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09 मार्च 2013

वैज्ञानिक चीजों से अपने जीवन को खूब आधुनिक बना चुके तथाकथित शिक्षित वर्ग के ये लोग आज भी वैज्ञानिक चेतना से कोसों दूर क्यों हैं ?

आशीष देवराड़ी 

मैं  शिवरात्री के  पर्व को आस्थावादी नजरिये से देखने से इतर एक दूसरे ही नजरिये से देखना पसंद करता हूँ   वह दूसरा नजरिया है ' हमारी शिक्षा की असफलता के रूप में  ' शिवरात्री के पर्व और शिक्षा की असफलता के बीच क्या सम्बन्ध हो सकता हैं यह पूछे जाने की आवश्यकता हैं संबध हैं ,बिलकुल हैं और वह यह कि हमारी शिक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में पूर्णतः असफल रही हैं 

गरीब अशिक्षितों की बात ही क्या की जाए जब हमारे समाज का शिक्षित और साधन सम्प्पन तबका आज व्रत  रखने और मंदिरों में लम्बी लाइनों में लगने को आतुर हैं  वह रेलवे की टिकट खिड़की पर आधे मिनट खड़े होने पर बैचैन होने लगता हैं पर यहाँ वह घंटो बिना नाक सिकोड़े घंटों खड़ा रह लेता हैं  कपड़ों से लेकर कारों तक उसे सब विदेशी पसंद हैं पर मंदिरों की लम्बी कतारे उसे भारतीय ही पसंद आती हैं 


दरअसल समाज के शिक्षित वर्ग ने हमेशा देश को धोके में रखा हैं। वह बात कुछ करता हैं और आचरण कुछ   बेचारा गरीब और अशिक्षित तो अपनी परिस्तिथियों के मारे अंधविश्वास के जाल में जकड़ा हुआ हैं पर समाज का वह तबका जो न्यूनतम श्रम में अधिकतम उपभोग करता हैं और खुद को शिक्षित कहता हैं क्यों इस अंधविश्वासों से खुद को मुक्त नहीं कर सका हैं ? वैज्ञानिक चीजों से अपने जीवन को खूब आधुनिक बना चुके तथाकथित शिक्षित वर्ग के ये लोग आज भी वैज्ञानिक चेतना से कोसों दूर क्यों हैं ? और हम चिंतित रहते हैं अशिक्षितों को शिक्षा देने के लिए पर शिक्षितों का हाल देखने की फुर्सत और समय भी हमें अब जुटाना चाहिए 

कमी शायद हमारी शिक्षा में ही रही हैं  बड़ी बड़ी डिग्रियां और विश्वविद्यालीय शिक्षा सामाजिक बुराइयों से लड़ने और  समाज को बेहतर दिशा में ले जाने के लिए हमारी रत्ती भर भी सहायता नही करती  वह वैज्ञानिक नजरियों को विकसित नही करती। किसी भी घटना को तर्क के आधार पर समझने की  क्षमता पैदा  नही करती वह समाज को जस का तस बनाएं रखने वाले पैरोकारों को पैदा करने का कारखाना मात्र हैं  हमारा शिक्षा का चरित्र यथास्थितिवादी हैं  इसलिए आज जब हम शिक्षा को जन जन तक पहुचाने के लिए चिंतिंत हैं हमें इस बात पर सर्वप्रथम विचार करना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षा हमें वह दे पा रही हैं जिसकी हमें उससे उम्मीद हैं , यदि नही तो हम क्यों शिक्षा के अधिकार और साक्षरता के आकड़ों पर मोहित हों ? ऐसी शिक्षा से तो बेहतर हैं मेरा देश और मेरे अशिक्षित लोग 

03 मार्च 2013

भक्ति : अर्थ और क्षेत्र ...


