02 जून 2010

फैज़ अहमद फैज़ की एक नज़्म

जन्मशताब्दी है इस साल फैज़ की

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
दम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

9 टिप्‍पणियां:

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut sundar najm he

badhai is ke liye aap ko

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

इस नज़्म को यहाँ देख कर प्रसन्नता हुई।

Rangnath Singh ने कहा…

फैज को पढ़ कर हमेशा यही लगा कि यह शख्स वही कहता है जो दिल सुनना चाहता है।

काफी टाइम ने कहा…

इस नज़्म की आखरी लाइनें क्यों अधूरी छोड़ दीं? ये निम्न हैं
"बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है, हाज़िर भी
जो मंज़र भी है, नाज़िर भी
उठ्ठेगा अनलहक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़े-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो "


क्या इसमें अल्लाह का नाम होना पसन्द नहीं आया?

निर्मल आनन्द के अभय तिवारी इस नज़्म के बारे में निम्न कहते हैं

यह नज़्म इस्लामी क़यामत की धारणा में गहरे तक धंसी हुई है? यह पूरी नज़्म क़यामत के रोज़ होने वाले इंसाफ़ को समर्पित है जिसे ख़ुदा ने अपनी विशालकाय पट्टी (लौहे अज़ल) पर पहले से ही लिख रखा है। इस नज़र से नज़्म में एक तरह का नियतिवाद है। मगर तख़्त ओ ताज उछालने की बात भर से इंक़लाबी बेहद भावुक हो कर अपनी रुमानियत में और उतराने लगते हैं।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

मैने जिस स्रोत से इसे दिया है उसमें बस यहीं तक नज़्म है…कविता कोष में भी फैज़ की इस नज़्म का बस इतना ही हिस्सा है।

फैज़ नास्तिक थे या आस्तिक इससे मुझे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। निराला ने भी सरस्वती वन्दना लिखी है, त्रिलोचन आस्तिक थे पर क्या इससे उनकी इंक़लाबी नज़्में कमज़ोर पड़ जाती है? क्या 'मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग', बने हैं अहले हवस,इरानी तुलबा के नाम और ऐसी ही न जाने कितनी नज़्में और गज़लें ही नहीं अपनी ज़िंदगी और सज्ज़ाद ज़हीर साहब के साथ सांस्कृतिक-साहित्यिक क्षेत्र में उनका योगदान उनकी पक्षधरता को साफ़ करता है।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

और उसी निर्मल आनन्द पर भाई आशुतोष का जवाब भी पढ़ा ही होगा आपने … न पढ़ा हो तो फिर से पढ़िये

तुम्हारी मासूमियत बाज़ दफे सचमुच जानलेवा होती है.
क्या ठीकरा फोड़ा है तुम ने फैज़ का अरुंधती के माथे.
अंग्रेज़ी के बड़े बड़े तुर्रम खान भी फैज़ को अरुंधती से कई मक़ाम ऊपर का लेखक तसलीम करते हैं. तुम्हारे लिखे से लगता है जैसे फैज़ को कोट करना अरूंधती के लिखे के किसी अंदरूनी कमजोरी का सबूत हो !जैसे रोमान कोई
कोई निहायत ही अहमकाना तसव्वुर हो !
सपने तो तुम भी देखते हो एक इन्साफपसंद इनसानदोस्त खूबसूरत दुनिया के.न केवल देखते हो बल्कि अपनी सारी मशक्कत और मगजमारी अपने तईं यही सोच कर करते हो की यह सब दो चार कदम आगे पीछे उस सपने की ओर ले जाएगा . वह सपना कभी सच में सच हो जाएगा , ये यकीन तो न तुम्हे होगा न किसी नाकाबिलेसुधार रोमानपसंद को .फिर भी सपने देखना तो जरूरी है .रोमान और क्या है ? महज़ रूमानियत? जब की तुम ठहरे रूमी के शैदाई!
ऊपर से क़यामत ये की तुम्हे फैज़ की शायरी में 'क़यामत ' किसी मियाँ अल्ला की बनायी क़यामत की नक़ल नज़र आरही है. मियाँ , ये वो क़यामत नहीं है , जो अल्ला मियाँ ने किसी लौहे अज़ल पे लिख रखी है .ये क़यामत वो है , जो उन के बूते आनी है , जिन्हें अनलहक का नारा उठाना है, ' जो मैं भी हूँ और तुम भी हो '.कभी इस नज़्म पर प्रणय को पढ़ना.लिंक है- http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2010/02/blog-post_14.html

sahespuriya ने कहा…

GOOD + NICE

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत बढ़िया!

डॉ .अनुराग ने कहा…

यहां बांटने के लिए शुक्रिया !