25 मई 2012

निर्मल बाबा ही नहीं ...हम और हमारा समाज भी पाखंडी ही है !!!



  • आशीष देवराड़ी

ग्लोबलाइजेशन और आधुनिकीकरण के इस दौर में अभी हमारे अंधविश्वासों के लिए काफी स्पेस मौजूद है | क्या पढ़े लिखे और क्या गंवार, दोनों ही अंधविश्वास के जाल में जकड़े हुए है | एक के लिए पण्डित मंदिर में उपलब्धय है तो दूसरे के लिए उसके मोबाइल पर ,एक के लिए तीर्थ -दर्शन है तो दूसरे के लिए वर्चुअल-दर्शन ,एक के भगवान खुली छत के नीचे है जो दूसरे के केमरों की सुरक्षा के बीच वातानुकूलित कमरों में बंद | बिन पढ़े लिखो कि बात तो समझ आती है जो अज्ञानता और मजबूरीवश इन अंधविश्वासों में उलझे हुए है परन्तु यदि तथाकथित आधुनिक पढ़े-लिखे लोग भी  इन अंधविश्वासों से पार ना पा सके तो ये उनकी शिक्षा (या कहे हमारी शिक्षा व्यवस्था ) और आधुनिकता पर बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता है |ये बात रेखांकित कि जानी चाहिए कि वर्तमान सन्दर्भ में  पढ़ने-लिख लेने का मतलब अंधविश्वासों से मुक्ति कतई नहीं है |पढ़े लिखो में अपने अन्धविश्वास पलते है और ये अन्धविश्वास आये दिन हमें अपने आस-पास दिखलाई पड़ते है|                                                                                                  अभी हाल ही में ११/११/११ को ऐसा ही कुछ देखने को मिला | कई पंडितो ने इस तारीख को खरीददारी की दृष्टि से शुभ बताया जिसे तकरीबन तमाम अखबारों ने पहले पन्ने पर जगह दी | इस दिन आम दिनों की अपेक्षा अधिक विज्ञापन भी प्रकाशित हुए | खरीददारी के इस शुभ मुहूर्त को भुनाने में पढ़ा लिखा मध्यवर्ग ही सबसे ज्यादा आगे रहा |कपडे,मोबाइल ,एल.सी.डी, फ्रिज, वांशिग मशीन और भी ना जाने क्या-क्या खरीद लिया गया | कहने की जरुरत नहीं कि शुभ मुहूर्त के चक्कर में अन्धो ने चश्मे और गंजो ने कंघी खरीद ली |बिन जरुरत और बिन मतलब का सामान घर ला दिया गया |और इन सबके बाबजूद भी शुभ क्या हुआ भगवान जाने ???                                                                                       

हमारे अन्धविश्वास थोड़े बहुत थोड़ी ही है जिन्हें किसी एक लेख में लिखा जा सके बल्कि इनकी फेहरिस्त तो इतनी लंबी है कि जिसे लिखने में समुद्र की स्याही भी कम पड़ जाए | चौराहे की ट्रेफिक लाईट भी जिन्हें नहीं रोक पाती वे बिल्ली के रास्ता काटने पर रुक जाते है | किसी के छीक देने पर घर से बहार नहीं निकलते | नवजात बच्चो को जोंसन प्रोडक्ट  के अलावा काला टीका किस घर में नहीं लगाया जाता ?गाडी खरीदने पर मिठाई बाद में बाटी जायेगी ,पूजा पहले हो जाती है | नया कंप्यूटर घर आया नहीं कि उस पर साथिया बना दिया |इलेक्ट्रिक आयटमो पर  टीका और चावल लगाना आम बात है |और भी ना जाने क्या क्या ?                                                                                             

