16 जुलाई 2009

मेरा शहर मरा नही है

(अब उदय प्रकाश प्रकरण से सब परिचित हैं। इसी पर कपिलदेव जी की अन्यत्र लगी टिप्पणी यहाँ पोस्ट कर रहा हूं)
गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ के हाथों कुवर नरेन्द्रप्रताप सिंह स्मृति सम्मान ग्रहण करने की पहली खबर अमर उजाला के स्थानीय संस्करण में छपी थी। खबर में उदयप्रकाश का नाम चूंकि ‘‘प्रसिद्ध कथाकार डा् उदयप्रकाश सिंह’’ छपा था, इसलिए सहसा यह समझ पाना मुश्किल था कि यह कौन नया कथाकार है। लेकिन जिन्हें उदय प्रकाश के गोरखपुर आने की खबर थी उन्हें समझते देर नहीं लगी। हम सबको पहले से खबर थी कि उदयप्रकाश अपने उपन्यास के सिलसिले में कुशीनगर जाने वाले हैं। वे गोरखपुर में ही किसी कुंवर नरेन्द्रप्रताप सिंह के यहां ठहरेंगे। वे कुशीनगर गए कि नहीं यह तो नही मालूम, लेकिन लिखने पढ़ने की दुनिया से ताल्लुक रखने हम गोरखपुर वालों के लिए अमर उजाला की वह खबर एक स्तब्धकारी सूचना थी। गोरखपुर के वे साहित्यकार , जिन्हें हम अकसर ही समझौतावादी, दक्षिणपंथी और सवर्णवादी आदि कह कर पीड़ित प्रताड़ित करते रहते हैं, वे भी योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले किसी भी आयोजन में जाने से बचते हैं।हम उन्हें निन्दनीय समझते ही इसलिए हैं कि अभी उनमें इतनी लज्जा बची है कि वे मंदिर वाले आयोजनों में जाने में शर्म महसूस करते हैं। दुनिया जानती है कि साम्प्रदायिकता का विषवमन करने के मामले में अशोक सिंघल, तोगड़िया और मोदी के बाद अगर किसी का नाम आता है तो निश्चय ही वह योगी आदित्यनाथ का नाम है। उदयप्रकाश एक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं और उनके प्रशंसको की गोरखपुर में कमी नहीं है। लेकिन कुंवर नरेन्द्रपताप सिंह की स्मृति में आयोजित सम्मान समारोह में सिर्फ एक को छोड़ कर यहां का कोई भी लेखक नहीं था। इस सम्मान समारोह में उदयप्रकाश के पुरस्कृत होने के बाद हमारे शहर के साहित्यिकों ने उनसे मिलने ओैर उनके सम्मान में गोष्ठी आयोजित करने का विचार ही त्याग दिया। हम सब एक अजीब तरह की शर्म और आत्मग्लानि में डूब गये थे। हमारी साहित्यिक संचेतना और वैचारिक प्रतिरोध का आईकान एक प्रतिक्रिंरयावादी संकीर्णतावादी हिन्दू साम्प्रदायिक के हाथों हमारी ही आंखों के सामनें झुक कर कोई ताम्रपत्र ले कर गदगद था और भरे मंच सगर्व यह घोषणा कर रहा था कि कुंवर नरेन्द्रप्रताप सिंह को सांस्कृृृृृृृृृृृृृृृृृृृतिक राष्ट्रवाद का प्रबल प्रहरी होने के लिये सदा याद किया जाएगा। सच कहूं तो उदयप्रकाश के सम्मान समारोह का वह दिन हमारे शहर के साहित्यकारेां संस्कृतिकर्मियों और पाठकों के लिए शर्मसार होने का दिन था। मगर मुझे गर्व है कि बात बात पर आपस में लड़ते झगड़ते रहने वाले हमारे ‘शहर का साहित्यिक समाज इस मुद्दे पर पूरी एकमत था कि 5जुलाई का वह मनहूस दिन (जब उदयप्रकाश ने सम्मान लिया) शर्म से डूब मरने का दिन है।
अपने शहर मे आए अपने प्रिय कथाकार की इस शर्मनाक हरकत पर हम सिर्फ सर ही झुका सकते थे। और हमे कहने में कोई ‘शर्म नहीं है कि हमनें इस ‘शर्म को दिल से महसूस किया। कारण कि हमारे ‘शहर में उदय प्रकाश जी की तरह अभी कोई इतना ‘जहीन’ लेखक नही पैदा हुआ है जो हत्यारे हाथों से पुरस्कृत होने की हिमाकत भी करे औ अपने कृत्य पर लज्जित होने की बजाय उनके इस कृत्य पर सवाल उठाने वालों को ‘‘देख लेने’’ की धमकी देने का साहस भी कर सके।

3 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

उदयप्रकाश जी
पारिवारिक समारोह में गए
ठीक किया।
उस में भाग लिया
ठीक किया।
नोचते रहे जिन के मुखौटे
उन्ही से सम्मान ग्रहण किया
ठीक नहीं किया।
मना कर देते,
एक मुखौटा और नोचते
नाम होता
याद रखती दुनिया।
नाम तो अब भी हुआ
लेकिन बदनाम हो कर
याद तो फिर भी रखेगी दुनिया।

विजय प्रताप ने कहा…

हम गोरखपुर के नहीं हैं, लेकिन शर्मिंदा हम भी हैं. शर्मिंदा हैं की कोई तुक्ष 'सम्मान' के लिए अपने आत्मसम्मान को गिरवी रख दे, उदय प्रकाश ने हत्यारे के हाथ 'सम्मान' ले आपने चाहने वाले हजारो लोगों की हत्या की है,

dhireshsaini ने कहा…

ye bahut avashyak post hai. batati hai ki sab kuchh khatm nahi hua hai. dinesh ray ji ne achha likha hai