14 जून 2009

हर धर्म औरत का दुश्मन है

कल एक पोस्ट देखी जाने-माने ब्लाग मोहल्ला पर जहां एक साहब महिलाओं को दरिंदों से बचने के लिये परदे की वक़ालत कर रहे थे। यह तर्कों के पूरे तामझाम के साथ किया गया था। वैसे तो इस तरह की बातें नयी नहीं हैं पर मोहल्ला पर देख कर दुख हुआ था।

औरतों को ऐसे मशविरे सभी तालिबान देतें हैं--चाहे वे मदरसे के पढे हों या फिर संघी गुरुकुलों के। अभी पिछ्ले दिनों महिला दिवस पर स्थानीय चर्च में हुए प्रवचन मे फादर ने भी औरतों को ऐसे ही उपदेश बांटे थे। दरिंदे को काबू करने की जगह शिकार को क़ैद करने का यह तर्क पुरुष प्रधान सोच के लिये बेहद मौजू है। कोई यह क्यों नहीं बताता कि गावों में जांघिया पहन कर घूमने वाले पुरुषों के ऊपर हमला क्यों नहीं होता?
लेकिन पोस्ट से कम भयावह इस पर हुई बहस नही रही। चूंकि पोस्ट करने वाला मुस्लिम था तो संघी गुर्गों को अपनी घटिया मानसिकता का प्रदर्शन करने का मौका मिला। इनसे कौन कहे कि हिन्दू धर्म भी घूंघट परदे के कतई ख़िलाफ़ नहीं। सतीप्रथा के समर्थक जब दूसरे धर्मों के ऊपर प्रहार करें तो नीयत पर शक़ क्यों ना हो?

सच तो यह है कि हर धर्म स्त्री का दुश्मन है।

17 टिप्‍पणियां:

अनुनाद सिंह ने कहा…

क्या यह 'डैमेज कन्ट्रोल' के लिये लिखा गया है?
सामान्यीकरण, किसी मुद्दे को कमजोर करने का सबसे कारगर हथियार है। आपने यहाँ इसी हथियार का उपयोग किया है।

हाँ, इस जनरलाइजेशन में आप 'कम्युनिज्म' नामक पिशाची मजहब का नाम लेना भूल गये हैं।
इस मजहब ने महिलाओं का सबसे अधिक शोषण किया है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप सही कहते हैं। धर्म वास्तव में सामंतवाद के दौरान सत्ता की राजनीति रहा है।

आशेन्द्र सिंह ने कहा…

guru har aadmee dharm ko hatiyaar bana kar ourat ko apna gulam banana chahta hai.

परमजीत बाली ने कहा…

@सच तो यह है कि हर धर्म स्त्री का दुश्मन है।

वैसे कुरान के विचार तो पढ़ लिए की कुरान में यह लिखा है।लेकिन हिन्दू या दूसरे किसी धर्म में यह कहाँ लिखा है कि घूघँट जरूरी है ? कृपया सप्रमाण बताएं।ताकी जानकारी बढ सके। धन्यवाद।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अनुनाद जी
वैसे मुझे किसी डैमेज कंट्रोल की ज़रुरत नही है क्योंकि मेरा मोहल्ला या इस लेख के लेखक से कोई सम्बन्ध नही है.
आप जैसे लोग कम्युनिज्म को गरियाने के बहाने ढूँढते हैं. हिम्मत है तो तर्क दीजिये. मार्क्स वह पहला दार्शनिक था जिसने स्त्रियों को बराबर का अधिकार देने की बात की. आप कुतर्कों के गधे पर सवार हो आँखों पर पट्टी बाँध नागपुर की परिक्रमा करेंगे तो उद्धारक पिसाच ही नज़र आयेगा.

पिसाच वे हैं जो औरतो को घरों में कैद करते है, खरीद-फरोख्त का सामान बनाते है और सड़को पर उनपर हमला करते हैं,

परमजीत जी जल्द ही बाबा साहब अम्बेडकर का आलेख स्त्री और प्रतिकान्ति पोस्ट करने का प्रयास करुंगा.

