12 February 2012

सोनी सोरी की रिहाई के लिए धरना होगा.







दखल विचार मंच की पूर्वनिर्धारित बैठक आज फूलबाग स्थित गाँधी प्रतिमा के पास हुई. इसमें निम्नलिखित निर्णय लिए गए.

१- आगामी शनिवार, १८ फरवरी को फूलबाग गेट पर शाम ३ बजे से ५ बजे तक सोनी सोरी की रिहाई तथा उनका उत्पीडन करने वाले पुलिसकर्मी के पुरस्कार पर पुनर्विचार की मांग के साथ धरना दिया जाएगा. इसमें ग्वालियर के विभिन्न संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार, ट्रेड युनियन कर्मी और बुद्धिजीवियों सहित आम जन की भागीदारी होगी.

२- आगामी २३ मार्च को शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की शहादत दिवस पर शहीद मेला का आयोजन किया जाएगा. इसमें उन पर आधारित नाटक, जनगीत, भाषण, पुस्तक प्रदर्शनी, पोस्टर प्रदर्शनी आदि का आयोजन होगा.

३- इस अवसर पर युवा दखल का शहीद अंक निकाला जाएगा. यह अंक आजादी की लड़ाई में शहीद हुए उन शहीदों पर केंद्रित होगा जिन्हें मुख्य धारा के इतिहास से बाहर रखा गया है. साथ ही इसमें आज के समय में हाशिए की तमाम लड़ाइयों पर सामग्री होगी. सभी मित्रों से इसमें रचनात्मक तथा अन्य सहयोगों की अपेक्षा तथा अपील है.



बैठक में सर्वश्री राकेश अचल, राजेश शर्मा, जितेन्द्र बिसारिया, अशोक चौहान, अजय गुलाटी, अमित शर्मा, राहुल तिवारी, आशीष देवराड़ी, किरण पाण्डेय तथा अशोक कुमार पाण्डेय शामिल थे.

03 January 2012

मिस्र से हिन्दुस्तान तक - क्यूँ असफल हुए जनांदोलन?


युवा दखल के जनवरी-मार्च अंक का सम्पादकीय 

एक लंबे अंतराल के बाद युवा दखल फिर आप लोगों के हाथ में है. इस विलम्ब के कारण कुछ सांगठनिक हैं और कुछ आर्थिक भी. खैर कोशिश यही है कि इसे अब नियमित त्रैमासिक के रूप में निकाला जा सके. 

इस अंतराल में कितना कुछ हुआ. अरब देशों में व्यापक जनउभार के बाद सत्ताओं के परिवर्तन हुए. पूरी दुनिया की जनता ने इनका तहे दिल से स्वागत किया. लेकिन साल भर के भीतर अब लग रहा है कि जनउभार का लाभ जनविरोधी ताकतें उठा ले गयीं. सत्ता तो बदली पर जो नए लोग आये वह भी उसी वर्ग के हिस्सा थे. हालात यह हैं कि मिस्र में पन्द्रह से अधिक ऐसे लोगों की हत्या के समाचार हैं जो उस जनउभार में अत्यंत सक्रिय थे और आने वाले चुनावों में इस्लामी कट्टरपंथियों के विजयी होने की संभावना जताई जा रही है. दूसरे देशों में भी अमेरीकी पिट्ठुओं के नए-नए मुखौटों में सत्ता पर कब्ज़े की ही खबर है. 

