20 मई 2010

क्या बच्चे बड़ों के उपनिवेश हैं?

इनके भी हक़ूक हैं!
बड़ों के उपनिवेश नहीं हैं बच्चे 

  •  चन्दन यादव


किसी एक देश पर दूसरे देश के प्रत्यक्ष राजनैतिक शासन को ‘उपनिवेश’ कहा जाता है, अगर  उपनिवेश शब्द को इंसानों के लिये उपयोग किया जा सके तो मैं कहूंगा कि बच्चे अभी तक बडों के ‘उपनिवेश’ बने हुए हैं। चूंकि वे अपनी परवरिश के लिये अपने से बड़ों पर निर्भर हैं, इसलिये इससे उनकी मुक्ति तभी संभव है जब बड़े यह समझ सकें कि बच्चों पर उनके औपनिवेशिक शासन की अन्तर्वस्तु क्या है ? और यह बच्चों के वर्तमान और उनके भविष्य को किस तरह प्रभावित कर रही है ?

दुनिया के सारे माँ बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो। इसलिये वे ये तय करते हैं कि बच्चे क्या करें, क्या ना करें ? वे किस तरह की पढ़ाई करें ? बच्चों की दासता की सबसे बड़ी वजह, बड़ों की यही चाह है। चूंकि बच्चे क्या करें, कैसे करें, आदि उनके भविष्य से जुड़े सवाल हैं। बच्चों के भविष्य की तैयारी से जुड़े सवाल हैं, और बड़ों के लिये यही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इसलिये बच्चों का वर्तमान संकट में है। वे अपने वर्तमान की पीठ पर भविष्य के बोझ की ऐसी गठरी ढो रहे हैं, जिसके बारे में वे खुद भी नहीं जानते कि इस गठरी का क्या होने वाला है ? किसी भी इंसान के लिये इससे दुर्भाग्यपूर्ण कुछ और नहीं हो सकता कि वह अपने वर्तमान में ना जी पाये। वर्तमान में जीने का मतलब है, अपनी इच्छा और खुशी के काम कर सकना। जो अभी है, उसमें जीना। अपने समय और समाज के प्रति जो जिज्ञासा है, उसको अपनी तरह से समझने के लिये स्वतंत्र होना। किसी भी बच्चे के लिये आज यह बहुत मायने नहीं रखता कि उसे बड़ा होकर इंजीनियर, डाक्टर या आई. ए. एस. बनना है। अभी उसके लिये खेलना, चित्र बनाना, संगीत सुनना, नाचना, आज स्कूल नहीं जाना या कुछ भी नहीं करना, इनमें से कोई बात, मायने रखने वाली हो सकती है। बड़ों के लिये ये सब बातें बच्चे के भविष्य के लिये घातक हैं। इसलिये वे उन पर भविष्य की तैयारी का बोझ लादते हैं। धीरे धीरे बहुत से बच्चे इसी के लिये अनुकूलित हो जाते हैं। वे कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिये तैयारी करते हैं। इसमें असफल हो जाने पर कुछ आत्महत्या भी कर बैठते हैं। कुछ इंजीनियर, डाक्टर या आई. ए. एस. भी बन जाते हैं। पर ये सफल लोग भी अपनी इच्छा और खुशी को बचपन में ही इतने गहरे दफन कर चुके होते हैं कि आजीवन उसको पहचानने में असमर्थ बने रहते हैं। वे आजीवन भविष्य की तैयारी के लिये जीते हैं। पर भविष्य की तैयारी आज जीने से भिन्न है। इसमें कल के लिये धन दौलत जुटाना और अपने बच्चों को कुछ उसी तरह के भविष्य के लिये मुस्तैद करना, जिससे गुजरकर वे यहाँ तक पहुंचे हैं, से ज्यादा क्या हो सकता है ? नतीजतन हम ऐसा सामाजिक वातावरण पाते हैं, जिसमें सब तेजी से भाग रहे हैं। दूसरों के मुकाबले पिछड़ जाने से भयभीत और कुण्ठित तथा अपने समय और समाज से कटे हुए लोग पाते हैं। इस तरह का समाज बच्चों को, बड़ों की इच्छाओं का ‘उपनिवेश’ बना देने का नतीजा है। इसके उलट अगर बच्चों को बनी बनाई मान्यताओं को अपनाने की जगह खुद सोचने समझने के मौके दिये जायें। उन्हें अपनी रुचि को पहचानने की मोहलत दी जाये, तब भी वे षायद कोई बड़ा सपना ही देखेंगे। पर वह उनका अपना सपना होगा।    