लोगो के अंधविश्वास को किसी और ने समझा हो ना समझा हो हमारे यहाँ के बाबाओं ने बखूबी समझा है | तभी तो पायलट बाबा से लेकर नित्यानंद तक सभी हमारे यहाँ पाए जाते है |सत्य साईं भी इसी अंधविश्वास की उपज ही तो है |सारे बाबाओं से एक कदम जाकर इस बाबा ने खुद को भगवान घोषित किया , फिर क्या था भक्तो का  तांता लग गया और शुरु हुआ ठगी का अंतहीन सिनसिला|अब जरा एक मिनट रूककर  ठन्डे दिमाग से सोचिये कि आजतक भगवान आया ही किस काम है और ये मात्र संयोग भर  नहीं हो सकता कि विश्वविजेता बनने का ख्वाब देखने वाले - सिकन्दर, हिटलर, अंग्रेज, चंगेज खाँ, नेपोलियन सब आस्तिक थे| सत्य साईं हवा से सोना और भभूत उत्पन्न करने का चमत्कार दिखाकर खुद के भगवान होने का प्रणाम देता था | लोगो के मर्ज का इलाज भभूत से करता था |चमत्कार और भगवान दो ऐसे विषय है जिनके बल पर इस मुल्क में अच्छी खासी भीड़ जुटाई जा सकती है |                                                                                                                                                                                            

शुभ मुहर्त , ज्योतिष ,अंक विद्या, हस्तरेखा विधा, कुंडली मिलान ,फेंग-शुई ,जादू टोना ,ताबीज ..सभी अंधविश्वास की  संतति है और पढ़े लिखे अभिजात्य लोगो की अतार्किक सोच ने इन्हें पोषित करने का काम बखूभी किया  है क्योंकि उसके पास ही है ऐसा कुछ जो इन्हें जाने अनजाने बढ़ावा दे रहे है ...और वोह है अर्थ | इन बाबाओं की अथाह सम्पति और हमारे धनवान होते मंदिर, पढ़े लिखे कुलीन लोगो की अंधविश्वासी मानसिकता का ठोस प्रमाण है क्यूकि अनपढ़-गरीब सात जन्मो में भी इन्हें पैसो से इतना लबरेज नहीं बना सकते जितना की ये आज है |याद कीजिये ११/११/११/ के तथाकथित शुभ-मुहर्त पर खरीददारी करने वाले किस वर्ग के लोग थे ???                                                                                         

दरअसल विज्ञान की प्रगति के चलते ये उम्मीद जागी थी कि धीरे -धीरे इस तरह के अंधविश्वासो से समाज मुक्त होता जाएगा | जबकि हुआ ठीक इसके उलट ही | आज ज्योतिषी , भविष्य-वक्ता ,पण्डित किसी खास जगह ही नहीं होते वे हमारे मोबाइल ,टेलीविजन ,इंटरनेट सभी जगह मौजूद है |                                                                                                  

आधुनिक लोग बहुत पाखंडी है |वे धर्म और पाखंड छोड़ते नहीं लेकिन बात विज्ञान और प्रगति की करते हैं |  

5 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

narendrakumar ने कहा…

हम कल्पनाए तो बहुत कर लेते है कि विज्ञान कि प्रगति के साथ ही हमारी अंधी सोच हटती जाएगी ,,पर जिस तरह इन धार्मिक ग्रंथो कि बाते लोगो को जकड रखी है ,उनको हटाना काफी दुरूह काम है ,,क्यों कि इनको मानने वाले व जिन्हें ये आपने पूर्वज कहते है ,उनकी बातो का खूब जोर - शोर से प्राचार किया जाता है ,,,,जगह- जगह मंदिर ,मस्जिद आदि बनाए जाते है ,,,आज सोशल मिडिया में भी इनके ग्रुप चलते है ,जिनमे आपको वैचारिक स्वतंत्रता तो है ही नही ,,वरन आप को ही उस ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है ,,,और रोज कही तो बजरंगबली ,लक्ष्मी ,दुर्गा,विष्णु,शंकर ,गणेश ,,,आदि कि तस्वीरे लगा दी जाती है ,,आप दोस्त है आप कि मज़बूरी बन जाति है कि आप भी लाइक करे ,,,ज्योतिष शास्त्र में लोगो कि जिंदगी का उतार-चढाव याने कि लाभ कम नुकसान ज्यादा बात कर ,उन्हें फायदा करवाने कि सलाह दी जाती है ,,अगर ऐसा न किया तो किसी दुर्घटना का शिकार हो सकते है ,,इसी तरह लाफिंग बुद्धा को यदि आप साँची के स्तूप में देखे तो कुछ नही है बस उसके तोरण में चार व्यक्ति लगा दिए गए ,,जिसमे लाफिंग बुद्धा उसे खुशी-खुशी उठा रहा है ,,बस इसी बात का फायदा चाइना ने उठा लिया और मार्केट में लाफिंग बुद्धा आ गया ,,,अभी दो माह पहले आपने बीच से अजित साहनी जी ने एक तीन फन का और वही सांप पांच फन ,और वही सांप दस फन का ,,तो अभी जहाँ मैं हू उमरिया जिले में वहाँ पर लोगो ने ये तस्वीर दिखा कर बताया कि कि हमने ये फोटो खिंचा है ,,लोग बताई दिखाई तब लोगो को विश्वास हुआ जगह पर देखने जा रहे है ,तब मैंने बताया ,और सारी फोटो लेपटाप पर ,,,इसके पीछे मौत का जो डर है ,,वो अगर लोगो के दिलो से समाप्त हो जाए तो समझो कि पाखंड कि छुट्टी हो गई ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