नई सोच श्रृंखला के तहत आज प्रखर मिश्र विहान                                                                                 


भक्ति अर्थ और क्षेत्र --
राष्ट्रभक्त , गुरुभक्त और भी कितना कुछ , हजारों सालों की राजशाही और सामंतवादी व्यवस्था से निकलने के बाद हम आज स्वयं को प्रजातांत्रिक मूल्यों वाला स्वतंत्र प्राणी तो मानते हैं लेकिन इन लोक लुभावन और भक्तिपूर्ण शब्दों के स्वरुप में छिपे निरे सामंतवादी अमानवीय प्रयोजनों को नकार देते हैं l यहाँ पर भक्ति शब्द के अर्थ सामाजिक सन्दर्भ में व्याख्या करना जरुरी हो जाता है l सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से गलतियाँ करना व उन गलतियों से सीखना , मानव प्रगति का एक मात्र आलंबन है क्युकी भक्ति में आलोचना निषेध है अत: एक बात तो साफ़ है कि भक्ति कभी प्रगतिशील नहीं हो सकती ,अब बात यह हो सकती है कि यदि हम भक्ति के प्रति समाज द्वारा स्थापित सारे पूर्वाग्रह अलग कर दे तो ''भक्ति है क्या'' ? चलिए इस बात को समझने प्रयास करते हैं ,आप ने आज तक किसी परिजित नायक के भक्तों की तस्वीरें टंगी देखीं हैं कहीं , क्या उनकी वीरता और समर्पण का कोई भी कीर्तन सुना है ? उत्तर होगा नहीं क्युकी भक्ति गुलामी के लिए स्थापित हुआ सभ्रांत और सुन्दर शब्द मात्र है l आगे दिए विवरण से यह बात और भी साफ़ हो जाएगी l

सत्य , संप्रभु और भक्ति में सम्बन्ध--
सत्य कोई युनिवर्सल शब्द नहीं है , विजेयता स्वयं के चुने हुए अलाम्बो और सुविधाओं को सत्य स्थापित कर देता है और फिर इस सत्य की छद्म चेतना का प्रसार अपने राज्य या विचारधारा को स्थिरता प्रदान करने के लिए करता है जो लोग इस सत्य के इस शाशकीय स्वरुप को स्व इक्षा से स्वीकार कर लेते हैं वह भक्त हो जाते हैं और जिनको यह सत्य जबरन स्वीकार कराया जाता है वह गुलाम सत्य के इस सम्प्रेषण से अब शक्तिमान संप्रभु बन जाता है l दोनों परस्थियों से अलग इस सत्य से इंकार करने वाले बागी हो जाते हैं और संप्रभु के शत्रु भी l कुल मिला कर कहा जाए तो किसी भी प्रकार के मानवीय बिम्बों से परे प्रेम या आलोचना से परे भक्ति संप्रभु की ''विशुद्ध गुलामी'' ही है जिसको हम पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी आने वाली नस्लों को हस्तांतरित करते जाते हैं l यह मानव की प्रगति शीलता और स्व अस्तित्व पर शाशकीय शक्तियों (धर्म ,समाज ,सरकार ) द्वारा आघात है l
स्वतंत्रा और भक्ति--
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह स्व अस्तित्व के अनुरूप बौद्धिकता सामाजिक परिवेश या विचारधारा का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन मानवीय स्वतंत्रा का पूर्ण अर्थ सिर्फ स्व अनुरूपता के चुनाव में नहीं है यह काम तो जानवर भी करते हैं l स्वतंत्रा का अर्थ , दूसरों के चुने हुए विषम को सम्मान के साथ तर्क की कसौटी पर तौलना व दो विषमों में मध्य तार्किक संवाद स्थापित करना है , यह प्रक्रिया हमारे जैसे भक्तिमय वातावरण वाले देश में अधिक संभव नहीं क्युकी हम अपनी भक्ति द्वारा धर्म से लेकर राजनीति तक ऐसे बिम्ब स्थापित कर लेते हैं जहाँ आलोचना या प्रश्न करने से किसी ना किसी सामाजिक समूह की आस्था आहात हो जाती है और भक्ति के कारण बिना आलोचना या तार्किक अध्ययन के संस्थाएं रूढ़िवादी और जड़ होती चली जाती हैं l
सारतत्व --
रिल्के ने कहा था ''तुम अपनी जिन्दगी के प्रारंभकर्ता बन सकते होलकीर से हटने से एक नया सुख मिलता है'' क्या इस नवीनता की लालसा को चरित्रपतन कहा जा सकता है ? यह कुछ कुछ संप्रभु द्वारा प्रेषित अंतर्द्वंद जैसा है कि अगर तुम मेरी भक्ति पर प्रश्न करोगे तो मैं तुम्हारे चरित्र पर प्रश्न करूँगा चुकि निर्धारित बिम्बों (जिनकी भक्ति समाज करता चला आ रहा है) का चुनाव एक बच्चा नहीं करता इसलिए उसका मानवीय कर्तव्य है कि वह संस्थाओं जांचे और तौले समाज में रह संवाद स्थापित करे ,तर्क के अन्वेषण का आनंद ले और यह हमारा लक्ष होना चाहिए कि हम समाज में ऐसा वातावरण पैदा करें कि किसी भी व्यक्ति को बौद्धिकता की अंतहीन संभावनाओं पर बस इस कारण रोक ना लगा दी जाए कि वर्षों से चली आ रही किसी मान्यता की भक्ति पर कोई विशेष समूह प्रश्न नहीं सह सकता l यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी आने वाली नस्लों को बनी बनायीं मान्यताओं की गुलामी या भक्ति देंगे अथवा एक ऐसा प्रगतिशील वातावरण जिसमें वह स्वतन्त्रतापूर्व आलोचना व तर्क का अन्वेषण कर सके l
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प्रखर मिश्र विहान स्वतन्त्र फिल्मनिर्माता हैं |वामपंथी झुकाव रखते हैं |फेसबुक पर सक्रिय  हैं |

