता है। तमिलनाडु के कुछ गांवों में डाकिये दलितों के घरों में जाकर डाक नहीं देते। स्कूलों में अधिसंख्य अध्यापक सवर्ण जातियों के होते हैं। कक्षा में दलित बच्चों को अलग बैठाया जाता है। सवर्ण जाति के बच्चों के साथ उन्हें पानी नहीं पीने दिया जाता। प्राय: अध्यापक दलित विद्यार्थियों को उनकी जाति के नाम से पुकार कर उनका अपमान करते हैं। यदि किसी दलित विद्यार्थी को अध्यापक शारीरिक दंड देना चाहता है तो यह कार्य किसी दूसरे दलित विद्यार्थी से कराया जाता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में उनसे कहा जाता कि सप्ताह के एक विशेष दिन वे अपना राशन लें।
दलितों ने जब भी इस भेदभाव का विरोध किया सवर्ण जातियों के लोगों ने उनका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया। अधिसंख्यक दलित खेतिहर मजदूर हैं। उन्हें जमीदारों ने खेतों में काम देने से मना कर देते हैं। भूख से मरते हुए लोग संभ्रांत लोगों के समक्ष घुटने टेकने और सभी प्रकार की अन्यायपूर्ण शतर्ें मानने को बाध्य हो जाते हैं। यह स्थिति भी कम खेदजनक नहीं है कि भेदभाव और छुआछूत का समर्थन करने में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भी सवर्ण जातियों से पीछे नहीं हैं, जबकि सदियों तक वे स्वयं जात-पात की व्याधि झेलते रहे हैं।

