30 अप्रैल 2010

मज़दूर यानि पुरुष मज़दूर?

( आज मई दिवस है यानि कि दुनिया भर के कामगारों के संघर्ष और बलिदान को याद करने का दिन। लेकिन विमर्शों के उत्तर आधुनिक दौर में कुछ ऐसा प्रपंच रचा गया है कि लोगों की एक्सक्लूसिव पहचानों पर तो बहुत ज़ोर है पर सामूहिक पहचाने धुंधली हो गयी हैं। या तो आप दलित हैं, या ग़ैर दलित, नारी, मज़दूर या फिर कुछ और। लेकिन दरअसल एक जटिल समाज में हमारी सामूहिक पहचाने होती हैं और साझे संघर्ष। स्त्री अधिकार संगठन से जुड़ी रुपाली सिन्हा की यह टिप्पणी 8 मार्च और  1 मई के बीच के ताने-बाने को बयान करती है। कामगार दिवस पर क्रांतिकारी अभिनंदन सहित)

मई दिवस और महिलाएं

यह हम सबका दिन है!
दुनियाभर के मुक्ति संघर्षों अत्याचार और उत्पीडन के खिलाफ होने वाले संघर्षों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होने मर्दो के कंधे से कंधा मिलाकर संघर्षों में अपनी भागीदारी निभाई है। मई दिवस का इतिहास भी मर्दों के साथ-2 औरतों के संघर्षों से लिखा गया है। मजदूर दिवस दुनिया भर के मजदूरों की आकांक्षाओं, अधिकारों और जीत का दिन है। इस दृष्टि से अमेरिका के मजदूर आंदोलन ने कामगार वर्ग को दो अंतर्राष्ट्रीय दिन दिए है आठ मार्च और एक मई।

19 वीं सदी के अंत तक यूरोप और अमेरिका में औद्योगिक कामगारों के रुप मे औरतों ने अपनी जगह बना ली थी। हालांकि उनकी स्थिति और उनके काम की परिस्थितियां मर्दो की तुलना में बहुत बदतर थीं। मार्च 1857 में कपडा उद्योग में काम करने वाली औरतों ने बेहतर काम की परिस्थितियों, काम के 10 घंटे और बराबरी के अधिकार के लिए प्रदर्शन किया जिसका बुरी तरह दमन किया गया। मार्च 1908 में कामगार औरतों का एक और बडा प्रदर्शन हुआ। यह प्रदर्शन बालश्रम पर रोक और औरतों के मताधिकार की मांग को ले कर था। फिर दमन हुआ। 1909 में गारमेंट मजदूरिनों ने अमेरिका में आम हडताल कर दी। 20 से 30 हजार कामगारिनों ने बेहतर वेतन और बेहतर काम की परि0 के लिए भयंकर ठंड के 13 हफ्ते संघर्ष किये। 1903 में महिला ट्रेड यूनियन की स्थापना हुई जिसने गिरफतार हडतालियों को जेल से छुडाने की व्यवस्था की। इस संघर्ष को विशेष दिन का दर्जा दिलाने में क्लारा जेटकिन के प्रयासों से सभी परिचित हैं। 

अंतर्राष्टीय महिला दिवस ने कामगारों के संघर्ष को ताकत दी। रूस की फरवरी क्रांति में इसने महत्वपूर्ण उत्प्रेरक का कार्य किया।

19वीं सदी हलचलों का युग थी आंदोलनों का ज्वार था। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का विचार भी यहीं पनपा था। जब पुरूष कामगार 10 से 8 घंटे काम की मांग कर रहे थे महिला कामगार 1857 में 16 से 19 की मांग कर रही थी। इससे पता चलता है कि औरतों के साथ हर क्षेत्र में भेदभाव होता रहा है।  औरतें एक तरफ अपनी बराबरी और अधिकारों की लडाई लड रही थी दूसरी ओर पुरुष कामगारों के साथ कंधे से कंधा मिला कर संघर्ष में बराबरी से हिस्सेदारी भी कर रही थी। 

 महिलाओं के इस ऐतिहासिक संघर्ष को महिलाओं के संघर्ष के रुप में सीमित करके आंका जाता है जबकि वह भी उस व्यापक मजदूर आंदोलन का हिस्सा था जिसने पूरी दुनिया के मजदूरों को एक नई ताकत और दृष्टि दी थी। ठीक उसी प्रकार जैसे मई दिवस के संघर्ष को अनकहे ही पुरुष कामगारों का संघर्ष मान लिया जाता है। 8मार्च का आंदोलन राजनीतिर्क आर्थिक और सामाजिक अधिकारों का संघर्ष था जो समूची मानवजाति से स्वयं को जोडता था। यह केवल ‘औरतों का मुद्दा’ नहीं था। 

 उदाहरण के लिए जब 1866 में अमेरिका में ‘ नेशनल लेबर यूनियन की स्थापना हुइ थी तो बहुत सी महिला श्रमिक इसका हिस्सा थीं। अमेरिकी कांग्रेस ने 1868 में आठ घंटे के कार्यदिवस का जो कानून पास किया उसकी उत्प्रेरक नेता थीं बोस्टन की मेकेनिस्ट इरा स्टीवर्ड। 