01 मार्च 2013

स्त्री और हमारा समाज

'नई सोच' कालम के तहत इस बार का लेख लिखा है हमारे संगठन के सक्रिय साथी मनोज विसारिया ने. आप सबकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी  
चित्र यहाँ से 



हमारे भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति विश्व की स्त्रियों की तरह बड़ी ही दुविधा पूर्ण रही है। एक ओर और वह वेदों की श्रचाओं का निमार्ण करती दिखाई देती है, तो दूसरी और उसे राज सभा में पुरूषों के बराबर शास्त्रार्थ करते भयभीत भी किया जाता रहा है। एक ओर वह देवी के रूप में युद्धस्थल में युद्ध करते पाते हंै, तो दूसरी ओर वह दहलीज के भीतर लक्ष्मण रेखाएँ कैद मिलती हैं। वह जगत जननी भी है और नरक की खान भी। ऐसे में हम भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति का सहज अनुमान नहीं लगा सकते।

आदिम युग में जब स्त्रियाँ अधिकार और कृषि युग में घर में रहते हुए अग्नि की रक्षा, गौ दोहन और मनुष्य के बच्चे पालने लगीं तब से ही उनकी गुलामी का दौर शुरू हुआ, जो आज भी जारी है। स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है, फ्रांसीसी नारीवादी लेखिका सिमोन द बउवार का कथन पूर्णरूपेण सत्य है। स्त्री पर जन्म से ही बहुत सारी अश्क्तताएँ लाद दी जाती हैं कि वह शारीरिक और मानसिक रूप से अपने को अक्षम पाती है। हमारा समाज आज भी तमाम वैज्ञानिक चेतना और सांस्कृतिक नवाचार के बाद भी स्त्री खासकर लड़कियों को लेकर आज तक सहज नहीं हो पाया है।

आज भी हमारे  समाज में  लड़कियों को चहारदिवारी के भीतर रखे जाने का रिवाज़ बदस्तूर जारी है। हमारे गाँवों में आज भी लड़कियों को बचपन में पिता ए युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्रों की   आज्ञा का पालन करते रहना ही अच्छा माना जाता हैं। पिता उसे शिक्षा दिलाये या न दिलाये, उसका विवाह चाहे जहाँ और चाहे जैसे पति के साथ विवाह दे उसे मुँह खोलने की इज़ाज़त नहीं है। लड़कियों को हमेशा सीख दी जाती है कि पति जैसा कहे वैसा मानो, जैसे रखे वैसे रहो, पति परमेष्वर होता है। उसकी हर स्थिति में आज्ञा का पालन करना चाहिये, उसी में तुम्हारी भलाई है, यही तुम्हारा धर्म है, पति के प्रतिकूल जाने वाली लड़की पाप की भागीदारी होती। गाँव  में देखने को मिलता है कि वहाँ के पुरूष अपने आस-पड़ौस में बैठ कर आराम से ताश या जुआ खेलते है और स्त्रियाँ घर और खेतों पर काम करती है। फिर भी उनके श्रम को समाज में कोई महत्व नहीं है। हमारे गावों में प्रायः देखने में आता है कि यदि लड़कियाँ घर से पढ़ने कुछ दूर के ही स्कूल में जाती हैं तो उसके अपने परिवार तथा पड़ोस वाले ही उस पर तमाम तरह के लांछन लगाने से नहीं चूकते। कभी-कभी यह स्थिति इतनी अपमानकारी होती है कि लड़की स्वयं ही या माता-पिता अपनी इज्ज़त की खातिर पढ़ाई बीच में ही समाप्त करवा देते हैं। लड़कियों के बाल विवाह के पीछे सबसे ज्यादा समाज की दकियानूसी परंपराएँ और घर-परिवार की इज्ज़त का सवाल ही अधिक जिम्मेवार होता है। गाँव की निचली जातियों के परिवारों में लड़कियों की अशिक्षा और अवनति का कारण गरीबी और अंधविष्वास तो है ही गाँव की तथाकथित ऊँची जातियों के बिगड़ैल लड़कों के भय के कारण भी लड़कियों के अशिक्षित और कम उम्र में विवाह के तथ्य सामने आये हैं।

