12 जुलाई 2012

विज्ञान को पूंजीपति हितों तक सीमित करने की रणनीति का हिस्सा हैं मीडिया में ऐसी ख़बरें ।



*आशीष देवराड़ी 


कुछ समाजो को दूसरों की उपलब्धियों को चुराने की आदत होती है। कोई विमान बना ले तो कह दिया जाता है  कि हमने तो पुष्पक पहले ही बना लिया था ,मिसाइल बनती है तो कहा जाता है कि हमारे पास तो ब्रह्मास्त्र था। ऐसे में 'हिग्स बोसोन' की प्रायोगिक पुष्टि के बाद यह कहा जाना कि ऐसा तो  हमारे धार्मिक ग्रंथ पहले से ही कहते आये है , कोई आश्चर्य की बात होनी भी नहीं चाहिए आश्चर्य की बात होनी चाहिए मीडिया का ऐसी ही बातों के साथ खड़ा होना


चालीस सालो से कई देशो के हजारों वैज्ञानिक जिस खोज में लगे हुए थे उसके निष्कर्ष को अधिकांश भारतीय मीडिया द्वारा मिट्टी में मिलाने में चार मिनट भी नहीं लगे  अधिकांशतः ने ईश्वरीय कण जो की वास्तव में हिग्स बोसोन (जो कि इसका वैज्ञानिक नाम भी है) कण है को बतौर ईश्वर पेश किया और ऐसा वातोंमाद बनाया जैसे कि वैज्ञानिकों ने ईश्वर को खोज लिया हो  यह किसी वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ बेहद ही भद्दा मजाक था। 

                               ( छायाचित्र, रितु रंजन कुमार के फेसबुक पेज से साभार )


भारतीय मीडिया की खबरे देखेगे तो ऐसा लगेगा की वैज्ञानिक इतने सालों से भगवान को ही खोज रहे थे और आखिरकार उन्होंने भगवान को खोज ही लिया  दैनिक जागरण का शीर्षक है - ' भगवान के करीब पंहुचा विज्ञान  ' पत्रिका ने एक कदम आगे जाकर घोषणा कर दी -' विज्ञान ने खोजा भगवान  ' वैसे और अखबार भी कम नहीं   नई दुनिया ने शीर्षक दिया है ' कण कण में भगवान '    शुद्ध वैज्ञानिक उपलब्धि जिसका किसी ईश्वर से दूर दूर तक नाता नहीं उसे भारतीय मीडिया ने अंधविश्वास को पोषित करने वाली बातों के साथ पेश किया है  इस गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता की जितनी आलोचना की जाए कम है   जिनका काम वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करना है वे ठीक उलट काम कर रहे है

  भौतिकी के क्षेत्र में जिस खोज को मील का पत्थर माना जा रहे है उसे आचरण के सम्पादकीय लेख में ‘ कोई उपलब्धि ही नहीं ’ बताया गया है   वे लिखते है कि '' दुनिया की कोई भी खोज भारतीय खोज के सामने कही नहीं टिकती   हमारे ऋग्वेद ने पहले ही कह दिया है कि कण-कण में ईश्वर है ” इसी लेख की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि “अब विज्ञान ने साबित कर दिया है कि ईश्वर कण–कण में बसता है  सर्न वैज्ञानिक ने इसी की पुष्टि की है  ” माननीय संपादक जी को समझना चाहिए कि खोज या वैज्ञानिक उपलब्धियां किसी देश की नहीं बल्कि समूचे मानव जगत की होती है   एडिसन का बल्ब भारत में भी जगमगाता है और शून्य का प्रयोग पूरी दुनिया में होता है  इसके बाबजूद यदि आप मानते है कि भारतीय खोज के सामने दुनिया की खोज कही नहीं टिकती तो आप मुझे बताईये बीते साठ सालो में आपने मर्दाना ताकत बढाने वाले तेल के अलावा क्या खोज पाया ?? हाँ प्राचीन ग्रंथो के रूप में ऋग्वेद का सम्मान किया जाना चाहिए और हमें तबके सीमित ज्ञान और सीमित संसाधनों को ध्यान में रखना चाहिए  हमें किसी वैज्ञानिक उपलब्धि को वैज्ञानिक उपलब्धि की तरह ही देखना चाहिए ना कि ऐसा कहना चाहिए कि हमारे प्राचीन ग्रंथो में पहले ही बता दिया गया था  ऐसा करना ना केवल किसी वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ मजाक करना है वरन अपने प्राचीन ग्रंथो के साथ भी अन्याय करना है

