03 मार्च 2013

भक्ति : अर्थ और क्षेत्र ...


नई सोच श्रृंखला के तहत आज प्रखर मिश्र विहान                                                                                 


भक्ति अर्थ और क्षेत्र --
राष्ट्रभक्त , गुरुभक्त और भी कितना कुछ , हजारों सालों की राजशाही और सामंतवादी व्यवस्था से निकलने के बाद हम आज स्वयं को प्रजातांत्रिक मूल्यों वाला स्वतंत्र प्राणी तो मानते हैं लेकिन इन लोक लुभावन और भक्तिपूर्ण शब्दों के स्वरुप में छिपे निरे सामंतवादी अमानवीय प्रयोजनों को नकार देते हैं l यहाँ पर भक्ति शब्द के अर्थ सामाजिक सन्दर्भ में व्याख्या करना जरुरी हो जाता है l सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से गलतियाँ करना व उन गलतियों से सीखना , मानव प्रगति का एक मात्र आलंबन है क्युकी भक्ति में आलोचना निषेध है अत: एक बात तो साफ़ है कि भक्ति कभी प्रगतिशील नहीं हो सकती ,अब बात यह हो सकती है कि यदि हम भक्ति के प्रति समाज द्वारा स्थापित सारे पूर्वाग्रह अलग कर दे तो ''भक्ति है क्या'' ? चलिए इस बात को समझने प्रयास करते हैं ,आप ने आज तक किसी परिजित नायक के भक्तों की तस्वीरें टंगी देखीं हैं कहीं , क्या उनकी वीरता और समर्पण का कोई भी कीर्तन सुना है ? उत्तर होगा नहीं क्युकी भक्ति गुलामी के लिए स्थापित हुआ सभ्रांत और सुन्दर शब्द मात्र है l आगे दिए विवरण से यह बात और भी साफ़ हो जाएगी l

सत्य , संप्रभु और भक्ति में सम्बन्ध--
सत्य कोई युनिवर्सल शब्द नहीं है , विजेयता स्वयं के चुने हुए अलाम्बो और सुविधाओं को सत्य स्थापित कर देता है और फिर इस सत्य की छद्म चेतना का प्रसार अपने राज्य या विचारधारा को स्थिरता प्रदान करने के लिए करता है जो लोग इस सत्य के इस शाशकीय स्वरुप को स्व इक्षा से स्वीकार कर लेते हैं वह भक्त हो जाते हैं और जिनको यह सत्य जबरन स्वीकार कराया जाता है वह गुलाम सत्य के इस सम्प्रेषण से अब शक्तिमान संप्रभु बन जाता है l दोनों परस्थियों से अलग इस सत्य से इंकार करने वाले बागी हो जाते हैं और संप्रभु के शत्रु भी l कुल मिला कर कहा जाए तो किसी भी प्रकार के मानवीय बिम्बों से परे प्रेम या आलोचना से परे भक्ति संप्रभु की ''विशुद्ध गुलामी'' ही है जिसको हम पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी आने वाली नस्लों को हस्तांतरित करते जाते हैं l यह मानव की प्रगति शीलता और स्व अस्तित्व पर शाशकीय शक्तियों (धर्म ,समाज ,सरकार ) द्वारा आघात है l
स्वतंत्रा और भक्ति--
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह स्व अस्तित्व के अनुरूप बौद्धिकता सामाजिक परिवेश या विचारधारा का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन मानवीय स्वतंत्रा का पूर्ण अर्थ सिर्फ स्व अनुरूपता के चुनाव में नहीं है यह काम तो जानवर भी करते हैं l स्वतंत्रा का अर्थ , दूसरों के चुने हुए विषम को सम्मान के साथ तर्क की कसौटी पर तौलना व दो विषमों में मध्य तार्किक संवाद स्थापित करना है , यह प्रक्रिया हमारे जैसे भक्तिमय वातावरण वाले देश में अधिक संभव नहीं क्युकी हम अपनी भक्ति द्वारा धर्म से लेकर राजनीति तक ऐसे बिम्ब स्थापित कर लेते हैं जहाँ आलोचना या प्रश्न करने से किसी ना किसी सामाजिक समूह की आस्था आहात हो जाती है और भक्ति के कारण बिना आलोचना या तार्किक अध्ययन के संस्थाएं रूढ़िवादी और जड़ होती चली जाती हैं l
सारतत्व --
रिल्के ने कहा था ''तुम अपनी जिन्दगी के प्रारंभकर्ता बन सकते होलकीर से हटने से एक नया सुख मिलता है'' क्या इस नवीनता की लालसा को चरित्रपतन कहा जा सकता है ? यह कुछ कुछ संप्रभु द्वारा प्रेषित अंतर्द्वंद जैसा है कि अगर तुम मेरी भक्ति पर प्रश्न करोगे तो मैं तुम्हारे चरित्र पर प्रश्न करूँगा चुकि निर्धारित बिम्बों (जिनकी भक्ति समाज करता चला आ रहा है) का चुनाव एक बच्चा नहीं करता इसलिए उसका मानवीय कर्तव्य है कि वह संस्थाओं जांचे और तौले समाज में रह संवाद स्थापित करे ,तर्क के अन्वेषण का आनंद ले और यह हमारा लक्ष होना चाहिए कि हम समाज में ऐसा वातावरण पैदा करें कि किसी भी व्यक्ति को बौद्धिकता की अंतहीन संभावनाओं पर बस इस कारण रोक ना लगा दी जाए कि वर्षों से चली आ रही किसी मान्यता की भक्ति पर कोई विशेष समूह प्रश्न नहीं सह सकता l यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी आने वाली नस्लों को बनी बनायीं मान्यताओं की गुलामी या भक्ति देंगे अथवा एक ऐसा प्रगतिशील वातावरण जिसमें वह स्वतन्त्रतापूर्व आलोचना व तर्क का अन्वेषण कर सके l
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प्रखर मिश्र विहान स्वतन्त्र फिल्मनिर्माता हैं |वामपंथी झुकाव रखते हैं |फेसबुक पर सक्रिय  हैं |