आखिर ऐसा क्यूँ हुआ? क्यूँ जनता का वह गुस्सा, वह बलिदान इस तरह और इतनी जल्दी व्यर्थ चला गया? कैसे जनविरोधी ताकतें सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हो सकीं? अगर दुनिया के अब तक के इतिहास के आईने में देखें तो इसकी वज़ह कुछ-कुछ साफ़ होती है. इन सब देशों में जनता अगर अपने शासकों के खिलाफ सड़क पर आई थी तो इसके पीछे दुनिया भर में जारी आर्थिक संकटों के फलस्वरूप उन देशों में भी बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भूखमरी जैसे कारण थे. यहाँ यह बता देना होगा कि इन सभी देशों में हमारे देश की ही तरह नब्बे के दशक में निजीकरण-उदारीकरण की नीतियाँ लागू हुईं थीं. ऐसे में लंबे समय से सत्ता में बैठे शासकों के खिलाफ गुस्सा फूटना स्वाभाविक था. लेकिन इन स्वतः स्फूर्त आन्दोलनों के पीछे उन व्यवस्थाओं के विकल्प को लेकर कोई साफ़ समझदारी नहीं थी. किसे हटाना है यह तो साफ़ था लेकिन उसकी जगह बनाना क्या है, इसका कोई रोड मैप कोई ब्लू प्रिंट तैयार नहीं किया गया. नतीजतन जहाँ जनता अपना खून-पसीना बहाती रही, इसका फ़ायदा उन शासकों को हटाकर खुद सत्ता पर काबिज होने के प्रयास में लगे लोगों ने उठा लिया. धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों ने अपने संगठित स्वरूप और जनता के एक हिस्से में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अमेरिका की मदद से सत्ता की ओर कदम बढ़ाया. 

अमेरिका में 'कैप्चर द वाल स्ट्रीट' आंदोलन इसके बरक्स सीधे पूंजीवाद पर हमला करने वाला आंदोलन था. स्वतः स्फूर्त होने के बावजूद इसकी समझदारी साफ़ थी कि मुनाफे की हवस और सट्टेबाजी ने निन्यानबे फीसद जनता का जीवन दूभर कर दिया है. लेकिन सांगठनिक तैयारियों का अभाव वहाँ भी साफ़ था. उसकी किसी बड़ी सफलता की उम्मीद तो उसके आयोजकों को भी नहीं थी लेकिन उसने दुनिया भर को यह ज़रूर दिखा दिया की पूंजीवाद के मक्का में भी आम जनता किस तरह त्रस्त है. उसने पूंजीवाद के वर्तमान माडल की विफलता को साफ़ बता दिया. 

इसी के बरक्स अपने देश में अन्ना आंदोलन के उत्थान और पतन को देखा जा सकता है. नई आर्थिक नीतियों से उपजे मंहगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता को अन्ना के रूप में एक नायक दिखा और वह लोकपाल के बारे में जाने बिना उनके पीछे दौड़ गयी. अवतारों के भरोसे परिवर्तन की उम्मीद लगाने वाले समाज में अन्ना एक अवतार की तरह आये. राजनीतिक दलों के अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह से खो देने के कारण अन्ना ने जो कहा उसे जनता ने पत्थर की लकीर मान लिया...लेकिन छः महीने बीतते-बीतते अन्ना आंदोलन का जादू उतरने लगा. सारा आंदोलन एक व्यक्ति में, सारी शक्तियां एक तानाशाही ताकत में और सारा विरोध एक पार्टी के खिलाफ केंद्रित कर देने  की ज़िद का परिणाम यह हुआ कि जनता की यह लड़ाई दो दलों की लड़ाई में तब्दील हो गयी. काश कि इस बहाने मुनाफे पर आधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पर सवाल खड़े किये जा सकते. 

खैर यह भी सच है कि जनता जब एक बार सड़क पर उतरना सीख जाती है तो फिर वह बार-बार उतरती है. आज बुद्धिजीवियों और एक बेहतर दुनिया का सपना देखने वालों का यह फ़र्ज़ है कि पूंजीवाद के एक सशक्त और कामयाब विकल्प के निर्माण के लिए बौद्धिक और राजनीतिक तैयारी पूरे दमखम से शुरू करें ताकि जनता जब अगली बार सड़क पर उतरे तो शान्ति, समृद्धि और  समाजवाद पर आधारित एक जनपक्षीय व्यवस्था का निर्माण करके ही दम ले.

नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित  

21 October 2011

यह गद्दाफी की हार नहीं अमरीका की जीत है..