 पिछले कुछ सालों से हम देख रहें है कि महिला दिवस को पत्नी दिवस के रुप में मनाना, कार्ड पर सुंदर कोमल कविताएं लिख कर देना, उपहार देना आदि का प्रचलन बढता जा रहा है। महिलाओ के जुझारु संघर्षों को बेहतर समाज के लिए होने वाले संघर्षो के हिस्से के रुप में नहीं देखा जाता। इस ऐतिहासिक संघर्ष ने यह साबित किया कि महिलाओं की भी राजनीतिक भूमिका है और इसे निभा सकने में वे सक्षम भी हैं। हालाॅकि महिला कामगारों के अधिकारों की हमेशा ही उपेक्षा हुई है। आज भी उनके साथ पुरुष कामगारों की तुलना में अधिक शोषण और उत्पीडन हिंसा और गैरबराबरी का शिकार होना पडता है। संगठित असंगठित दोनों क्षेत्रों में लगभग यही स्थिति है। इस दृष्टि से महिला मजदूरों को दोहरा संघर्ष करना होगा। एक तरफ पितृसत्तात्मक शोषण से तो दूसरी ओर एक कामगार के रुप में

आज महिला कामगारों को संगठित करने की जरुरत को समझना होगा जो पितृसत्तात्मक मूल्यों को चुनौती देने के साथ ही व्यापक मजदूर आंदोलन का भी हिस्सा बनें।




नोट - आज युवा संवाद भोपाल में शाम छः बजे 'मज़दूरों के लिये एक दुनिया' विषय पर प्रो रिज़वानुलहक़ का व्याख्यान  सेंट मेरी स्कूल के पास सेवासदन में आयोजित कर रहा है।
कल दो मई को युवा संवाद, ग्वालियर शाम छः बजे से 'हमारे समय में समाजवाद' विषय पर प्रो कमल नयन काबरा तथा प्रो शम्सुल इस्लाम के व्याख्यान  उत्तम वाटिका में आयोजित करेगा।


मई दिवस के मुताल्लिक तमाम अखबारों और प्रिंट मीडिया के द्वारा इसकी कुछ ऐसी छवि प्रस्तुत की जाती रही है, मानो इस श्रम दिवस से सिर्फ वे ही सरोकार रखते हैं, जो चौराहों पर फावड़े और अन्य औजारों के साथ मालिक का इंतज़ार कर रहे होते हैं. मई दिवस के परिप्रेक्ष्य में अखबार पर आई तमाम ख़बरों को सिरे से पढ़ा जाए, तो मजदूर होने की अवधारणा और परिभाषाओं को न ही छुआ गया है, न ही प्रस्तुत किया गया है, दृष्टिगत बोध में रिक्शे चालक, चौराहों पर खड़े मजदूर, कामगार महिलाओं के चित्रों को मजदूरों के सिम्बोल की तरह प्रस्तुत किया जाता रहा है, जो सिर्फ वर्ष के एक दिन ख़ास तरीके से बस याद करने हेतु ही काम आते हैं. अन्य तमाम बातों से उनका सरोकार न कराया जाता है, न ही ज़रूरत समझी जाती है. मई दिवस उन सभी शहीदों को याद करने का भी दिन है, और मजदूर वर्ग और उनकी चेतना को सही सलीकों से सामने लाना भी  है. जिसमें उभर रहे नए वर्ग को इस गौरव भरे दिन के बारे में सही जानकारी और सही परिभाषाओं का अभाव न हो.

जबलपुर शहर से ७० किलोमीटर दूर ग्राम टिकरिया (जिला मंडला) में एक आम जनसभा रखी गई है. जो मजदूर दिवस और उसके गौरवशाली इतिहास के बारे में स्कूलों, और जिले के कुछ प्रबुद्ध जनों के साथ इस चेतना का प्रसार करेगी. १ मई २०१० को दोपहर ४ बजे  "मजदूर,मार्क्स और महिलाएं" विषय पर जागरूक छात्रों के बीच चर्चा रखी जाएगी. और कविता पोस्टरों के साथ प्रगतिशील कवियों की रचनाओं को छात्रों के बीच वितरण किया जाएगा.

आयोजक - युवा संवाद जबलपुर, नागरिक अधिकार मंच 
                निशांत कौशिक, सत्यम पाण्डेय,अजय यादव  

4 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

पुरुष प्रधानतावाद से संघर्ष बहुत जरूरी है। यह स्त्रियों के शोषण का सब से मजबूत तंत्र है।

mukti ने कहा…

"इस दृष्टि से महिला मजदूरों को दोहरा संघर्ष करना होगा। एक तरफ पितृसत्तात्मक शोषण से तो दूसरी ओर एक कामगार के रुप में"--- ये बात शत-प्रतिशत सही है.
बहुत सही मुद्दा है यह. मई दिवस को तो पुरुष मजदूर दिवस के रूप में मना लिया जाता है और महिला-दिवस को ग्लैमराइज़ करके पत्नी-दिवस के रूप में. इन सबके बीच कहीं महिला-मजदूरों की बात दब सी जाती है, जो आज भी असंगठित क्षेत्रों में व्यापक भेदभाव की शिकार हैं. इसका साक्षात उदाहरण मैंने देखा है यहीं अपने मुहल्ले में, जहाँ पुरुष कुक, महिला कुक से डेढ़ गुना अधिक पारिश्रमिक पाते हैं और पढ़े-लिखे लोग सहर्ष देने को भी तैयार हो जाते हैं.

rashmi ravija ने कहा…

मजदूर दिवस को सचमुच पुरुष मजदूर दिवस के रूप में ही लिया जाता है और महिला मजदूरों के अधिकारों, समस्याओं की अनदेखी कर दी जाती है जबकि महिला मजदूरों को कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ता है.
जरूरत है , महिला मजदूरों को भी इस व्यापक आन्दोलन का हिस्सा बनाया जाए और उनके शोषण के खिलाफ आवाज उठायी जाए.

Udan Tashtari ने कहा…

आज महिला कामगारों को संगठित करने की जरुरत को समझना होगा जो पितृसत्तात्मक मूल्यों को चुनौती देने के साथ ही व्यापक मजदूर आंदोलन का भी हिस्सा बनें।

-बहुत जरुरी है यह कदम!