12 सितंबर 2009

विष्णु जी इस सच का सच क्या है?

ऐसा लगता है कि साहित्य के क्षेत्र में वैसी ही आपा धापी मची है जैसी कि भाजपा में। यहाँ भी वही निराशा और अदृश्य सत्ता की तलाश सी चल रही है। एक तरफ़ साहित्य आम आदमी की प्राथमिकताओं से ही बाहर नहीं हो रहा बल्कि अपने समय और समाज को प्रभावित करने की ताक़त भी लगातार खोता चला जा रहा है तो दूसरी तरफ़ रोज़ सिकुडते जा रहे इसके स्पेस पर कब्ज़ा जमाने की कोशिशें भी तेज़ होती जा रही हैं। इस आपाधापी में विचारधारा की केंचुल उतर रही है, कहीं पुराने की जगह नये को सेट करने का ''नवोन्मेष'' है, कहीं हर चीज़ का निषेध तो कहीं हर चीज़ का स्वीकार। पाठकों के घोर अभाव झेलते समाज में रोज़ निकल रही नई पत्रिकायें हैं ( जो अपने समकालीन चलन के विपरीत मोटे होने के लिये मरी जा रही हैं)। इसी क्रम में हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि-विचारक विष्णु खरे की हालिया टिप्पणी/आलोचना/आत्मस्वीकार है जो सबद में छपी है।
आज पुरस्कारों की जो स्थिति है, उससे हिन्दी के बचे-खुचे पाठक और खंचिया भर लेखकों का अपरिचय नहीं। सब समझते- बूझते हैं, रसरंजन के दौरान बतियाते भी हैं और चढ़ जाने पर गरियाते भी। भारतभूषण हो , साहित्य एकेडेमी, वागीश्वरी या फ़िर कोई और… विवाद हर जगह मौज़ूद हैं। हालत यह है कि अगर किसी को साल में दो-तीन पुरस्कार मिल जाये तो भाई लोग समझ जाते हैं कि बंदे की सेटिंग मस्त है। यही वज़ह है कि तमाम जुगाडु कवि पुरस्कृत होते रहे और मोहन डहेरिया, हरिओम राजोरिया, अंशु मालवीय जैसे कवि आलोचकों की नज़र से महरूम ही रहे।
लेकिन जिस तरह विष्णु जी ने भारतभूषण प्राप्त कविओं की परत दर परत खोली है वह पहली बार ही हुआ। हमने भी जब इसे पढा तो पहले यही लगा कि चलो किसी ने शुरुआत तो की! पर दुबारा-तिबारा में बात पलटने लगी।
कारण कई हैं- विष्णु जी ३० बरस इस पुरस्कार के निर्णायक मण्डल के सदस्य के हैसियत से जिन कविताओं के प्रशस्ति पत्रों पर हस्ताक्षर करते रहे आज वे अचानक इतनी बुरी क्यों हो गयीं? आखिर यह ग़ुस्सा और इमानदार वक्तव्य ऐसी किसी कूडा कविता के सम्मानित होने के बाद आने की जगह एक ऐसी कविता के चयनित होने के बाद क्यों आया जिसे वह ख़ुद इस पुरस्कार के काबिल मानते हैं? आख़िर वे कौन सी मज़बूरियां/प्रलोभन रहे कि वे तीस सालों तक ख़ामोश रहे? सच का देर और दुरस्त आना ग़लत नहीं पर देरी की वज़ह न बताने से शक़ की गुंजाईश तो होती है ना!
फिर इस सच में भी कई सच दफ़्न हैं। आख़िर कम से कम एक कवि की कविता को तो वह मंच से इस पुरस्कार के योग्य तब बता चुके हैं जब वह पुरस्कृत हुई भी नहीं थी। दूसरी उनके साथ एक पत्रिका में छपी पर उन्होंने छपने से पुरस्कार लेने तक उस पर कोई टिप्पणी नहीं की। अब इन पर अचानक जागे ज्ञानचक्षु ख़ुले तो कैसे? जैसे वह अब तक तमाम कविताओं पर सकारात्मक टिप्पणियां देते रहे हैं आखिर किस मज़बूरी के तहत वैसे ही ख़राब कविताओं पर वह तब सच नहीं कह पाये?
आज विष्णु जी जहां हैं वहां वह नुक्सान-फ़ायदे से ऊपर उठ चुके हैं। अब जब कोई ख़तरा नहीं बचा तो संत वेश धारण करना आसान है। यह सच मारक तब लगता जब उन ख़राब कविताओं के चयन पर वह उठ कर बाहर आ गये होते।
वैसे जिस आलोचक को उदय प्रकाश और अनामिका से बेहतर कवि विनोद भारद्वाज और हेमंत कुकरेती लगते हों उसके विशिष्ट काव्यबोध को समझ पाना आसान नहीं। शायद उन्हें वही कविता जमती है जिसे पढ़ पाना आसान नहीं। अब अंबुज जी पर कुछ कह पाना आसान नहीं था वरना उन्हें भी सिर्फ़ इस बात के लिये ख़ारिज़ किया जा सकता था कि उन्होंने लय को बचा कर क्यूं रखा?
अब इस आपाधापी में पाठक होता तो हम पूछते भाई तुम्हीं कहो कि सच क्या है?
नहीं है तो आलोचक जो कहे वही सच!!!