जिस धज से कोई मकतल को गया वो शान सलामत रहती है,
ये जान तो आनी-जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं.
--फैज़


(लीबिया पर नाटो के हमले के बाद गद्दाफी की हार तय थी. अचरज यह नहीं कि गद्दाफी को क़त्ल कर दिया गया या अमरीकी चौधराहट में नाटो की दैत्याकर फौज के दम पर वहाँ के साम्रज्यवादपरस्त बागियों ने लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया. अचरज तो यह है कि गाद्दफी और उनके समर्थक नौ महीने तक उस साम्राज्यवादी गिरोह की बर्बरता के आगे डटे रहे. फिदेल कास्त्रो ने 28 मार्च 2011को अपने एक विमर्श में कहा था कि...
"उस देश (लीबिया) के नेता के साथ मेरे राजनीतिक या धार्मिक विचारों का कोई मेल नहीं है। मैं मार्क्सवादी-लेनिनवादी हूँ और मार्ती का अनुयायी हूँ, जैसा कि मैंने पहले ही कहा है।

मैं लीबिया को गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के एक सदस्य और संयुक्त राष्ट्रसंघ के लगभग 200 सदस्यों में से एक सम्प्रभु देश मानता हूँ।

कोई भी बड़ा या छोटा देश, एक ऐसे सैनिक संगठन की वायु सेना द्वारा जघन्य हमले का इस तरह शिकार नहीं हुआ था, जिसके पास हजारों लड़ाकू बमवर्षक विमान, 100 से भी अधिक पनडुब्बी, नाभिकीय वायुयान वाहक और धरती को कई बार तबाह करने में सक्षम शस्त्र-अस्त्रों का जखीरा है। हमारी प्रजाति के आगे ऐसी परिस्थिति कभी नहीं आयी और 75 साल पहले भी इससे मिलती-जुलती कोई चीज नहीं रही है जब स्पेन को निशाना बनाकर नाजी बमवर्षकों ने हमले किये थे।

हालाँकि अपराधी और बदनाम नाटो अब अपने ‘‘लोकोपकारी’’ बमबारी के बारे में एक ‘‘खूबसूरत’’ कहानी गढ़ेगा।

अगर गद्दाफी ने अपनी जनता की परम्पराओं का सम्मान किया और अन्तिम साँस तक लड़ने का निर्णय लिया, जैसा कि उसने वादा किया है और लीबियाई जनता के साथ मिलकर मैदान में डटा रहा जो एक ऐसी निकृष्टतम बमबारी का सामना कर रही है जैसा आज तक किसी देश ने नहीं किया, तो नाटो और उसकी अपराधिक योजना शर्म के कीचड़ में धँस जायेगी।
जनता उसी आदमी का सम्मान करती है और उसी पर भरोसा करती है जो अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।...अगर वे (गद्दाफी) प्रतिरोध करते हैं और उनकी (नाटो) माँगों के आगे समर्पण नहीं करते तो वे अरब राष्ट्रों की एक महान विभूति के रूप में इतिहास में शामिल होंगे।"

गद्दाफी ने फिदेल को हू-ब-हू सही साबित किया और पलायन की जगह संघर्ष का रास्ता अपनाया। 

लीबियाई जनता पर बर्बर नाजी-फासीवादी हमले का प्रतिरोध करते हुए जिस तरह गद्दाफी ने शहादत का जाम पियावह निश्चय ही उन्हें साम्राज्यवाद-विरोधी अरब योद्धाओं की उस पंक्ति में शामिल कर देता है जिसमें लीबियाई मुक्तियोद्धा उमर मुख़्तार का नाम शीर्ष पर है। गद्दाफी की साम्राज्यवादविरोधी दृढता को सलामकरते हुए प्रस्तुत है फ्रेड पियर्स का यह लेख)

