27 फ़रवरी 2010

आपका घर गच्ची वाला है

( देवास के हमारे साथी सौरभ का यह लेख युवा दख़ल के ताज़ा अंक में प्रकाशित है। होली की मस्तियों के बीच उम्मीद करता हूं आप इन्हें भी नहीं भुलेंगे!)


पूरे के चावल दे दो



देवास की एक बस्ती में करीब 34 लड़कियां हैं जो नियमित रूप से हमारे पास पढ़ने आती हैं। इन बच्चियों में मूल रूप से मुस्लिम और दलित किषोरियां हैं। उन्हें पता नहीं - कि क्यों पढ़ती हैं, बातचीत में पता चला कि उन्हें पढ़ने और स्कूल जाने के बराबर अवसर नहीं मिले और ना ही कभी वे स्कूल की फेंटेसी को जी पाई हैं। जब मैं रोज़ की तरह सेंटर पहुंचा तो बच्चों का हुजुम हमारे पिछे आ रहा था, करीब दो घंटा पढ़ाई के बाद, बात करते-करते एक बच्ची (मुस्कान 8 वर्ष) ने पूछा कि आप कहां रहते हो ? जवाहर नगर में, मैने कहा। उसने फिर पूछा सर आपका घर गच्ची वाला है ? पहले तो मुझे सवाल समझ नहीं आया कि गच्ची वाला का क्या मतलब है ? तो एक साथी ने बताया कि गच्ची वाला याने छत वाला घर। मैने जब मुस्कान से हां कहा तो उसने कहा - सर आप मुझे एक बार वहां ले चलोगे ? इस सवंाद से मुझे पहली बार एहसास हुआ कि घरों की पक्की दिवारों और छतों के भी अपने मायने होते हैं और वे किसी फेंटेसी से कम नहीं होते। इससे पहले शायद ही मैने कभी अपने घर की छत को देखा हो ?


ऐसे ही मैं एक बार बस्ती में किराने की दुकान पर खड़ा था, तभी एक आवाज़ आई, वह आवाज़ नर्गिस की थी। भैया पूरे के चावल दे दो। दुकानदार व्यस्त था शायद वह सुन नहीं पाया। नर्गिस फिर अपार ख़ुशी और आत्मविश्वास से तेज आवाज़ में पैसे रखकर बोली- भैया पूरे के चावल दे दो। यह संवाद मेरे आपे से बाहर का था, मैं पूरी तरह सिहर गया था क्योंकि नर्गीस के पूरे पैसे से मतलब 5 रूपये से था। एक बच्ची सिम्मो मेरे लिये आरिगेमी से कुत्ता बनाकर लाई और उसने अपने हाथ से उस पर मेरा नाम लिखा था। मैं नहीं समझ पा रहा था कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है। एक तरफ तो मुस्कान ने गच्ची वाला छत नहीं देखी, नर्गिस को 5 रूपये पूरे लगते हैं और यही बच्चे हमारे लिये तोहफे लायें हैं। यह सबकुछ मेरे लिये अनुपम, अद्भूत और ना जाने क्या क्या था। यह सब मेरे लिये इसलिये भी शायद अजीब और नया था क्योंकि मैं एक साफ्टवेअर इंजिनियर के रूप में एक मल्टीनेषनल कंपनी में काम किया करता था जहां मैं साल भर के 5 लाख रूपये कमाता था और मुझे तो वह भी कम लगते हैं। सौरभ वर्मा

7 टिप्‍पणियां:

लवली कुमारी ने कहा…

मार्मिक...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

यही तो वह फर्क है जिस का कम होना जरूरी है मानवबिरादरी के भविष्य के लिए। अन्यथा.....? मैं तो पूरी बिरादरी को किसी प्राकृतिक संहार में नष्ट होता देखने लगता हूँ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

Suman ने कहा…

होली की शुभकामनाएं .nice

Ek ziddi dhun ने कहा…

rulai ati hai pdhkar par ro to adwani bhi deta hai.

शरद कोकास ने कहा…

यही है यथार्थ ,,इससे कब तक आँख मूँदे रहेंगे हम ?

सागर ने कहा…

उन्हें पता नहीं - कि क्यों पढ़ती हैं

अपने आप में २ लाख का सवाल तो यही है.

फिर पूरे का चावल... क़यामत ...

आपका उम्मीद सही है- नहीं भूलूंगा