24 जून 2010

क्या आप हमारे साथ नहीं हैं?

( युवा संवाद द्वारा प्रस्तावित अभियान का पर्चा)

समानांतर न्याय व्यवस्था ओं के खिलाफ एक अभियान
(खाप पंचायतों के विशेष संन्दर्भ में )

हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था ‘जाति’ आधारित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक ‘जाति’ यहाँ प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिष्ठा और पहचान का आधार है। श्रेष्ठताबोध की नींव पर खड़ी बिना खिड़की-दरवाजों वाली इस बहुमंजिला इमारत में, कुछ व्यक्ति तो जन्म से ही श्रेष्ठ, सम्मानीय और ऊँचे मान लिये जाते हैं तो कुछ जन्म से ही घृणित, पतित और नींच।. हजारों साल से शोषण और असमानता पर आधारित इस अमानवीय कबीलाई व्यवस्था ने देश में, कभी न समाप्त होने वाले सामाजिक संघर्ष को जन्म दिया है। देश भर में चौबीसौ घंटे चलने वाले इस गृहयुद्ध में, एक ओर जाति भंजकों ने इसे तोड़ने के जमकर प्रयास किये हैं, तो दूसरी ओर इसके यथास्थितिवादियों ने इस बचाये रखने में भी कोई कोर-कसर बाकी नही छोड़ी है जिसके परिणाम स्वरूप आये दिन देश के किसी न किसी कोने से सामूहिक हत्या, बलात्कार और आगजनी की घटनाएँ होता सुनते-देखते हैं। 

दिलचस्प बात यह है कि जाति के इस विशाल चक्रव्यूह का सबसे बड़ा शत्रु दो विभिन्न जातियों के स्त्री-पुरूष के बीच होने वाला ‘अन्तर्जातीय’ विवाह है! आपसी सहमति के आधार पर हाने वाले इन ‘अन्तर्जातीय विवाहों’ की शुरूआत के साथ ही यह व्यवस्था चरमराने लगती है और समाज का आधारभूत ढाँचा असमानता से समानता में बदलने लगता है। जाति बाहर कर दिये जाने डर से भयभीत लड़का-लड़की के माता-पिता, चाचा-ताऊ और भाई ही अक्सर उन्हें, इज्जत के नाम  मौत के घाट उतार देते हैं। पंचायतों के इन तालिबानी हुक्म और फरमानों के बीच समानता के आधार पर सबको बराबर जीने के अधिकार का वचन देने वाली हमारे संविधान की धाराएं, किसी जज अथवा वकील की पुरानी किताबों के बीच पीले पन्नों में दबी सिसकती रह जाती हैं। देश के किसी न किसी कोने से आये दिन जाति के बाहर अन्तर्जातीय विवाह करने  वाले युवक-युवतियों  की हत्या की खबरें तो हम सुनते ही रहते थे, लेकिन मीडिया की पहुँच में आये देश के दूर-दराज पिछड़े इलाकों से अब हमें जाति के भीतर जाति (गोत्र) में शादी करने वाले विवाहित जोड़ों की हत्याओं की खबर भी अब हमारे सामने आम हो चुकी है। देश की लोकतंत्र प्रणाली और उसकी न्यायव्यवस्था को धता बताकर अपने निर्णय देने वाली देश की ये महापंचायतें और खाप पंचायतें मनुष्यता की हत्यारी हैं। ये हजारों साल पूर्व असमानता और शोषण के आधार पर निर्मित प्रथाओं और परंपराओं में विश्वास ही नहीं करते बल्कि वे उन्हें आज के आधुनिक और वैज्ञानिक युग पर थोपने की पूरी-पूरी कोशिश में हैं। समय रहते यदि हम ने इनके विरूद्ध आवाज नहीं उठाई, तो ये हमारी सारी वैज्ञानिक प्रगति और तार्किक सोच पर हावी होकर हमें हजारों साल पीछे  धकेल सकते हैं। आज समय है देश में जगह-जगह स्थापित ऐसी समानान्तर न्यायव्यवस्थाओं से एकजुट होकर लड़ने और उन्हें समाप्त करने का । 
आज की इस जरूरत को महसूस करते हुए ही युवा संवाद ने इनके खिलाफ अभियान चलाने का निर्णय लिया है। अपने संविधान की रक्षा की इस लड़ाई में आपका सहयोग हमें बल देगा ।
अभिवादन सहित
युवा संवाद
संपर्क- 9425787930,9039968068,9893375309

6 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

संक्षेप में सही दिशा की ओर इंगित कर दिया है आप ने।

असीम ने कहा…

मैं पूर्ण रूप से इस अभियान के साथ हूँ..और हर तरह से सहयोग देने को तैयार हूँ. यह एक बहुत गंभीर विषय है जो दो तरह के विचारों का युद्ध है..इसे हमे जीतना ही होगा..अपने लिए, अपने बच्चों के लिए, अपने समाज के लिए और अपने देश के लिए!

हमे इसे अभी रोकना होगा पूरी शक्ति के साथ, पूरी एकता के साथ. एक आंदोलन छेडना होगा पूरे देश में...संविधान और न्याय व्यवस्था कुछ नहीं कर सकती जब तक समाज में जागरूकता न आये..

"हम भारत को पकिस्तान न बनने देंगे
अपने गाँवों में एक और तालिबान न बनने देंगे
इस कट्टर समाज को बदल कर रहेंगे हम
इंसान को हैवान न बनने देंगे हम !

L.Goswami ने कहा…

हम आपके साथ थे ..हैं ..और रहेंगे.

mukti ने कहा…

हम आपके साथ हैं !

pratibha ने कहा…

saath hain ji!

प्रदीप कांत ने कहा…

हम भी साथ साथ हैं