 दूसरी बात यह कि सर्न प्रयोग से कही भी साबित नहीं होता कि कण कण में ईश्वर है , उलटे यह ईश्वर के अस्तित्व और ब्रह्मा द्वारा सृष्टि के उत्पन्न होने की बात को नकारने के और वैज्ञानिक तर्क मुहैया कराती है  यह प्रयोग ब्रहमांड बनने की प्रक्रिया की हमारी समझ को थोडा ओर स्पष्ट करता है 

 पीटर हिग्स जिनके नाम पर इस कण का नामकरण किया है वे नास्तिक है ओर इसे ईश्वरीय कण बोले जाने का विरोध करते है   इस कण के साथ ईश्वर शब्द जुड़ने की कहानी भी दिलचस्प है   दरअसल नोबल पुरूस्कार प्राप्त एक वैज्ञानिक है लिओन लेंडरमैन   उन्होंने अपनी किताब में कण के बारे में लिखा और इसे नाम दिया गॉड पार्टिकल(Goddamn Particle)  पुस्तकों के प्रकाशक ने लोगो कि नाराजगी के डर से इसका नाम बदल कर गॉड पार्टिकल कर दिया  बस कण के नाम के साथ ईश्वर नाम चल पड़ा ओर मीडिया ने इसे ही ईश्वर बना डाला  खबरों को धर्म की चादर उढ़ा कर परोसा जाना कतई भी सही नहीं ठहराया जा सकता और फिर मिडिया व निर्बल बाबा में फर्क क्या रह गया ?? प्रिंट मीडिया  के साथ साथ  इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी इसे सनसनी बनाकर ही पेश किया ओर खबर से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओ को हाशिए पर धकेल दिया , हो सकता है कि ऐसा किये जाने से टी.आर.पी. में बढोत्तरी हुई हो जिसका सीधा सम्बन्ध विज्ञापन मिलने से है पर अपने इस स्वार्थ के लिए समाज में अंधआस्थाओं और अंधविश्वासों के बीज बोना मीडिया के रसातल में पहुचने और उसके दुस्साहस का सूचक है   वैसे भी मिडिया का काम पैसे भुनाने का नहीं है उसका काम है जनता में वैज्ञानिक द्रष्टिकोण  विकसित कर उसके चेतना स्तर को उठाने का   उसका काम है समाज में फैली कुरीतियों ,अंध मान्यताओं पर प्रहार कर एक स्वस्थ्य समाज के निर्माण करने का  