आतंकी और बर्बर अमरीका का शिकार एक और राष्ट्र. लीबिया 

फ्रेड पीयर्स

मैं लीबिया में 12 वर्ष रहा हूँ। वहां नागरिको को संपूर्ण शिक्षा (जिसमें विदेश में जाकर शिक्षा लेना भी शामिल है), चिकित्सा (जिसमें विदेश में जाकर उपचार लेने का खर्चा भी शामिल है) और लोगो को घर बना कर देना सब कुछ सरकार करती है। उसने पूरे देश में नई सड़कें (जिन पर कोई टोल नहीं लगता है), अस्पताल, स्कूल, मस्जिदें, बाजार सब कुछ नया बनवाया था। मुझसे भी पूरे 12 वर्षो में नल, बिजली, टेलीफोन का कोई पैसा नहीं लिया। मुझे खाने.पीने, पेट्रोल, सब्जी, फल, मीट, मुर्गे, गाड़ियां, फ्रीज, टीवी, बाकी घर की सुविधाएं, एयर ट्रेवल और सब कुछ सुविधाएँ मुफ्त में मिली हुई थी।


उसने लीबिया को जो एक रेगिस्तान है, हरा-भरा ग्रीन बना दिया था। एक बार हमारे भारत के राजदूत ने मेरे डायरेक्टर को कहा था कि हम भारतवासी हरे भारत को काट कर रेगिस्तान बना रहे हैं और मैं यहां आकर देखता हूँ कि आपने रेगिस्तान को हरा-भरा बना दिया है। गद्दाफी ने लीबिया में मेन मेड रीवर बनवाई थी जो दुनिया का सबसे मंहगा प्रोजेक्ट है, जिसके बारे में कहा गया था कि यह प्रोजेक्ट इतना अनाज पैदा कर सकता है जिससे पूरे अफ्रीका का पेट भर जाये, और जिसका ठेका कोरिया को दिया गया था। जब गद्दाफी यह ठेका देने कोरिया गया था तो उसके स्वागत में कोरिया ने चार दिन तक स्वागत समारोह किये थे और उसके स्वागत में चालीस किलोमीटर लंबा कालीन बिछाया था। इस ठेके से कोरिया ने इतना कमाया था कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था जापान जैसी हो गई थी। मुझ पर विश्वास नहीं हो तो गूगल की पुरानी गलियों में जाओ, आपको सारे सबूत मिल जायेंगे। मैं उस महान शासक को श्रद्धांजलि देता हूँ और उसकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करता हूँ। उसे मिस्र के जमाल अब्दुल नासर नें मात्र 28 वर्ष की उम्र में लीबिया का शासक बना दिया था। वह भारत का अच्छा मित्र था। मालूम हो कि गद्दाफी ने 41 साल तक लीबिया पर राज किया है। 

गद्दाफी था महान नदी निर्माता

लीबीया और गद्दाफी का नाम आजकल हम सिर्फ इसलिए सुन रहे हैं क्योंकि गद्दाफी को गद्दी से हटाने के लिए अमेरिका बमबारी कर रहा है, लेकिन गद्दाफी के दौर में उनके काम का जिक्र करना भी जरूरी है जो न केवल लीबीया बल्कि विश्व इतिहास में अनोखा है- गद्दाफी की नदी। अपने शासनकाल के शुरूआती दिनों में ही उन्होंने एक ऐसे नदी की परियोजना पर काम शुरू करवाया था जिसका अवतरण और जन्म जितना अनोखा था शायद इसका अंत उससे अनोखा होगा।