समूह चर्चा के दौरान यह भी तथ्य उभर कर सामने आया कि दहेज और लड़कियों के विवाह पर होने वाले अत्यधिक खर्च भी लड़कियों की पैदाइश को रोकते हैं, ज्यादातर ऊंची जाति व वर्ग के लोग विवाह के लिए विशेष पार्टी हाल बुक करवाते है। जबकि सामान्य व्यक्ति के लिए इस तरह का खर्चा कर पाना संभव नही, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण ज्यादातर माता-पिता को लगता है कि उनका कर्तव्य है कि अपनी बेटियों की शादी पर दिल खोलकर खर्च किया जाए ैं। ऊंची जाति के एक सामान्य विवाह में 15 से 20 लाख का खर्च आता है। सब जानते है कि दहेज प्रथा फिजूलखर्च है और दहेज में कार देना कोई सामान्य बात न होने के बावजूद, दहेज देने का सामाजिक दबाब इतना अधिक है कि कुछ लोग अपनी जमीनें तक बैच देते है और कुछ लोग बैंक से कर्जा लेते हैं।

समस्या यह है कि दहेज लेन-देन का ये कार्यक्रम विवाह तक ही सीमित न रह विभिन्न त्यौहारों, बच्चे की जन्म इत्यादि के रूप में जीवन पर्यंत चलता रहता है, इसीलिए ज्यादातर लोग, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल  हैं का मानना है कि ‘‘लड़की की शादी मतलब बरबादी, क्योंकि ससुराल वालों के मुंह तो हमेशा  ही खुले रहते हैं। वैसे भी हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे में लड़की के परिवार का दर्जा ससुराल वालोें की निगाह में हमेशा  कम ही होता है, बेटी के माता-पिता हरदम  इस खतरे से आशंकित रहते हैं, कि कहीं उन्हें लड़की के ससुराल पक्ष से अपर्याप्त दहेज या लड़की का व्यहार आदि के कारण अपमानित न होना पड़े, बेटी की सुरक्षा को लेकर भी बेटी के माता-पिता चितित रहते हैं, माता-पिता नही चाहते कि उनकी बेटी ससुराल में अपने पति या संबंधियों के द्वारा हिंसा का शिकार हो, चाहे वह हिंसा शारीरिक हो या मौखिक, एक महिला का कहना था, ‘मैं अपनी बेटी को रोज-रोज मरते हुए नहीं देख सकती, इससे अच्छा है कि मैं उसे पैदा ही न होने दूं, उसकी एक मौत तो मैं सह लूंगी पर उसकी रोज-रोज की मौत और जिल्लत तो मैं बरदाश्त ही नही कर सकती’’