13 टिप्‍पणियां:

Ashok Kumar Pandey ने कहा…

प्रिय आशीष
तुम्हारे सम्पादन में युवा लेखकों की यह सीरीज महत्वपूर्ण बन रही है. इसे ज़ारी रखो. शुभकामनाएं

दिनेश पारीक ने कहा…

बहुत खूब सुन्दर

मेरी नई रचना
आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

ये कैसी मोहब्बत है

madho das ने कहा…

कुछ हद तक सहमत हूं भाई

mohit pathak ने कहा…

अगर विज्ञान और जेनेटिक्स में जरा भी विश्वास होता तो यह लेख न लिखा होता । आपको शुरु से समझने की जरुरत है । आप यथार्थ के धरातल से कोसों दूर हैं । माफ कीजिएगा मैं सहमत नहीं हूँ ।

prakhar vihaan ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
prakhar vihaan ने कहा…

अगर आप के पास तर्क नहीं हैं तो कुछ भी बोलेंगे क्या ? जेनीटिक्स की बात बिच में कहाँ आ गयी भाई ? और एक बार अपनी वाल का निरिक्षण करें पता चल जाएगा कि कौन वैज्ञानिक और तार्किक आधार पर बात करता है और कौन धर्म और कल्पना के बनाये हुए छद्म आवरण में रहता है.और एक बात सार्वजनिक मंच पर खुद की बुद्धिमत्ता साबित करने के लिए कुछ भी बोल देना ठीक नहीं है लोग इतने बेवकूफ नहीं हैं जितना आप समझते हैं

Basant ने कहा…

सिर्फ एक प्रश्न ... रावण को नायक क्यों माना जाता है, उसके मंदिर क्यों हैं और उसकी पूजा क्यों की जाती है ? मै भक्ति समर्थक नहीं हूँ और आलेख की बातों से सहमत हूँ फिर भी यह और ऐसे प्रश्न बनते तो है ही.

Ashok Kumar Pandey ने कहा…

मोहित पाठक जी

मुझे तो लगता है कि आपको ज़रुरत है फिर से बहुत कुछ पढने की.

prakhar vihaan ने कहा…

मोहित यह मैथड अब पुराना हो चुका है कि जब तर्क ना हो तो कुछ ऐसा कह दो जो कोई समझ ना सके. मैं भी विज्ञान प्रष्ठभूमि का छात्र रहा हूँ. जेनिटिक्स से ऊपर लिखे गए आर्टिकल का कोई सम्बन्ध स्थापित तो करो उसकी विवेचना करो फिर सब को तय करने दो कि कौन तर्क कर रहा है कौन कुतर्क ,और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो फासीवादी ना बनो टप्पा मत लगाओ यथार्थ से दूर होने का.

prakhar vihaan ने कहा…

मोहित यह मैथड अब पुराना हो चुका है कि जब तर्क ना हो तो कुछ ऐसा कह दो जो कोई समझ ना सके. मैं भी विज्ञान प्रष्ठभूमि का छात्र रहा हूँ. जेनिटिक्स से ऊपर लिखे गए आर्टिकल का कोई सम्बन्ध स्थापित तो करो उसकी विवेचना करो फिर सब को तय करने दो कि कौन तर्क कर रहा है कौन कुतर्क ,और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो फासीवादी ना बनो टप्पा मत लगाओ यथार्थ से दूर होने का.

prakhar vihaan ने कहा…

मोहित यह मैथड अब पुराना हो चुका है कि जब तर्क ना हो तो कुछ ऐसा कह दो जो कोई समझ ना सके. मैं भी विज्ञान प्रष्ठभूमि का छात्र रहा हूँ. जेनिटिक्स से ऊपर लिखे गए आर्टिकल का कोई सम्बन्ध स्थापित तो करो उसकी विवेचना करो फिर सब को तय करने दो कि कौन तर्क कर रहा है कौन कुतर्क ,और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो फासीवादी ना बनो टप्पा मत लगाओ यथार्थ से दूर होने का.

prakhar vihaan ने कहा…

मोहित यह मैथड अब पुराना हो चुका है कि जब तर्क ना हो तो कुछ ऐसा कह दो जो कोई समझ ना सके. मैं भी विज्ञान प्रष्ठभूमि का छात्र रहा हूँ. जेनिटिक्स से ऊपर लिखे गए आर्टिकल का कोई सम्बन्ध स्थापित तो करो उसकी विवेचना करो फिर सब को तय करने दो कि कौन तर्क कर रहा है कौन कुतर्क ,और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो फासीवादी ना बनो ठप्पा मत लगाओ यथार्थ से दूर होने का.

prakhar vihaan ने कहा…

सर रावण की पूजा उन क्षेत्रों में की गई जहाँ राम कि संप्रभुता स्वीकार नहीं हुई . यह बात अवश्य ही सत्य है कि संवाद और सांस्क्रतिक ट्रांजेक्शन के कारण अब उन क्षेत्रों में राम और रावण दोनों को पूजने वाले मिल जाएँगे लेकिन अगर आप दिए गए तथ्यों को ऐतिहासिक मूल्यांकन करें तो पाएँगे कि राम सम्प्रभुत्व क्षेत्रों में रावण को पूजना और रावण सम्प्रभुत्व क्षेत्रों में राम को पूजना ,सत्ता के विरुद्ध हो बागी हो जाना ही था.