लीबिया की गिनती दुनिया के कुछ सबसे सूखे माने गए देशों में की जाती है। देश का क्षेत्रफल भी कोई कम नहीं। बगल में समुद्रए नीचे भूजल खूब खारा और ऊपर आकाश में बादल लगभग नहीं के बराबर। ऐसे देश में भी एक नई नदी अचानक बह गई। लीबिया में पहले कभी कोई नदी नहीं थी। लेकिन यह नई नदी दो हजार किलोमीटर लंबी है, और हमारे अपने समय में ही इसका अवतरण हुआ है! लेकिन यह नदी या कहें विशाल नद बहुत ही विचित्र है। इसके किनारे पर आप बैठकर इसे निहार नहीं सकते। इसका कलकल बहता पानी न आप देख सकते हैं और न उसकी ध्वनि सुन सकते हैं। इसका नामकरण लीबिया की भाषा में एक बहुत ही बड़े उत्सव के दौरान किया गया था। नाम का हिंदी अनुवाद करें तो वह कुछ ऐसा होगा। महा जन नद।
हमारी नदियां पुराण में मिलने वाले किस्सों से अवतरित हुई हैं। इस देश की धरती पर न जाने कितने त्याग, तपस्या, भगीरथ प्रयत्नों के बाद वे उतरी हैं। लेकिन लीबिया का यह महा जन नद सन् 1960 से पहले बहा ही नहीं था। लीबिया के नेता कर्नल गद्दाफी ने सन् 1969 में सत्ता प्राप्त की थी। तभी उनको पता चला कि उनके विशाल रेगिस्तानी देश के एक सुदूर कोने में धरती के बहुत भीतर एक विशाल मीठे पानी की झील है। इसके ऊपर इतना तपता रेगिस्तान है कि कभी किसी ने यहां बसने की कोई कोशिश ही नहीं की थी। रहने-बसने की तो बात ही छोड़िए, इस क्षेत्र का उपयोग तो लोग आने-जाने के लिए भी नहीं करते थे। बिल्कुल निर्जन था यह सारा क्षेत्र।
नए क्रांतिकारी नेता को लगा कि जब यहां पानी मिल ही गया है तो जनता उनकी बात मानेगी और यदि इतना कीमती पानी यहां निकालकर उसे दे दिया जाए तो वह हजारों की संख्या में अपने-अपने गांव छोड़कर इस उजड़े रेगिस्तान में बसने आ जाएगी। जनता की मेहनत इस पीले रेगिस्तान को हरे उपजाऊ रंग में बदल देगी।
अपने लोकप्रिय नेता की बात लोक ने मानी नहीं। पर नेता को तो अपने लोगों का उद्धार करना ही था। कर्नल गद्दाफी ने फैसला लिया कि यदि लोग अपने गांव छोड़कर रेगिस्तान में नहीं आएंगे तो रेगिस्तान के भीतर छिपा यह पानी उन लोगों तक पहुंचा दिया जाए। इस तरह शुरू हुई दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महंगी सिंचाई योजना। इस मीठे पानी की छिपी झील तक पहुंचने के लिए लगभग आधे मील की गहराई तक बड़े-बड़े पाईप जमीन से नीचे उतारे गए। भूजल ऊपर खींचने के लिए दुनिया के कुछ सबसे विशालकाय पंप बिठाए गए और इन्हें चलाने के लिए आधुनिकतम बिजलीघर से लगातार बिजली देने का प्रबंध किया गया।
तपते रेगिस्तान में हजारों लोगों की कड़ी मेहनत, सचमुच भगीरथ-प्रयत्नों के बाद आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिसका सबको इंतजार था। भूगर्भ में छिपा कोई दस लाख वर्ष पुराना यह जल आधुनिक यंत्रों, पंपों की मदद से ऊपर उठाए ऊपर आकर नौ दिन लंबी यात्रा को पूरा कर कर्नल की प्रिय जनता के खेतों में उतरा। इस पानी ने लगभग दस लाख साल बाद सूरज देखा था।

कहा जाता है कि इस नदी पर लीबिया ने अब तक 27 अरब डालर खर्च किए हैं। अपने पैट्रोल से हो रही आमदनी में से यह खर्च जुटाया गया है। एक तरह से देखें तो पैट्रोल बेच कर पानी लाया गया है। यों भी इस पानी की खोज पैट्रोल की खोज से ही जुड़ी थी। यहां गए थे तेल खोजने और हाथ लग गया इतना बड़ा, दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात भूजल भंडार।

बड़ा भारी उत्सव था। 1991 के उस भाग्यशाली दिन पूरे देश से, पड़ौसी देशों से, अफ्रीका में दूर-दूर से, अरब राज्यों से राज्याध्यक्ष, नेता, पत्रकार जनता- सबके सब जमा थे। बटन दबाकर उद्घाटन करते हुए कर्नल गद्दाफी ने इस आधुनिक नदी की तुलना रेगिस्तान में बने मिस्र के महान पिरामिडों से की थी।