एक लड़की का जोखिम ससुराल में तब और अधिक बढ़ जाता है जब वह एक पुरूष वारिस उत्पन्न करने में असमर्थ होती है, एक बेटे के होने मात्र से ही वह पति के परिवार में अपनी स्थिति सुरक्षित रख सकती है, एक महिला के नजरिए से लिंग जांच करवा बेटा उत्पन्न करने के, सबसे व्यवहारिक तरीके हैं- अल्ट्रसाउंड और अन्य प्रौद्योगिकियां लेकिन इसके भयंकर परिणाम लिंग अनुपात की गिरावट के रूप में समाज के सामने आते है। समूह में विचार-विमर्ष के दौरान यह भी उभरकर सामने आया कि लड़की के माता-पिता लगातार उसकी सेक्सुअल्टी में हो रहे परिवर्तनों को लेकर सतर्क रहते हैं, जिस क्षण लड़की यौवनावस्था में पहुंचती हैं, तो उसका शरीर  उसके लिए शर्म व अपमान का स्रोत न बन जाए इसको लेकर वह अरिरिक्त रूप से सावधान रहते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए लड़कियों पर लगातार पहरा लगाया जाता है और उनके व्यवहार पर सदैव निगरानी रखी जाती हैं, किशोर से युवा होती लड़की जब विभिन्न प्रकार के मानसिक और शरीरिक परिवर्तनों से गुजर रही होती है तो पितृसत्तात्मक व्यवस्था की बेड़ियां और कड़ी हो जाती हैं, गांव तथा घर में उसकी गतिविधियों को सीमित कर दिया जाता हैं, किशोर लड़की के माता-पिता उसकी यौनिकता (सेक्सअल्टी) को लेकर सदैव चिंतित रहते हैं, उस पर अनगिनत सामाजिक और शारीरिक प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं, यहां तक अगर स्कूल गांव की सीमा के भीतर नहीं है तो लड़की को स्कूल जाने की भी अनूमति नहीं दी जाती, ऐसी स्थिति न आए इसके लिए गांव वालों ने संयुक्त परिवार वालों को ज्यादा बेहतर बताया, उन्होंने कहा कि एकल परिवार की अपेक्षा संयुक्त परिवार में लड़कियों पर निगरानी रखना ज्यादा आसान होता है, परिवारों के सीमित होते जाने से बच्चों की गतिविधियों पर निगरानी रखना कठिन हो गया है, एक लड़की जिसने अपने माता-पिता की इच्छा के विरू़द्ध एक लड़के से साथ विवाह किया था, उसके इस कदम का सारा दोष उसके एकल परिवार को दिया और कहा गया कि ‘‘क्योंकि लड़की के माता-पिता संयुक्त परिवार मेें नहीं रहते इसलिए वह अपनी लड़की पर निगरानी नहीं रख पाए’’ परिणामस्वरूप उसी गांव की छह लड़कियों का स्कूल जाना सिर्फ आशंका के आधार पर बंद कर दिया गया कि कहीं वह भी कुछ ऐसा ही कदम न उठा लें, जिससे समाज में माता-पिता की इज्जत को दाग लग जाए, दरअसल माता-पिता भयभीत हैं कि कहीं उनकी बेटी भी अपने व्यवहार से उनका सिर न झुका दे इसलिए लड़की का घर बैठना ही परिवार की इज्जत के लिए ज्यादा सुरक्षित है, लेकिन इस सच्चाई से वाकिफ होने के बावजूद कि आर्थिक-सामाजिक रूप से वे स्वतंत्र नहीं है, वे जानती हैं कि वह इतनी सशक्त नही है कि इस कठोर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती दे सकें, फिर भी वह जीने की आकांक्षा रखती हैं, खुले आकाश में उड़ने की, वे कहती हैं-

‘‘ मैं खुली जिंदगी जीना चाहती हूँ ’’
‘‘ मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हँू’’
‘‘ मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ ’’

वह जानती हैं कि उनकी इच्छाएं पूरी नहीं होगी, माँ व दादी का वर्तमान ही उनका भविष्य होगा, दरअसल लड़कियाँ समझती हैं कि इस कठोर पितृसत्तात्मक संरचना से वे भिड़ नहीं सकती है, ऐसी हालत में उनके लिए मौजूद विकल्प वहीं हैं जो सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे ने उन पर थोप दिए हैं, समाज में उनकी भूमिका नातेदारी के संबंधों-जिनमें पुरूषों का वर्चस्व है-में ही बांध दी गई हैं, इसको निभाते हुए ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन मिल पाता है, वे इस सुरक्षा के लिए सक्रिय होकर समझौते करती हैं, ऐसी स्थिति में लड़कियों  के विरूद्ध होने वाली तमाम हिंसाओं को, चाहे वह तकनीक के द्वारा भ्रूण-हत्या हो, लिंग के आधार पर गर्भपात, आनर-किलिंग हों, को एक सामाजिक वैधता मिल जाती है, मात्र कानून बनाने से यह हालत नहीं सुधरेगी जब तक पारिवारिक संरचना में स्त्रियों को बेहतर समानता के अवसर देकर सामाजिक परिवर्तन नहीं किया जाता।