narendrakumar ने कहा…

हम कल्पनाए तो बहुत कर लेते है कि विज्ञान कि प्रगति के साथ ही हमारी अंधी सोच हटती जाएगी ,,पर जिस तरह इन धार्मिक ग्रंथो कि बाते लोगो को जकड रखी है ,उनको हटाना काफी दुरूह काम है ,,क्यों कि इनको मानने वाले व जिन्हें ये आपने पूर्वज कहते है ,उनकी बातो का खूब जोर - शोर से प्राचार किया जाता है ,,,,जगह- जगह मंदिर ,मस्जिद आदि बनाए जाते है ,,,आज सोशल मिडिया में भी इनके ग्रुप चलते है ,जिनमे आपको वैचारिक स्वतंत्रता तो है ही नही ,,वरन आप को ही उस ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है ,,,और रोज कही तो बजरंगबली ,लक्ष्मी ,दुर्गा,विष्णु,शंकर ,गणेश ,,,आदि कि तस्वीरे लगा दी जाती है ,,आप दोस्त है आप कि मज़बूरी बन जाति है कि आप भी लाइक करे ,,,ज्योतिष शास्त्र में लोगो कि जिंदगी का उतार-चढाव याने कि लाभ कम नुकसान ज्यादा बात कर ,उन्हें फायदा करवाने कि सलाह दी जाती है ,,अगर ऐसा न किया तो किसी दुर्घटना का शिकार हो सकते है ,,इसी तरह लाफिंग बुद्धा को यदि आप साँची के स्तूप में देखे तो कुछ नही है बस उसके तोरण में चार व्यक्ति लगा दिए गए ,,जिसमे लाफिंग बुद्धा उसे खुशी-खुशी उठा रहा है ,,बस इसी बात का फायदा चाइना ने उठा लिया और मार्केट में लाफिंग बुद्धा आ गया ,,,अभी दो माह पहले आपने बीच से अजित साहनी जी ने एक तीन फन का और वही सांप पांच फन ,और वही सांप दस फन का ,,तो अभी जहाँ मैं हू उमरिया जिले में वहाँ पर लोगो ने ये तस्वीर दिखा कर बताया कि कि हमने ये फोटो खिंचा है ,,लोग बताई दिखाई तब लोगो को विश्वास हुआ जगह पर देखने जा रहे है ,तब मैंने बताया ,और सारी फोटो लेपटाप पर ,,,इसके पीछे मौत का जो डर है ,,वो अगर लोगो के दिलो से समाप्त हो जाए तो समझो कि पाखंड कि छुट्टी हो गई ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Rajesh Kumari ने कहा…

आपने सब मेरे मन की बात लिख दी इससे अधिक तारीफ़ और क्या करूँ काश लोग इन बातों को समझ सकें इस उत्तम आलेख के लिए बधाई

अजय कुमार झा ने कहा…

101….सुपर फ़ास्ट महाबुलेटिन एक्सप्रेस ..राईट टाईम पर आ रही है
एक डिब्बा आपका भी है देख सकते हैं इस टिप्पणी को क्लिक करें