02 जून 2010

मर्सियों के बीच एक छोटी सी टीप

(आज सुबह से जहां गया बंगाल के स्थानीय निकायों के चुनावों का तिया-पांचा हो रहा है। इनमें हुई वाममोर्चे की शिकस्त को यूं पेश किया जा रहा है जैसे कि बस्तील ढह गया।ठीक भी है…इतनी लंबी पारी के बाद पहली बार  इस क़दर बीट हुए हैं कि आऊट होने का ख़तरा साफ़ दिख रहा है। वैसे कम लोगों को याद होगा कि जिस चुनाव के बाद मोदी अपराजेय से होकर उभरे उसके ठीक पहले हुए स्थानीय निकाय में उन्हें पटखनी मिली थी लेकिन जो लोग इसका मर्सिया पढ़ रहे हैं या फिर इसके उल्लास में पागल हुए जा रहे हैं उनसे कुछ सवाल तो किये ही जा सकते हैं। इसी क्रम में आदरणीय दिनेश जी के ब्लाग अनवरत की एक पोस्ट पर की गयी टिप्पणी यहां लगा रहा हूं।)

यह सच है कि बंगाल में सी पी एम की हार हुई है…यह एक तरह से संसदीय वाम की भी हार है। सीपीएम को मैं भी संशोधनवादी मैं भी मानता हूं।


आगे की सोचिये कामरेड
 एक सवाल है कि जो गैरवामपंथी लोग यहां आकर मर्सिया पढ़ रहे हैं … ऐसे कि जैसे चुनावी राजनीति में कभी किसी पार्टी की हार हुई ही नहीं उनके सीने तब क्यूं नहीं फटे जब इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे तुर्रम खां हार गये, जब मीडिया द्बारा बनाये गये महान नेता अटल बिहारी बाजपेयी धूल चाटने पर मज़बूर हुए,उत्तर प्रदेश में कल्याण और भाजपा अर्श से फर्श पर आ गयीं… चुनावी राजनीति में हार क्या इतना बड़ा मुद्दा है? आज सी पी एम से जो सवाल पूछे जा रहे हैं वे उनसे क्यों नहीं पूछे गये। 

साफ है कि यह बस अंधवामविरोधियों के विराट दुष्प्रचार का हिस्सा है जिसमें कई बार घोषित वामपंथी भी फंस जाते हैं। जहां और जगहों पर पांच सालों में एंटी इन्कमबेन्सी का राग अलापा जा सकता है तो वही लाजिक तीसेक सालों के वाम शासन पर क्यों नहीं? अटल बिहारी की हार पर जनता को कोसने वाले लोग यहां लोकतंत्र के कसीदे काढ़ रहे हैं…

क्या यह एक बेहतर विकल्प है
क्या यह मान लिया गया है कि वाम बंगाल में फिर शासन में नहीं लौटेगा? क्या उसके विकल्प में उभरी अवसरवादी-अराजक ममता बनर्जी से वाकई बड़ी उम्मीदें पाली जा सकतीं हैं? क्या अपने भ्रष्टतम रूप में भी वाम मोर्चा सरकारें भाजपा,बसपा,कांग्रेस या समाजवादी दलों से बेहतर नहीं रही हैं? क्या आंकड़ो की कसौटी पर कंगाल बनाने वाला तर्क सही उतरता है?

यह एक चुनावी हार है। यह सीपीएम और उसके साथियों को अपनी रणनीति,कार्यनीति और साथ ही संसद्परस्त राजनीति पर पुनर्विचार का अवसर उपलब्ध कराती है। अगर वे ऐसा कर सके तो चुनावी हार के जीत में बदलते देर नहींं लगेगी।


बंगाल का पतन बस्तील का पतन नहीं है…

सी पी एम के क्रांतिकारी चरित्र पर पूर्ण अविश्वास के बावज़ूद मैं उसे एक सामाजिक जनवादी पार्टी मानता हूं और संसदीय लोकतंत्र में साप्रदायिकता विरोधी तथा पूंजीवाद विरोधी पक्ष के रूप उसकी उपस्थिति को भी ज़रूरी मानता हूं। 

9 टिप्‍पणियां:

अनुनाद सिंह ने कहा…

हट तो जायेंगे लेकिन 'बंगाल' 'कंगाल' हो गया उसकी भरपाई कैसे होगी।

बिना सिर पूँछ के 'सिद्धान्तॉ' और प्रोपेगैण्डा की हार तो होनी ही थी।

Suresh Chiplunkar ने कहा…

चलिये कुछ तो माना आपने…
पहले वाम और कांग्रेस ने भाजपा को साफ़ कर दिया, अब वाम की बारी है उसे कांग्रेस साफ़ करेगी…

बस फ़िर महारानी और युवराज का एकछत्र साम्राज्य होगा…। हो सकता है कि यह दिवास्वप्न ही हो, लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है…