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 मनोज विसारिया दख़ल विचार मंच के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और इन दिनों बी एड कर रहे हैं |

27 फ़रवरी 2013

मै नास्तिक क्यों नहीं ( मेरा अंतरद्वंद्व)

(युवा दख़ल ब्लॉग पर हम एक नया कालम शुरू कर रहे हैं - नई सोच. इसके तहत हम देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे युवाओं की सोच को सबके सामने लाना चाहते हैं. आप सब मित्रों को इस कालम का खुला न्यौता...लिखिए और हमें ashish.deorari@yahoo.in पर भेज दीजिये.)
- मनीष चन्द्र मिश्र 

धर्म और बाजार के गठबंधन की सरकार


किसी समाजिक आर्थिक मुद्दों पर समान्यतः बात 1991 के भूमंडलीकरण से शुरू होती है मानों सारी समस्यायों की जड़ 1991 ही हो, पर मैने दुनियां 1992 से देखनी शुरू की यानी 22 फरवरी 1992 मेरे जन्म की तारीख और शायद दुनिया  को समझने का प्रयास 1997 से ही जारी है. बाजार और धर्म के गठबंधन की बात करें तो यह सबसे बड़ा खतरा है जो  हमें भटका भटका कर सारे तरीकों से लूटता है. आज बाजार हमें गरीब कर रहा और हमारी गरीबी में भी धर्म अपना बाजार तलाशती है. समस्याओं से ग्रस्त हो तो फलां बाबा का भलां यंत्र खरीदो.  वैसे बाजार के सभी पैतरों को देखें तो आज विज्ञापनों को जंगल में हमें और कुछ नहीं सूझता . चारों तरफ विज्ञापन और बाजार. आपके अंदर -अंदर तक सिर्फ बाजार ही बाजार है. आपके मस्तिष्क की सत्ता बाजार के हाथ में है. फिर जो कुछ लोग विपक्ष में खड़े बाजार से लड़ रहें हैं उनके पास सही हथियार नहीं. 

अविनाशी धर्म !


भूमंडलीकरण से पहले भी बाजार बाजार ही था. कहानी किस्सों और उपमाओं से लगा कि समाज में उस वक्त कुछ नौतिकता जरूर रही होगी.  यहां तक कि 'बाजार में खड़े हो जाओ', बेचना या बिकना भी बुरा ही माना जाता था.  बाजार भी शातिर तो हमेशा से रहा है मगर धर्म से इसके गठबंधन के बाद इसकी प्रकृति और विध्वंसक हो गया है. धर्म ने तो मानव इतिहास के प्रारंभ से ही लोगों को अपने नशे में रखा और अब जब सबकुछ पुराना मिटता या सिमटता जा रहा है तो इस धर्म ने बाजार को अपना साथी बना फिर अपनी चमक बढ़ा ली है. अब नशा उतरे तो कैसे ? अब तो धर्म के अनेको प्रॉडक्ट बाजार में मौजूद हैं. उदाहरण के तौर पर लाल पीली किताब, अलग अलग तरह के चमत्कारी बाबा आदि आदि. और क्या इतना बड़ा साम्राज्य इतनी जल्दी खत्म हो सकता है. क्या हो जाता है जब किसी स्वामी के आश्रम में किसी की हत्या हो जाती है. क्या हो जाता है जब हजारों लोगों को तथाकथित गुरू किसी के साथ रंगरलिया मनाते हुए सीडी में दिखाए जाते हैं. क्या तब लोगों की आस्था टुटती है ? नहीं भीड़ तो बढ़ती ही जा रही है.  तो मान लिया जाय कि धर्म अविनाशी है ? क्योंकि बाजार है तो धर्म है. और बाजार तो है ही. 