वैसे राजनीति में ज्ञानचक्षु तब खुलते हैं जब पार्टी बदलनी होती है… यहां क्या माज़रा है राम जाने!

9 टिप्‍पणियां:

हेमन्त कुमार ने कहा…

इस सच का सच अत्यन्त प्रासंगिक है ।आभार ।

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

आपकी लेखनी को मेरा नमन स्वीकार करें.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

किसी भी लेखन का मूल्यांकन पाठक करते हैं। पुरुस्कार किसी रचनाकार का समग्र मूल्यांकन नहीं होते।
और राजनीति से कुछ भी अछूता नहीं है।

Suman ने कहा…

nice

रंगनाथ सिंह ने कहा…

मैं उस समारोह में मौजूद था। इस किताब की लोकार्पण होने के बाद किताब की भूमिका के रूप में लिखा यह लेख लेखक के अनुसार कतिपय संपादनों के साथ फोटोकापी फार्म में सभा विसर्जन के बाद बाँटा जा रहा था। विष्णु खरे एक दल के ढीह हैं। पहले पहल तो यह लेख साहसिक लगता है लेकिन चमचों को छोड़ हर किसी को थोडी देर बाद ही यह समझ आने लगेगा कि यह कूटनीतिक हमले के लिए किया गया शुरूआती प्रयास भर है।

बेनामी ने कहा…

आपने सच को एकदम साफ़ ढंग से पेश किया है। पुरस्कार देने वालों पर हमेशा तरह-तरह के दवाब रहते हैं। और कभी-कभी वे पुरस्कार देने के अपने अधिकार को भुनाते भी हैं। विष्णु खरे और पुरस्कार देने का अधिकार रखने वाले बाक़ी सब लोग आख़िर हैं तो एक ही थैली के चट्टे-बट्टे। वैसे भी अन्धा बाँटे रेवड़ी अपनों-अपनों को दे। पुरस्कारों से ही कवि अच्छे होने लगते तो हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि केदार आज केदार जी होते और निकृष्ट कवि विष्णु खरे। खरे ईमानदार नहीं हैं और वे हमेशा साहित्य की राजनीति वैसे ही करते रहते हैं, जैसे हिन्दी के दो अन्य दिग्गज, नामवर जी और राजेन्द्र जी। यह तीर भी उन्होंने बाकी चयन्कर्ताओं पर कुछ सोच-समझकर ही छोड़ा है। खरे अच्छे कवि हैं, लेकिन ख़राब आलोचक।यह उनके इस लेख से साफ़ समझ में आता है।
अनिल जनविजय

बेनामी ने कहा…

विष्णु खरे ईमानदार नहीं हैं। वे न कविता के प्रति ईमानदारी बरत पाएँ हैं और न कवियों के प्रति। भारत भूषण पुरस्कार के अन्य चयनकर्ताओं पर यह ढेला उन्होंने क्यों फेंका है, जल्दी ही बात साफ़ हो जाएगी। वैसे अगर पुरस्कारों से ही किसी कवि को अच्छा कवि माना जाता तो केदार जी आज हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि होते और विष्णु खरे निकृष्टतम। लेकिन ऐसा नहीं है। विष्णु खरे एक अच्छे कवि हैं, लेकिन बड़े ख़राब आलोचक हैं। कम से कम उनका यह लेख तो यही बताता है। नामवर जी और राजेन्द्र जी की तरह विष्णु जी भी साहित्य की घटिया राजनीति कर रहे हैं।

neera ने कहा…

true and informative..

प्रदीप कांत ने कहा…

प्रासंगिक लेख.