13 अक्तूबर 2011

भारतीय लोकतंत्र एक सामंती लोकतंत्र है - मदन कश्यप



ग्वालियर में शहीद ए आजम भगत सिंह के जन्म दिवस पर गत २७ सितम्बर को ‘दखल विचार 
मंच’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला



ग्राम्शी ने कहा था कि एक बुर्जुआ लोकतंत्र में पूँजी जनता के सामूहिक विवेक को नियंत्रित करती है. आज भारत सहित सारी दुनिया में यह देखा जा सकता है. इन लोकतंत्रों में सारे निर्णयों और सारी गतिविधियों के केन्द्र में लोक नहीं पूंजीपति हैं. बड़े स्पष्ट तरीके से नीतियाँ इस प्रकार बनाई जा रही हैं कि वे पूंजीपतियों के वर्ग-हितों के अनुरूप हों. इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से समाज का बड़ा हिस्सा वंचना का शिकार होकर हासिये पर जा रहा है. किसान, मजदूर और आदिवासी अब सत्ता विमर्श के केन्द्र पर नहीं हैं. एक ऐसा विकास-विमर्श प्रचलित किया जा रहा है जिसमें पूंजीपतियों की समृद्धि को ही विकास का पर्याय बना दिया गया है. यह केन्द्र लगातार संकुचित हो रहा है और हाशिया बढ़ता जा रहा है. इसके स्रोत सत्ता की बदली हुई शब्दावली में भी देखे जा सकते हैं. संविधान में कहीं ‘केन्द्र’ शब्द का प्रयोग नहीं है. वहाँ ‘संघीय शासन’ की बात की गयी थी. लेकिन आप देखेंगे कि मीडिया से लेकर सत्ता तक की भाषा में ‘केन्द्र सरकार’ का प्रचलन है. यह सिर्फ भाषा का खिलवाड नहीं. यह उस बदले हुए वैचारिक परिदृश्य को भी दिखाता है जिसमें सभी का प्रतिनिधित्व करने वाली और विभिन्न राष्ट्रीयताओं तथा समाजों के एक संघ की प्रतिनिधि सरकार एक सर्वाधिकारी केन्द्रीय सत्ता में तब्दील हो गयी है. यह बातें ग्वालियर स्थित कला वीथिका में शहीद ए आजम भगत सिंह के जन्म दिवस पर गत २७ सितम्बर को ‘दखल विचार मंच’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में हिस्सेदारी करते हुए वरिष्ठ कवि तथा विचारक मदन कश्यप ने मुख्य वक्तव्य देते हुए कहीं. पूंजीवादी लोकतंत्र के भीतर पैदा होने वाले विभाजनों की विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ‘इस केन्द्र और हासिये के विभाजन का असर भी शुरू से ही साफ़ दिखाई देने लगा था. कश्मीर, पूर्वोत्तर ही नहीं देश के तमाम हिस्सों सहित लगभग हर राज्य में इस द्वंद्व का प्रतिफलन हिंसक/अहिंसक संघर्षों में हुआ है. सुविधाप्राप्त तथा वंचितों के बीच बढ़ती खाई ने भारत ही नहीं दुनिया भर में एक ऎसी स्थिति बनाई है जिसमें लोगों का गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा है. अरब देशों से लगाए यूरोप और अमेरिका तक में जारी जनता के विरोध प्रदर्शन पूंजीवादी लोकतंत्र की इसी विफलता के स्वाभाविक परिणाम हैं. यहाँ बड़ी भूमिका निभाने में क्रांतिकारी शक्तियों की अक्षमता ही पूंजीवाद को अब तक ज़िंदा रखे है. ऐसा क्यों है, इस पर गंभीर विचार की ज़रूरत है.’


विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ लेखक डा मधुमास खरे ने विस्तार से भगत सिंह के वैचारिक स्रोतों का ज़िक्र करते हुए कहा कि आज दक्षिणपंथी ताकतें भगत सिंह के नाम पर भ्रम फैलाना चाहती हैं लेकिन उनका लिखा उनकी सही वैचारिक स्थिति और क्रांतिकारी सोच का पता देती है. उन्होंने युवाओं से उनके लेखों को गंभीरता से पढ़ने की सलाह दी.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ट्रेड युनियन कर्मी का. राजेश शर्मा ने देश-दुनिया में चल रहे संघर्षों की और इशारा करते हुए कहा कि यह समय दुनिया भर की क्रांतिकारी शक्तियों के तैयार हो जाने का है. पूंजीवादी लोकतंत्र की सीमाएँ सामने आ गयी हैं और जनता उसका असली चेहरा पहचान चुकी है. आज ज़रूरत इसका बेहतर विकल्प प्रदान करने की है.



कार्यक्रम के आरंभ में दखल की सांस्कृतिक टीम ने क्रांतिकारी गीतों की प्रस्तुति की. इस अवसर पर ‘भगत सिंह ने कहा’ सीरीज के पोस्टरों तथा पुस्तकों की एक लघु प्रदर्शनी भी लगाई गयी थी. कार्यक्रम का संचालन युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने किया तथा इसमें ज़हीर कुरैशी, ए असफल, संतोष निगम  गुरुदत्त शर्मा, सतीश गोविला, डा अशोक चौहान, डा जितेन्द्र विसारिया, अमित शर्मा, जयवीर राठौर, किरण, ज्योति सिंह, आशीष देवरारी सहित अनेक लोग उपस्थित थे.

प्रस्तुति – फिरोज खान   

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति!

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

सूचनापरक, उत्साहवर्धक. ऐसे चेतना विकसित करने वाले कार्यक्रमों की खूब ज़रूरत है.

' मिसिर' ने कहा…

मदन जी की पूंजीवादी तंत्र पर सुविचारित टिप्पणी वर्तमान परिदृश्य को और भी साफ़ देखने लायक दृष्टि देती है ! बहुत अच्छा ,सफल कार्यक्रम ! आयोजकों को बधाई !