बेनामी ने कहा…

बुड्बक बामहन लाल लंगोटा पहिन के प्रगतिशील बन रहे हैं। वर्ण जात साली इन्ही की दी है। अब्दुलगफुर हो सिकन्दरबखत हबीब तन्वीर या अंबेदकर सब बम्हनाइने न रखे थे। कुकर्म की सजा मिल रही है।

रंगनाथ सिंह ने कहा…

लगता है कि अनुनाद जी को मार्कसवाद से मैनिया है। इसलिए उनकी बात का सख्त विरोध करते हुए भी कहुँगा कि हम वामपंथयों को धार्मिक रवैये से बचना चाहिए। सैद्धांतिक स्तर पर स्त्री की स्थिति और व्यावहारिक स्तर पर स्त्री की स्थिती में फर्क होता है। यौन साम्यवाद, वन ग्लास वाटर थियरी जैसे दिमागी फितुर वामपंथ की ही उपज है। मैने कई किस्से सुने हैं जिनमें कामरेड ने पार टी लाइन के तहत यौन-जरूरतों को पूरा करना का हुक्म दिया जिससे कि वो मानसिक शांति से पार्टी का काम आगे बढ़ा सकें।
कुमार विकल की कुछ कामरेडों पर लिखी कविताएं याद दिलाना चाहुँगा। जरूरत पड़ी तो यहाँ प्रस्तुत कर दुँगा। सृंजय ने क्लासिक कहानी कामरेड का कोट लिखी है जिसे हर वामपंथी ने पढ़ा होगा। काशीनाथ सिंह ने भी लाल किले का बाज लिखी है। मैनें अपने व्यक्तिगत जीवन में इन कहानियों को सच होते देखा है। इन सभी रचनाओं के लेखक वामपंथी थे।
कहने को हम कह सकते हैं कि प्रकाश करात और बुद्धदेव वामपंथी नहीं हैं। लेकिन इतिहास किसी की ख्वाहिश से नहीं चलता। इन गुलाबी वाम के बनाए रन भी वामपंथ के खाते में ही जुड़ेगें।
इसलिए किसी भी मुद्दे को उठाते वक्त हमें किसी तरह के मोह से बच कर बात रखनी होगी। मैं जानता कि मैंने जो कहा है उसे कहने के खतरे क्या हैं ? लेकिन रेमण्ड विलियम्स का प्रशंसक होने के नाते मैंने यह सब लिखने का साहस किया है।
स्त्री अधिकारें को किसी भी तरीके की धार्मिक कट्टरता से खतरा है। कोई धर्म औरत को आजाद नहीं देखना चाहता हैं। किसी धर्म में व्यावाहिरक ही नहीं सैद्धातिंक स्तर पर भी बराबरी नहीं होती। जब हम पर्दा या घूघंट का विरोध करते हैं तो किसी धर्म का विरोध नहीं करते। हम उस विचार का विरोध करते हैं जो स्त्री को कैदी बना कर रखना चाहता है। एक जमाना था कि कुछ लोगों ने सती प्रथा का विरोध किया। बाकि लोगों ने इसे हिन्दु धर्म विरोधी बताया। आज हिन्दु धर्म है लेकिन सती प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है। इसलिए ऐसे किसी मुद्दे पर हमें भावना के बजाए विवके से सोचना चाहिए।

indianwomanhasarrived ने कहा…

bas ek shabd
dhanyavaad

Sachi ने कहा…

आप तलाक को किसी के लिए भी तो बेहतर नहीं कहेंगे न? जितने तलाक इन लाल झंडे वालों के यहाँ होते हैं उतने कहीं नहीं...! ( उसे ये लोग महिला आजादी और सशक्तिकरण कहते हैं)

जितनी भी लडकियां मैंने कम्युनिस्ट पार्टी के कैडर में देखी, सब शराब और सिगरेट की शौकीन. आखिर हम लड़कों से कम थोड़े ही हैं.... हम भी उतने ही बुरे बनेंगे...

हिंदुस्तान में हिन्दू धर्म को गाली देना फैशन है. कोई सीधे देता है, और कोई तिरछे होकर...

वास्तव में धर्म को गालियाँ देकर कई लोग अपना उल्लू सीधा करते हैं. मैंने ऐसे कई अधर्मी या विधर्मी देखे हैं, जो अपने को नास्तिक कहते हैं. धर्म लोगों को बुरे राहों पर चलने से रोकता है. पहले ये भगवन का ही डर ख़तम कर देते हैं..