धर्म, तब और अब


अगर ईमानदारी से बात की जाय तो धर्म की लाख कुरीतियों के बाद भी बहुत समय तक इस धर्म में बताए रास्ते ने लोगों को बांधे रखा. नैतिकता की राह पर लोग धर्म को ध्यान में रखकर चलते रहे. पर अब ऐसा कुछ रह नहीं गया. धर्म का आड़ में सबसे अधिक  आडंबर होता है. नैतिकता किस चिड़िया का नाम है कुछ याद नहीं रहा किसी को.  लेकिन यह कहकर धर्म का पक्ष रखना कि धर्म हमें नैतिक रहना सिखाता है तो अब कोई नहीं मानने वाला. पर धर्म ने कितना पीछे कर दिया हमें. किसी भी धर्म की बात कीजिए. महिलाओं के लिए बड़ी बड़ी बाते करने वाला धर्म ने महिलाओं के साथ कितना अन्याय किया है . तो कुल मिलाके धर्म सच में अफीम है. पर सवाल यह है कि भारत के अंदर धर्म के साथ फैले इस अंधविश्वास के कैसे मिटाया जाए. कुछ लोग धर्म की बुराई कर चाहते है कि लोगों का इन सब से पीछा छुट जाएगा लेकिन अगर इस तरीके को अपने भारतीय पर रख के सोचा जाए ते यह कत्तई संभव नहीं है. भारत की जनता को धर्म और विशेषकर अंधविश्वास को दूर करने के लिए सिर्फ विज्ञान का प्रचार और प्रसार ही काम आ सकता है.  अब ये बात मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं. लोग आपपे भरोसा नहीं करेंगे अगर आप उनकी तरह नहीं सोचते तो. आपके प्रसाद खाना होगा चाहे लाख आपका तार्किक मन कहे कि वैज्ञानिक तरीके से प्रसाद खाने का कोई औचित्य नहीं. और हमें किस अंधविश्वास के खत्म करना है ये भी सोचना होगा. क्या हम लोगों की भावना आहत करना चाहते हैं या लोगों का विनाश और अंधकार से निकाल विकासोन्नमुख और प्रकाश की ओर ले जाए. और शायद इसलिए मैं लाख अंधविश्वास को देखने समझने के बाद भी मैं नास्तिक नहीं बन पाया. मुझे पता है कोई चमत्कार नहीं होता कभी फिर भी मुझे अपने परंपरा से लगाव है. कबीर के किसी दोहे में लिखा था कि सभी नए बुरे नहीं और सभी पुराने अच्छे नहीं. हमें अपने विवेक से अच्छे बुरे की परख करनी होगी. मुझे डर है कि कोई इतना भी वौज्ञानिक सोच का न हो जाए कि उसे मां बाप के सम्मान में कोई फायदा नजर न आए.

अब तय करना है कि हमें किस कुरीति से लड़ना है. अंधविस्वास के वह नियम  जिसमे औरतों को बुरके और घुंघट में रहने को मजबूर किया जाता है, हमारी लड़ाई उस कायदे से है जहां स्त्रियों को हीन समझा जाता है. धर्म के उस पाखंड से लड़ना है जो महिलाओं के सम्मान का ढ़ोंग कर देवी का स्थान देकर चतुराई से उसके अधिकारों के छीनता है. हमें उस पितृसत्तात्मक समाज से लड़ना है या पुरूष जाती को खत्म करने की मुहिम चलानी है.  एक आम आदमी के अंदर के द्वंद को समझना होगा.  क्या इस बाजारू धर्म को  गरियाने से इसकी शक्ति कम होती है ? नहीं. इस से निपटने के लिए हमें धैर्य रखना होगा. लोगों के विश्वास के जीतकर भी तो इसके खतरों को बता सकते हैं हम. निर्मल बाबा की लाख बुराई कर ली फिर भी बाबा कमाते रहे. इस लड़ाई में बाजार धर्म के हाथ मजबूत कर रहा है. अब समय है इसपर सोचने का. कुछ भी इतनी जल्दी नहीं होगा. वर्षों लग गए सती प्रथा को खत्म करने में. मेरे इस पूरे लेख का अंत OMG की तरह न हो जाए इसकी आशंका है मुझे. इसलिए अंत में यह लिख कर अपने को जागरूक धार्मिक इंसान बताने की कोशिश रहेगी. नास्तिक शब्द मुझे कुछ पसंद नहीं.  मै यह मानता हूं कि कोई चमत्कार नहीं होता पर मुझे और मेरे जैसे आम आदमी के लिए धर्म आज भी महत्व रखता है. हम  बहुमुल्य छुट्टी  के दिन को भी मंदिर में बिता आते हैं. कारण स्पष्ट है. मुझे  धर्म के उस बाजारू खतरे का अभास है इसलिए मै किसी बाबा का चेला नहीं हूं न ही कोई यंत्र  खरीदा है. मै लोगों को विज्ञान की बातें बताता हूं क्योकि भारत के नागरिक होने के नाते यह मेरा कर्तव्य भी है.