बच्चों से जुड़ा दूसरा पक्ष ‘समाज’ है जो परिवारों का समूह होने के कारण इससे भिन्न नहीं है। समाज और बच्चों के रिश्ते पर जो मैं यहाँ कह रहा हूं वो परिवारों पर भी लागू होता है। बच्चों के बारे में समाज की मान्यता यह है कि वे नादान हैं, इसलिये उनको समाज के तौर तरीके और मूल्य मान्यताएं समझाना बड़ों का फर्ज है। तो बड़े बच्चों को समझाते हैं कि झूठ मत बोलो, चोरी करना बुरी बात है, अपने से बड़ों का सम्मान करो, ये करो, वो मत करो बगैरा। ये सूची कितनी लम्बी हो सकती है इसका जिक्र मस्तराम कपूर ने अपने एक लेख में किया है। उन्होंने लिखा है कि वे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में शामिल हुए थे जिसका विषय ‘मानव मूल्यों की पहचान’ था। इसमें शामिल विद्वानों ने उस समय बच्चों को सिखाने के लिये 83 मानव मूल्यों की पहचान की थी। तथा इसमें 400 मानव मूल्यों को खोजने का लक्ष्य रखा गया था। इससे पता चलता है कि बड़े बच्चों को सिखाने के लिये कितने लालायित रहते हैं। और दरअसल यह होता हेै कि झूठ मत बोलो सिखाने वाले पिताजी को बच्चा आफिस से छुट्टी लेने के लिये बीमारी का बहाना करते देखता है। चोरी मत करो सिखाने वाले पिताजी को रिष्वत का पैसा घर में लाते देखता है। बच्चे सुनते हैं कि बड़ों का आदर करो। पर व्यवहार में पाते हैं कि घर के नौकर और खुद से हैसियत में छोटे लोगों के बारे में यह बात लागू नहीं होती। तो बच्चों को संस्कारित करने के इस पूरे प्रपंच से बच्चा ये सीखता है कि अच्छी अच्छी बातें पढ़ने और बोलने के लिये ही हैं। असली बात है किसी भी तरह से अपना काम निकालना और सफलता पाना। 

बच्चों के लिये यह दुनिया इतनी बुरी नहीं होगी, अगर बड़े इस सोच से उबर पायें कि बच्चे नादान नहीं होते। वे अपने परिवार ओर परिवेश के वातावरण से सीखते हैं। उन पर अपने विचार थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिये। बल्कि सीखने में उनकी सहायता करनी चाहिये। उन्हें अपनी खुशी और रुचि से सीखने की मोहलत दी जानी चाहिये। 

बच्चों के सरोकारों से वास्ता रखने वाली दो अन्य संस्थाएं हैं, स्कूल और सरकार। स्कूल पर मैं सिर्फ इतनी टिप्पणी करना चाहता हूं कि वे हमारे ‘समाज’ के आईने हैं। सरकार इंसानों को संसाधन की तरह देखती है। इसके लिये बाकायदा ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ नाम का एक विभाग अस्तित्व में है। हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षा के बारे में इस तरह के अनुमान साफ पढ़े जा सकते हैं जिनमें यह उल्लेख होता है कि आने वाले कुछ सालों में इस देश को इतने साक्षर मजदूर, इतने क्लर्क, इतने साफटवेयर इंजीनियर, आदि की आवष्यकता होगी। जिसके लिये फलां फलां प्रबंध किये जाने के लिये फलां राशि की आवष्यकता होगी। इंसानों के बारे में की जाने वाली ये बातें सरकार के इंसानों, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, के बारे में किसी मानवीय समझ को नहीं, ‘मानव संसाधन प्रबंध’ को दर्शाती हैं। 

अतः हम कह सकते हैं कि बच्चे बड़ों के ‘उपनिवेश’ बने हुए हैं। उन्हें भविष्य में काम आने वाली चीज बनने के लिये तैयार किया जा रहा है। इसलिये उनके पास इतना अवकाश नहीं है कि वे अपने आसपास घट रही बातों के बारे में सोच सकें। वे अपने समय और समाज की वास्तविकताओं से इतने अनिभिज्ञ हैं कि उन्हें कोई भी लालकृष्ण या रामचन्द्र धर्म, संस्कृति, देश और जाति के नाम पर भड़का सकता है। वे जकड़न और अकेलापन महसूस करते हैं, कुण्ठित होते हैं। असफलता उन्हें इतना तोड़ देती है कि वे आत्महत्या तक कर लेते हैं।

इसलिये अगर हम एक सचमुच का लोकतांत्रिक और बराबरी पर आधारित समाज बनाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले बच्चों से पेश आने का तरीका बदलना होगा।                                                                       

3 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

हमें सब बच्चों को एक जैसी परिस्थितियाँ देने वाला समाज चाहिए, उस के लिए काम करें।

Rangnath Singh ने कहा…

गजब है भई। हम उपनिवेश थे !

विजय गौड़ ने कहा…

एक सुंदर निबंध के लिए लेखक चंदन यादव को बधाई एवं शुभकामनाएं। प्रस्तुति के लिए आभार।