पूंजीवादी समाज में जहां खबरों की भी एक कीमत है वहाँ खबरों की आकर्षक पेकिंग कर बेचा जाना अप्रत्याशित बात भी नहीं दरअसल मिडिया में ऐसी खबरे किसी सोची समझी रणनीति का ही परिणाम है  सोचिये आखिर दिन ब दिन वैज्ञानिक प्रगति के बाबजूद भी क्यों इसके समानांतर अंध आस्थाएँ ,अंध विश्वास और पाखण्ड भी बढते ही जा रहे है , जबकि विज्ञान के बढ़ने से इनका प्रभाव समाज पर कम होता चला जाना चाहिए था विज्ञान को पूंजीपति हितों तक सिमित करने की कोशिश जारी है जैसा कि लवली गोस्वामी अपने एक लेख में लिखती है कि विज्ञान मूलतः जनकल्याण और मानवता वाद की पैरवी करता है इसी प्रकार कहा जा सकता है विज्ञान को फलने-फूलने के लिए लोकतान्त्रिक और सजग समाज की आवश्यकता होती है परन्तु शायद यह हमारा दुर्भाग्य ही है की आज भी भारत में पुनरुत्थानवादी ताकतें विज्ञान के भौतिकवादी दृष्टिकोण का पुरजोर विरोध कर रही हैं। कई अवैज्ञानिक मतों को और अंधविश्वासों को विज्ञान का नाम दिया जा रहा है। प्रत्यक्षता की अवहेलना की जा रही है और वैज्ञानिक सोच के प्रति घृणा फ़ैलाने, विज्ञान को गरीबी, विनाश, युद्ध आदि के लिए दोषी ठहराने का प्रपंच रचा जा रहा है। आधुनिक ज्ञान जो पुरातन का ही विकसित स्वरुप है, की अवहेलना घातक हो सकती है. भारत को कभी अपनी वैज्ञानिक खोजों के लिए विश्व भर में प्रतिष्ठा प्राप्त थी। यदि हम उस प्रतिष्ठा को वापस पाना चाहते हैं तों हमें भ्रमों और अन्धाविश्वासों की तथाकथित वैज्ञानिक व्याख्याओं से परहेज करना चाहिए और प्रत्यक्षता और कार्य कारण समबन्ध के आधार पर किये गए वस्तुगत विवेचन को ही मान्यता देनी चाहिए शायद तब ही हम भारत की प्रतिष्ठा को वापस पा सकेंगे।

5 टिप्‍पणियां:

Digamber Ashu ने कहा…

आपका यह निष्कर्ष सोलहो आना सही है कि "भारत को कभी अपनी वैज्ञानिक खोजों के लिए विश्व भर में प्रतिष्ठा प्राप्त थी। यदि हम उस प्रतिष्ठा को वापस पाना चाहते हैं तों हमें भ्रमों और अन्धाविश्वासों की तथाकथित वैज्ञानिक व्याख्याओं से परहेज करना चाहिए और प्रत्यक्षता और कार्य कारण समबन्ध के आधार पर किये गए वस्तुगत विवेचन को ही मान्यता देनी चाहिए शायद तब ही हम भारत की प्रतिष्ठा को वापस पा सकेंगे।"
इस सामयिक, सारगर्भित लेख के लिए बधाई.

Arvind Mishra ने कहा…

विज्ञान में खबरे हो भी सकती हैं मगर खबरों में विज्ञान नदारद है

brajesh kanungo ने कहा…

हम नयी कार या नया कम्प्यूटर घर लाते हैं तो पहले उसकी नजर उतारते हैं तथा फलक पर स्वास्तिक का निशान उकेरते हैं। विज्ञान का ईश्वरीकरण करने के हमारे संस्कार न जाने कब तक हमारी दृष्टि को धुन्दलाते रहेंगे। 'गॉड पार्टिकल' के बहाने आज का मीडिया भी यही काम करता दिखाई नही दे रहा है। क्या सचमुच ऐसा नही लगता है कि विज्ञान के बहाने कुछ और ही लक्ष्य किया जाने लगा है, इन दिनों..?इस मुद्दे पर आपका लेख बहुत कुछ स्पष्ट करने मे सफल हुआ है।

kamal devrari ने कहा…

हमा आप की बातो से पूणत; सहमत है आशीष जी।

R.K.Savita ने कहा…

Media paisa kamane ke liye lagatar sugam raston ko khojta hai aur usi par chalta hai. Vigyan ko vaigyanik tarike se samjhane mein dimagi mehnat bhi chahiye aur samay bhi, kyon yesa karenge jabki "Ishwar roopi maha astra" ka aisa viklp unke pas hai jis ke dwara adhik kamai ho hi rahi hai. Khoj karne wala NASTIK hai yeh kyon batayenge jabki padhane/dekhne wale ASTIK hain.
Sunder Lekh ke liye bahut-bahut dhanyavad