जब हिन्दुत्ववादी शक्तियों को खत्म करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई, तो फ़िर लाल शक्तियाँ भी क्योंकर बाकी रहें? अच्छा है…

मीडिया की मदद से कांग्रेस का अघोषित एकछत्र साम्राज्य तो स्थापित हो ही चुका है, अब वह और मजबूत होगा…।

"लाल और भगवा" की लड़ाई में, मलाई हमेशा कांग्रेस ही खायेगी…। आपको भी ऐतराज नहीं है, तो अब हमें भी नहीं है… चलने दो।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अनुनाद जी…यह कंगाल वाला तर्क दुष्प्रचार है। आप मध्यप्रदेश से ही तुलना करके देख लें। या फिर जब मोर्चा सत्ता में आया तबसे अब तक की आर्थिक स्थितियों का विश्लेषण प्रस्तुत कीजिये। ऐसे थोथे गाल बजाने से काम नहीं चलेगा।

चिपलूनकर जी,इतने भोले न बनिये। कांग्रेस और भाजपा के बीच जो वैचारिक साम्य नई आर्थिक नीतियों से लेकर माओवाद तक पर है वह कोई छुपा नहीं है। जिसे नष्ट करना होगा जनता ही करेगी।

Suresh Chiplunkar ने कहा…

आदरणीय पाण्डेय जी,

"…कांग्रेस और भाजपा के बीच जो वैचारिक साम्य नई आर्थिक नीतियों से लेकर माओवाद तक पर है वह कोई छुपा नहीं है…" सही कहा आपने, लेकिन फ़िर भी तो वामपंथियों को सदा ही कांग्रेस से प्रेम रहा है, सदा ही कांग्रेस को गोद में बैठाकर "साम्प्रदायिकता" का भजन गाते रहे…

आज उसी कांग्रेस ने जमकर धो डाला, फ़िर भी आप इस बात को नहीं मान रहे कि "लाल" और "भगवे" की लड़ाई के बीच कांग्रेस माल कमा रही है, देश को बरबाद कर रही है। देश में तीन धाराएं हैं, कांग्रेस-भाजपा-वामपंथी… अब यह तो जनता पर निर्भर है कि वह कांग्रेस को कितना ढोने की क्षमता रखती है।

आपका लक्ष्य तो आप जानें, लेकिन हमारा लक्ष्य तो कांग्रेस की पूर्ण बरबादी है…।

हिन्दुत्ववादी शक्तियों(?) द्वारा जूते खाने पर आपको तो जश्न मनाने के और भी कई मौके मिलेंगे… हमें तो पहला ही मौका मिला है… थोड़ा मना लेने दीजिये भाई…।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

हमारा लक्ष्य शांति,समाजवाद और समृद्धि है। हिन्दुत्ववादी सहित समस्त दक्षिणपंथी शक्तियों को जनता के सामने नंगा कर हाशिये पर पहुंचाना।

आपका पतित हास्यबोध बस वितृष्णा पैदा करता है…

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

फ़िलवक़्त जो है सो है...
इतिहास किसी को भी क्षमा नहीं करता...

ना वक़्त की सही जरूरतों से मुंह मोड़ने वालों को...
ना पतित हास्यबोध से वितृष्णा पैदा करने वालों को...

जनता अपनी राह ख़ुद ढूंढ़ निकालेगी ही बिलआख़िर...

Suresh Chiplunkar ने कहा…

1) "पतित हास्यबोध"(?)

जब हिन्दुत्ववादी हारते हैं तब लाल झण्डे वाले भी ऐसा ही पतित हास्यबोध अपनाते हैं… :)

2) "…हिन्दुत्ववादी सहित समस्त दक्षिणपंथी शक्तियों को जनता के सामने नंगा कर हाशिये पर पहुंचाना…"(?)

यानी वामपंथियों ने, कांग्रेस को हाशिये पर पहुँचाने में भारी मदद की है????? कृत्यों से लगता तो नहीं है…

3) अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी, कश्मीर से भगाये गये हिन्दुओं सहित सैकड़ों ऐसे मुद्दे हैं जिन पर वामपंथियों ने कभी ठीक से ज़ुबान नहीं खोली।

"शांति-समाजवाद-समृद्धि" वाले सिद्धान्त बस हवाई बातें हैं… वरना क्या 30 सालों में यह सब बंगाल में नहीं आ गया होता?

Suresh Chiplunkar ने कहा…

हा हा हा, मेरी टिप्पणी मोडरेट कर दी,

आलोचना सुनने की आदत नहीं रही कभी… ऐसा ही होता है 30 साल तक शासन करने के बाद… :) :)

अफ़ज़ल गुरु और कश्मीरी पण्डितों के बारे में कुछ सु-वचन दीजिये महाराज… हम जैसे मूढ़ मतियों को

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

हां रोक के रखा था ताकि आपके पतित हास्यबोध को अपनी संतुष्टि का एक मौका और मिल सके