लोग बताते हैं कि इन नद से पैदा हो रहा गेहूं आज शायद दुनिया का सबसे कीमती गेहूं है। लाखों साल पुराना कीमती पानी हजारों-हजार रुपया बहाकर खेतों तक लाया गया है- तब कहीं उससे दो मुट्ठी अनाज पैदा हो रहा है। यह भी कब तक? लोगों को डर तो यह है कि यह महा जन नद जल्दी ही अनेक समस्याओं से घिर जाएगा और रेगिस्तान में सैकड़ों मीलों में फैले इसके पाईप जंग खाकर एक भिन्न किस्म का खंडहर, स्मारक अपने पीछे छोड़ जाएंगे।

लीबिया में इस बीच राज बदल भी गया तो नया लोकतंत्र इस नई नदी को बहुत लंबे समय तक बचा नहीं सकेगा। और देशों में तो बांधों के कारण, गलत योजनाओं के कारण, लालच के कारण नदियां प्रदूषित हो जाती हैं, सूख भी जाती हैं। पर यहां लीबिया में पाईपों में बह रही इस विशाल नदी में तो जंग लगेगी। इस नदी का अवतरण, जन्म तो अनोखा था ही, इसकी मृत्यु भी बड़ी ही विचित्र होगी।

(फ्रेड पीयर्स का यह लेख गांधी मार्ग में प्रकाशित हुआ है, प्रस्तुति- अनुपम मिश्र)

यहाँ विकल्प से साभार 

13 October 2011

भारतीय लोकतंत्र एक सामंती लोकतंत्र है - मदन कश्यप



ग्वालियर में शहीद ए आजम भगत सिंह के जन्म दिवस पर गत २७ सितम्बर को ‘दखल विचार 
मंच’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला



ग्राम्शी ने कहा था कि एक बुर्जुआ लोकतंत्र में पूँजी जनता के सामूहिक विवेक को नियंत्रित करती है. आज भारत सहित सारी दुनिया में यह देखा जा सकता है. इन लोकतंत्रों में सारे निर्णयों और सारी गतिविधियों के केन्द्र में लोक नहीं पूंजीपति हैं. बड़े स्पष्ट तरीके से नीतियाँ इस प्रकार बनाई जा रही हैं कि वे पूंजीपतियों के वर्ग-हितों के अनुरूप हों. इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से समाज का बड़ा हिस्सा वंचना का शिकार होकर हासिये पर जा रहा है. किसान, मजदूर और आदिवासी अब सत्ता विमर्श के केन्द्र पर नहीं हैं. एक ऐसा विकास-विमर्श प्रचलित किया जा रहा है जिसमें पूंजीपतियों की समृद्धि को ही विकास का पर्याय बना दिया गया है. यह केन्द्र लगातार संकुचित हो रहा है और हाशिया बढ़ता जा रहा है. इसके स्रोत सत्ता की बदली हुई शब्दावली में भी देखे जा सकते हैं. संविधान में कहीं ‘केन्द्र’ शब्द का प्रयोग नहीं है. वहाँ ‘संघीय शासन’ की बात की गयी थी. लेकिन आप देखेंगे कि मीडिया से लेकर सत्ता तक की भाषा में ‘केन्द्र सरकार’ का प्रचलन है. यह सिर्फ भाषा का खिलवाड नहीं. यह उस बदले हुए वैचारिक परिदृश्य को भी दिखाता है जिसमें सभी का प्रतिनिधित्व करने वाली और विभिन्न राष्ट्रीयताओं तथा समाजों के एक संघ की प्रतिनिधि सरकार एक सर्वाधिकारी केन्द्रीय सत्ता में तब्दील हो गयी है. यह बातें ग्वालियर स्थित कला वीथिका में शहीद ए आजम भगत सिंह के जन्म दिवस पर गत २७ सितम्बर को ‘दखल विचार मंच’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में हिस्सेदारी करते हुए वरिष्ठ कवि तथा विचारक मदन कश्यप ने मुख्य वक्तव्य देते हुए कहीं. पूंजीवादी लोकतंत्र के भीतर पैदा होने वाले विभाजनों की विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ‘इस केन्द्र और हासिये के विभाजन का असर भी शुरू से ही साफ़ दिखाई देने लगा था. कश्मीर, पूर्वोत्तर ही नहीं देश के तमाम हिस्सों सहित लगभग हर राज्य में इस द्वंद्व का प्रतिफलन हिंसक/अहिंसक संघर्षों में हुआ है. सुविधाप्राप्त तथा वंचितों के बीच बढ़ती खाई ने भारत ही नहीं दुनिया भर में एक ऎसी स्थिति बनाई है जिसमें लोगों का गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा है. अरब देशों से लगाए यूरोप और अमेरिका तक में जारी जनता के विरोध प्रदर्शन पूंजीवादी लोकतंत्र की इसी विफलता के स्वाभाविक परिणाम हैं. यहाँ बड़ी भूमिका निभाने में क्रांतिकारी शक्तियों की अक्षमता ही पूंजीवाद को अब तक ज़िंदा रखे है. ऐसा क्यों है, इस पर गंभीर विचार की ज़रूरत है.’


विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ लेखक डा मधुमास खरे ने विस्तार से भगत सिंह के वैचारिक स्रोतों का ज़िक्र करते हुए कहा कि आज दक्षिणपंथी ताकतें भगत सिंह के नाम पर भ्रम फैलाना चाहती हैं लेकिन उनका लिखा उनकी सही वैचारिक स्थिति और क्रांतिकारी सोच का पता देती है. उन्होंने युवाओं से उनके लेखों को गंभीरता से पढ़ने की सलाह दी.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ट्रेड युनियन कर्मी का. राजेश शर्मा ने देश-दुनिया में चल रहे संघर्षों की और इशारा करते हुए कहा कि यह समय दुनिया भर की क्रांतिकारी शक्तियों के तैयार हो जाने का है. पूंजीवादी लोकतंत्र की सीमाएँ सामने आ गयी हैं और जनता उसका असली चेहरा पहचान चुकी है. आज ज़रूरत इसका बेहतर विकल्प प्रदान करने की है.



कार्यक्रम के आरंभ में दखल की सांस्कृतिक टीम ने क्रांतिकारी गीतों की प्रस्तुति की. इस अवसर पर ‘भगत सिंह ने कहा’ सीरीज के पोस्टरों तथा पुस्तकों की एक लघु प्रदर्शनी भी लगाई गयी थी. कार्यक्रम का संचालन युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने किया तथा इसमें ज़हीर कुरैशी, ए असफल, संतोष निगम  गुरुदत्त शर्मा, सतीश गोविला, डा अशोक चौहान, डा जितेन्द्र विसारिया, अमित शर्मा, जयवीर राठौर, किरण, ज्योति सिंह, आशीष देवरारी सहित अनेक लोग उपस्थित थे.

प्रस्तुति – फिरोज खान   

09 October 2011

शीबा पर हमला अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है!


प्रेस नोट

जानी-मानी लेखिका और स्त्री अधिकार कार्यकर्ता शीबा असलम फहमी के घर पर दिल्ली में हुए इमाम बुखारी समर्थकों के बर्बर हमले का हम कडा विरोध करते हैं. साम्प्रदायिक कट्टरता के खिलाफ खुलकर लिखने वाली शीबा को धमकियां लंबे समय से मिल रही थीं और इसके पहले भी उन पर हमले हुए हैं. देश में लगातार सर उठा रहे दक्षिणपंथी कट्टरपंथ को रोकने में सरकार की नाकामयाबी ने जनपक्षधर लेखकों के लिए तमाम मुश्किलात खडी कर दी हैं और लोकतंत्र के समक्ष यह एक बड़ी चुनौती है.

दखल विचार मंच इस घटना की कड़ी निंदा करता है और शीबा के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करता है. साथ ही हम दिल्ली की मुख्यमंत्री माननीय शीला दीक्षित जी से अपराधियों के खिलाफ शीघ्र कड़ी से कड़ी कार्यवाही करने की तथा शीबा असलम फहमी और उनके परिवारजनों की समुचित सुरक्षा व्यवस्था की मांग करते हैं.

सादर
संयोजन समिति, दख़ल विचार मंच