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

भाई रंगनाथ जी
आपकी संवेदनशीलता प्रभावित करने वाली है.
पर असहमति तो है ही. यह एक गिलास पानी वाला या फिर यौन साम्यवाद का सिद्धांत आपने कहाँ पढा? लेनिन का अध्येता जानता है की वह ऎसी मूर्खताओं के कितने विरुद्ध थे.
रहा सवाल आप द्वारा उद्धृत रचनाओं का तो वामपंथ के भीतर पैदा विकृतियों से कब इनकार है मुझे? यह हमारी साझा चिंता है.
हाँ , सटी प्रथा आज ज्यादा प्रचलित नही पर क्या समय आने पर हिन्दू नेताओं ने इसका समर्थन और महिमामंडन नही किया? मैंने इसी सन्दर्भ में उसका ज़िक्र किया है किसी भावनावश नही.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

सची जी
मै तलाक को बुरा नही मानता.
पुरुष को तो हमेशा औरतो को छोड़ देने की आज़ादी रही है. सीता को राम ने , अहिल्या को गौतम ने और जाने कितने उदाहरण मिल जायेंगे फिर औरत को यह हक क्यूं नही?
रहा सवाल शराब का तो किसी पब में चलिए सर्वे करते हैं कितने कम्युनिस्ट हैं और कितने धार्मिक.
और हाँ अपराधियों और हत्यारों का भी .
अगर धर्म अपराध से रोकता है तो भवानी की पूजा करके डकैत अपने काम पर कैसे निकलते थे.?

इन मूर्खताओं को खोलना आप को फैशन लगता है तो यही सही.

varsha ने कहा…

मुझे लगता है स्त्री को बराबरी देने के लिए किसी धर्म या वाद को गरियाना ज़रूरी नहीं है . बराबरी देते चलिए बीच में आनेवाले स्वयं ही खारिज होते जाएंगे .

Suresh Chiplunkar ने कहा…

आप मेरे ब्लॉग पर पुनः पधारे आपका शुक्रिया।
आपको "नागपुर" शब्द से कुछ खास लगाव मालूम होता है :)
आपने जिन्हें "मेरा चम्पू" कहा है, उनके द्वारा की गई टिप्पणी के लिये मैं कैसे जिम्मेदार हो सकता हूँ?
बहरहाल, जो भी है… जैसा कि आपने एक और टिप्पणी में कहा कि "मैं डिस्टर्ब करने नहीं आऊंगा…" वादा कीजिये कि वाकई नहीं आयेंगे… हमें अपनी गन्दगी में खुश रहने दीजिये, आप भी अपनी गन्दगी में खुश रहिये…। न आप मेरे विचार बदल सकते हैं न मैं आपके… काहे बहस करें…। नमस्ते कहें और अपने-अपने रास्ते पर चलते चलें… हम दोनों का मकसद तो एक ही है "अपने विचारों का प्रचार करना…" आप भी कीजिये, हम भी करेंगे…। मेरी कोशिश भी यही रहेगी कि इधर न आऊँ…। यही सबसे बढ़िया उपाय है…। यदि मैंने अपनी टिप्पणी में कभी गालीगलौज का उपयोग किया हो तो माफ़ी चाहूँगा… बाकियों के लिये वे जानें।

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

आपकी बातों से सहमत।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रंगनाथ सिंह ने कहा…

ashok ji

aap ki baat se sahmathu.
lemim ne khud one glass water theory ko kharij kiya tha. sambhavtah clara zetkin ne iska ullekh kiya h
lenin ne dharm ke unmulan ke liye abhiyan chalane se bhi mana kiya tha.
lekin marxist history sirf whi nhi hogi jo lenin se hoke aati h. bolshewik aur trotskyite dono marxist tarikh ke hisse h. isi tarah CPM,CPI, ML. MAOIST sbhi ek sajha tarikh ke hisse h.

रंगनाथ सिंह ने कहा…

muktibodh ke bare me aap ne jo ray di h wo badi vajib h lekin mai samajh nhi pa rha hu ki tukado me un nibandho ka kya hasra hoga. kaha se katunga iski bhi samasya rahegi, mai sochta hu ki kisi dusare template me try karu....

aapke sujhav ka intjar rahega,
aap mail se hi jawab de mai to yaha aaya to yhi se samvad kar liya

arpita sarkar ने कहा…

you have very correctly pointed out which remains a fact. Most of us might not like the bold headline like this but it is very much true. I would like to write a line that strikes in mind at this point, which I relate man women and religion with.. its
GOd is for man and religion is for women.
Arpita Sarkar